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पत्रिका समूह के संस्थापक कर्तव्य परायण पत्रकार..श्री कर्पूर चंद्र कुलिश - विवेक रंजन श्रीवास्तव ,भोपाल


 

पत्रिका समूह के संस्थापक कर्तव्य परायण पत्रकार..श्री कर्पूर चंद्र कुलिश

 - विवेक रंजन श्रीवास्तव ,भोपाल


"जनतांत्रिक शासन के पोषक जनहित के निर्भय सूत्रधार

शासन समाज की गतिविधि के विश्लेषक जागृत पत्रकार

लाते है खोज खबर जग की देते नित ताजे समाचार

जिनके सब से , सबके जिनसे रहते हैं गहरे सरोकार

जो धड़कन हैं अखबारो की जिनसे चर्चायें प्राणवान

जो निगहवान है जन जन के सब सुखदुख से रह निर्विकार

कर्तव्य परायण पत्रकार

आये दिन बढते जाते है उनके नये नये कर्तव्य भार

जब जग सोता ये जगते हैं कर्मठ रह तत्पर निराहार

औरो को देते ख्याति सदा खुद को पर रखते हैं अनाम

सुलझाने कोई नई उलझन को प्रस्तुत करते नये सद्विचार

कर्तव्य परायण पत्रकार"

कवि प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध की ये पंक्तियां  शत प्रतिशत सत्य बैठती हैं , पत्रिका समूह के संस्थापक कर्तव्य परायण पत्रकार, श्री कर्पूर चंद्र कुलिश जी पर । 

        पत्रिका समाचार पत्र समूह के संस्थापक कर्पूर चंद्र कुलिश  कर्तव्य परायण , स्वतंत्र, निष्पक्ष व जुझारू पत्रकार हैं . कलम के धनी , स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सास्कृतिक मूल्यों के संरक्षक ,वेद विज्ञान के अध्येता श्रद्धेय कुलिश जी के अप्रतिम सामाजिक योगदान के चलते ही भारत सरकार ने उनकी स्मृति को अक्षुण्य बनाने के लिये ५ रुपये का डाकटिकिट भी जारी किया है .

         पत्रकारिता के संदर्भ में पौराणिक संदर्भो का स्मरण करें तो नारद मुनि संभवतः पहले पत्रकार कहे जा सकते हैं , इसी तरह  युद्ध भूमि से लाइव रिपोर्टिंग का पहला संदर्भ संजय द्वारा धृतराष्ट्र को महाभारत के युद्ध का हाल सुनाने का है . माना गया है कि  “पत्रकारिता पांचवां वेद है, जिसके द्वारा हम ज्ञान-विज्ञान संबंधी बातों को जानकर अपना बंद मस्तिष्क खोलते हैं ।”

        वर्तमान युग में  विश्व में पत्रकारिता का आरंभ सन् 131 ईसा पूर्व रोम में माना जाता है . तब  वहाँ “Acta Diurna” (दिन की घटनाएं) किसी बड़े प्रस्तर पट  या धातु की पट्टी  पर वरिष्ठ अधिकारियों की नियुक्ति, नागरिकों की सभाओं के निर्णयों और ग्लेडिएटरों की लड़ाइयों के परिणामों के बारे में सूचनाएं व  समाचार अंकित करके रोम के मुख्य स्थानों पर रखी जाती थीं .मध्यकाल में यूरोप के व्यापारिक केंद्रों में ‘सूचना-पत्र ‘ निकाले जाने लगे जिनमें कारोबार, क्रय-विक्रय और मुद्रा के मूल्य में उतार-चढ़ाव के समाचार लिखे जाते थे .  ये सारे ‘सूचना-पत्र ‘ हाथ से ही लिखे जाते थे . 15वीं शताब्दी के मध्य में योहन गूटनबर्ग ने छापने की मशीन का आविष्कार किया . असल में उन्होंने धातु के अक्षरों का आविष्कार किया . फिर समाचार पत्रो का मुद्रण शुरू हुआ .   दुनिया के पहले मुद्रित समाचार-पत्र का नाम था ‘रिलेशन’ ऐसा माना जाता है .

         हिंदी पत्रकारिता का उद्भव सन् 1826 से 1867 माना जाता है . 1867 से 1900 के समय को हिंदी पत्रकारिता के विकास का प्रारंभिक समय कहा गया है . 1900 से 1947 के समय को हिंदी पत्रकारिता के उत्थान का समय निरूपित किया गया है . 1947 से अब तक के समय को स्वातंत्र्योत्तर पत्रकारिता कहा जाता है . स्वातंत्र्योत्तर पत्रकारिता में अखबार, पत्रिकायें, रेडियो तथा २० वीं सदी के अंतिम दो दशको में टी वी पत्रकारिता का उद्भव हुआ . २१वी सदी के आरंभ के साथ इंटरनेट तथा सोशल मीडीया का विस्तार हुआ . पत्रिका समूह को गौरव प्राप्त है कि प्रौद्योगिकी के इन परिवर्तनो के साथ वह अपने पाठको से कदम से कदम मिलाकर बढ़ रहा है , पत्रिका की वेबसाइट , ईपेपर इसके सजीव उदाहरण हैं .

            देश की आजादी में पत्रकारो एवं समाचार पत्रो का अद्वितीय स्थान रहा है . स्वयं तिलक जी , महात्मा गांधी , व क्रांतिकारियो ने भी समय समय पर अनेक समाचार पत्र प्रकाशित किये , व उनके माध्यम से जन जागरण तथा सूचना का प्रसार किया . सूचना और साहित्य किसी भी सभ्य समाज की बौद्धिक भूख मिटाने के लिये अनिवार्य जरूरत है .  सामाजिक बदलाव में सर्वाधिक महत्व विचारों का ही होता है .लोकतंत्र में विधायिका , कार्यपालिका , न्यायपालिका के तीन संवैधानिक स्तंभो के बाद पत्रकारिता को  चौथे स्तंभ के रूप में मान्यता दी गई क्योकि पत्रकारिता वैचारिक अभिव्यक्ति का माध्यम होता है , आम आदमी की नई प्रौद्योगिकी तक  पहुंच और इसकी  त्वरित स्वसंपादित प्रसारण क्षमता के चलते सोशल मीडिया व ब्लाग जगत को लोकतंत्र के पांचवे स्तंभ के रूप में देखा जा रहा है .

        तकनीक के विकास के साथ इस आवश्यकता को पूरा करने के संसाधन बदलते जा रहे हैं .हस्त लिखित अखबार और पत्रिकायें , फिर टंकित तथा साइक्लोस्टायल्ड अथवा फोटोस्टेट पत्रिकायें , न्यूज लैटर या पत्रक , एक एक अक्षर को फर्मे पर कम्पोज करके तथा फोटो सामग्री के ब्लाक बनाकर मुद्रित अखबार की तकनीक , विगत कुछ दशको में तेजी से बदली है और अब बड़े तेज आफसेट मुद्रण की मशीने सुलभ हैं , जिनमें ज्यादातर  कार्य वर्चुएल साफ्ट कापी में कम्प्यूटर पर होता है . समाचार संग्रहण व उसके अनुप्रसारण के लिये  टेलीप्रिंटर की पट्टियो को अभी हमारी पीढ़ी भूली नही है . आज हम इंटरनेट से  ईमेल पर पूरे के पूरे कम्पोज अखबारी पन्ने ही यहाँ से वहाँ ट्रांस्फर कर लेते हैं . कर्पूर चंद्र कुलिश जी ने पत्रिका समूह में सदैव नये परिवर्तनो को सहज भाव से स्वीकार करने का जो व्यवसायिक वातावरण बनाया तथा युवा पत्रकारो को जो काम करने की स्वतंत्रता तथा छत्रछाया दी उसका ही परिणाम है कि आज पत्रिका समूह के देश के विभिन्न भागो से ढ़ेरो संस्करण प्रकाशित हो रहे हैं और एक विशाल टीम समूह इससे जुड़ी हुई है .

        वास्तव में पत्रकारिता भी साहित्य की भाँति समाज में चलने वाली गतिविधियों एवं हलचलों की डायरी  है । वह हमारे परिवेश में घट रही प्रत्येक सूचना को हम तक पहुंचाती है । देश-दुनिया में हो रहे नए प्रयोगों और कार्यों को हमें बताती है । इसी कारण विद्वानों ने पत्रकारिता को प्रतिदिन लिखा जाने वाला  इतिहास भी कहा है । वस्तुतः आज की पत्रकारिता सूचनाओं और समाचारों का संकलन मात्र न होकर मानव जीवन के व्यापक परिदृश्य को अपने आप में समाहित किए हुए है । यह शाश्वत नैतिक मूल्यों, सांस्कृतिक मूल्यों को समसामयिक घटनाचक्र की कसौटी पर कसने का साधन बन गई है । पत्रकारिता जन-भावना की अभिव्यक्ति, सद्भावों की अनुभूति और नैतिकता की पीठिका है । संस्कृति, सभ्यता और स्वतंत्रता की वाणी होने के साथ ही यह पत्रकारिता क्रांति की अग्रदूतिका है । ज्ञान-विज्ञान, साहित्य-संस्कृति, आशा-निराशा, संघर्ष-क्रांति, जय-पराजय, उत्थान-पतन आदि जीवन की विविध भावभूमियों की मनोहारी एवं यथार्थ छवि के दर्शन हम युगीन पत्रकारिता के दर्पण में कर सकते हैं । पत्रिका समूह के समाचार पत्र व पत्रिकायें इन मूल्यो के प्रहरी हैं . इसकी नींव के पत्थर संस्थापक कर्पूर चंद्र कुलिश जी ही हैं .

        कर्पूरचंद्र कुलिश (केसीके) की स्मृति में  11 हजार डॉलर का अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार स्थापित किया गया है , यह पत्रिका समूह की पत्रकारिता के पुरोधा को विनम्र श्रद्धांजली है यह प्रतिष्ठित  अवॉर्ड खोजी पत्रकारिता के लिए देश-दुनिया के श्रेष्ठ पत्रकारों को दिया जाता है। .  कर्पूरचंद्र कुलिश जी ने जाने कितनो की जीवनियां पत्रिका के माध्यम से प्रकाशित की पर स्वयं उनकी जीवनी और उन पर विस्तृत सामग्री  कम ही है . यह उनकी आत्म श्लाघा से दूर समर्पित भाव से कार्य करने की प्रवृति दर्शाती है . जरूरत है कि उन पर विशद विवेचनायें हो , उनके पत्रकार स्वरूप , साहित्यिक पक्ष  , जैन संस्कृति को वेद विज्ञान से जोड़ते आध्यात्मिक पक्ष , समाज सेवी भाव  , राजनैतिक पक्ष , स्वतंत्रता सेनानी स्वरुप तथा सफल व्यवसायिक पक्ष पर शोध कार्य किये जावें जिससे उनके अनुकरणीय जीवन से नई पीढ़ी के युवा पत्रकार  प्रेरणा पा सकें .

राजस्थान पत्रिका के संस्थापक, प्रखर पत्रकार एवं कवि श्री कर्पूर चंद्र कुलिश के जन्मशति पर्व पर मैं श्री गुलाब कोठारी जी उनके परिवार एवं राजस्थान पत्रिका के समस्त पत्रकारों व अधिकारी कर्मचारियों को बधाई देता हूं। पाठक ही सर्वोपरि और य एषू सुप्तेषु जागर्ति जैसे ध्येय वाक्यों के साथ उन्होंने पत्रकारिता की जो लौ जलाई वो आज भी लोकतंत्र की मूल भावना को रोशन कर रही है।


विवेक रंजन श्रीवास्तव 

A 233, ओल्ड मिनाल रेजिडेंसी 

जे के रोड

भोपाल 462023

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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