बड़े आर्थिक फैसले, मगर आम आदमी की मुश्किलें और बड़ी
[करों में कमी आई, पर जेब पर बोझ कम क्यों नहीं हुआ?]
ईरान-अमेरिका-इजराइल संघर्ष की तपिश में उबलता होर्मुज स्ट्रेट आज भारत की आर्थिक नब्ज़ पर रखा वह दबाव है, जो हर धड़कन के साथ महंगाई की सुई को और ऊपर चढ़ा रहा है। कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं और आयात पर निर्भर देश के लिए यह केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि आम आदमी की रोजमर्रा की जंग बन चुका है। सुबह की चाय से लेकर रात की रसोई तक, हर खर्च में ईंधन की आग झलक रही है। ऐसे समय में जब सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में 10-10 रुपये की कटौती का ऐलान किया, तो लगा जैसे राहत की पहली बूंद गिरी है—लेकिन जब पेट्रोल पंप पर कीमतें जस की तस रहीं, तो यह बूंद भी धुएं में बदलती नजर आई। सवाल अब और तीखा हो गया है—क्या यह राहत सिर्फ आंकड़ों की बाजीगरी है या सच में जनता तक पहुंचेगी?
सरकार का कदम निश्चित रूप से त्वरित और साहसिक कहा जा सकता है। राजस्व में भारी कमी का जोखिम उठाकर केंद्र ने पेट्रोल और डीजल पर कर घटाए, ताकि तेल कंपनियों के बढ़ते घाटे को थामा जा सके। पेट्रोलियम क्षेत्र के जानकारों के अनुसार कंपनियां प्रति लीटर भारी नुकसान झेल रही थीं, और यह कटौती उनके अस्तित्व को संतुलित करने के लिए जरूरी थी। लेकिन इस निर्णय ने एक नया द्वंद्व भी पैदा कर दिया—सरकार ने अपनी आमदनी छोड़ी, कंपनियों को राहत दी, पर उपभोक्ता को तत्काल राहत क्यों नहीं मिली? यही वह बिंदु है जहां नीति की मंशा और उसके प्रभाव के बीच की दूरी साफ दिखाई देती है।
दरअसल, ईंधन मूल्य निर्धारण की परतें इतनी जटिल हैं कि एक स्तर पर किया गया सुधार दूसरे स्तर पर जाकर निष्प्रभावी हो जाता है। अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, राज्यों द्वारा लगाए गए वैट, डीलर कमीशन और अन्य शुल्क—इन सबका संयुक्त प्रभाव यह रहा कि एक्साइज कटौती का लाभ सीधे उपभोक्ता तक नहीं पहुंच सका। नतीजा यह हुआ कि कीमतें बढ़ने से जरूर बचीं, लेकिन घट भी नहीं सकीं। आम आदमी के लिए यह गणित नहीं, बल्कि अनुभव है—जब जेब से उतना ही पैसा निकल रहा है, तो राहत का दावा खोखला लगता है।
इस महंगाई का दायरा ईंधन तक सीमित नहीं, बल्कि यह पूरे आर्थिक तंत्र में फैल चुकी है। परिवहन महंगा होने से खाद्य पदार्थों के दाम तेजी से बढ़े हैं, और इसका सीधा असर मध्यम और निम्न वर्ग पर पड़ा है। थोक मूल्य सूचकांक का उछाल इस बात का संकेत है कि बाजार में लागत का दबाव लगातार बढ़ रहा है। रसोई गैस, दूध, सब्जियां—हर जरूरी वस्तु अब पहले से ज्यादा महंगी हो चुकी है। यह स्थिति केवल खर्च बढ़ने की नहीं, बल्कि जीवन स्तर के गिरने की भी है, जहां आम आदमी अपनी जरूरतों को सीमित करने के लिए मजबूर हो रहा है।
विशेषज्ञों का आकलन इस संकट को और गहराई से समझने की ओर इशारा करता है। भारत की ऊर्जा निर्भरता और वैश्विक बाजार पर अत्यधिक आश्रय इस समस्या की जड़ है। जब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तनाव बढ़ता है, भारत की अर्थव्यवस्था पर उसका सीधा प्रभाव पड़ता है। हर 10 डॉलर की वृद्धि महंगाई को और बढ़ा देती है, जिससे मौद्रिक नीति की सीमाएं भी उजागर हो जाती हैं। यदि सरकार ने समय पर हस्तक्षेप न किया होता, तो स्थिति और भी गंभीर हो सकती थी। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि केवल तात्कालिक राहत से इस दीर्घकालिक समस्या का समाधान संभव नहीं।
यहीं पर सरकार की भूमिका और अधिक व्यापक हो जाती है। केवल करों में कटौती करना पर्याप्त नहीं, बल्कि ऊर्जा नीति को दीर्घकालिक दृष्टि से पुनर्गठित करना आवश्यक है। रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार को मजबूत करना, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना और आयात के स्रोतों में विविधता लाना—ये कदम अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुके हैं। यदि इन क्षेत्रों में ठोस निवेश और नीतिगत स्पष्टता लाई जाए, तो भविष्य में ऐसे संकटों का प्रभाव काफी हद तक कम किया जा सकता है।
इसके साथ ही, राहत उपायों को अधिक लक्षित और प्रभावी बनाने की जरूरत है। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के जरिए जरूरतमंद वर्ग को सीधी सहायता दी जा सकती है, जिससे राहत का असर तुरंत महसूस हो। राज्य सरकारों के साथ समन्वय स्थापित कर वैट में कमी लाने की दिशा में भी ठोस पहल जरूरी है। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया पारदर्शी हो, ताकि जनता को यह समझ आ सके कि कीमतों में बदलाव क्यों नहीं हो रहा। जब जानकारी स्पष्ट होती है, तो असंतोष की जगह समझ पैदा होती है।
महंगाई पर नियंत्रण केवल नीतिगत निर्णयों का मामला नहीं, बल्कि शासन की इच्छाशक्ति और दूरदर्शिता की परीक्षा है। आम जनता को राहत तब मिलेगी जब नीतियां कागजों से निकलकर वास्तविक जीवन में असर दिखाएंगी। आज जरूरत है एक ऐसे दृष्टिकोण की, जो संकट को अवसर में बदले और भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाए। जब पेट्रोल पंप पर कीमतें सच में घटेंगी और बाजार में राहत दिखेगी, तभी यह भरोसा लौटेगा कि सरकार के फैसले केवल घोषणाएं नहीं, बल्कि समाधान भी हैं।
- प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
शिक्षाविद्
बड़वानी (मप्र)
ईमेल: rtirkjain@gmail.com
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