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काव्य : बुजुर्ग - डा.नीलम , अजमेर


 

काव्य : 

बुजुर्ग


पीड़ाओं को पाले हैं

या पीड़ाओं ने 

पाला था

न जाने खुदा ने बुजुर्गों के नसीब में 

क्या इंतजार लिख डाला था !


खून-पसीने की मेहनत से थी

गृहस्थी सजाई 

थे पुत्र रत्न समान जो

थे जीवनभर की

कमाई

मोक्ष की लालसा में

बेटियों की थी चिता जलाई

वही नकारे-नालायक

निकल गये

बेचारे बाप को

अकेला छोड़ गये।


हर बार बेटों की

उन्नति पर

छाती चौड़ी होती थी

खुशियों की चमक 

संग

आशिर्वाद की बरसात

होती थी

मिला जब वीजा

विदेशगमन का

पाँव नहीं तब जमीं पर

पड़ा था 

पूरा मौहल्ला सर

पर चढ़ा था।


होते ही परदेसी

बच्चे

भूल गये संघर्ष

पिता का

चंद दिनों तो रखा राब्ता

फिर अपना सुहाना

संसार सजा था

थी पत्नी ओ'पत्नी-

परिवार

पिता का फिर न कोई

मन में

स्थान रहा था।


बेबस पिता मोह-आस

 में बैठे

तीज-त्यौहार सब 

निकले रीते

हर दिन कानों को

डाकिये की

आहट का इंतजार

फोन-स्क्रीन को लंबी

घंटी का इंतजार

दिन महीनों में,महीने

सालों में खिसक 

गये

उम्मीद के सारे सपने

टूट गये

जो कह गये बापू

बहुत कमाकर तकलीफ

तुम्हारी मिटाएंगे

विदेश में

आपका सुंदर घर

बनाएंगे

सबकुछ बिसर गया

बस.......

बूढ़े पिता की

आँखों का इंतजार

दहलीज पर आकर

बैठा था।


     - डा.नीलम , अजमेर

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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