नज़र नहीं, नज़रिया बदलिए : भारत की पहली सर्टिफाइड दृष्टिदिव्यांग आर.जे. लक्ष्मी की बेबाक दास्तां
प्रस्तुति: समावेशी समाज की एक नई आवाज़
स्थान: देहरादून, उत्तराखंड
एक पहचान, जो परिभाषा बदल दे
देहरादून, उत्तराखंड की शांत वादियों से निकलकर जब एक आवाज़ रेडियो की तरंगों पर गूंजी, तो उसने न केवल लोगों का मनोरंजन किया, बल्कि सदियों से चली आ रही रूढ़ियों को भी चुनौती दी। यह आवाज़ है लक्ष्मी की। संगीत में स्नातक लक्ष्मी आज किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। वे भारत की पहली सर्टिफाइड विजुअली इम्पेयर्ड (दृष्टिदिव्यांग) आर.जे. हैं।
लेकिन लक्ष्मी खुद को केवल इस उपलब्धि तक सीमित नहीं रखतीं। वे एक कुशल स्टोरीटेलर हैं, जो अपनी कहानियों से समाज के बंद दिमागों की खिड़कियाँ खोलती हैं। 'रेडियो प्लेबैक इंडिया' के साथ बतौर पॉडकास्टर काम कर चुकी लक्ष्मी आज अपना खुद का यूट्यूब चैनल चलाती हैं। उनका मानना है कि कहानियाँ केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि ये इंसान को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं। लक्ष्मी की सबसे बड़ी विशेषता उनका 'बेबाक अंदाज़' है। वे उन चंद लोगों में से हैं जो सच को बिना किसी चाशनी के परोसने का साहस रखते हैं।
तरक्की के दौर में पीछे छूटती सोच
लक्ष्मी लेख की शुरुआत एक चुभते हुए सवाल से करती हैं। वे कहती हैं, "सालों से हमारे देश ने विज्ञान से लेकर कला तक हर क्षेत्र में दुनिया को अपनी ताकत दिखाई है, लेकिन क्या हम अपनी सोच बदल पाए हैं?" लक्ष्मी का अनुभव बताता है कि समाज आज भी अंधविश्वास के साये में जी रहा है। आज भी जब एक दृष्टिदिव्यांग व्यक्ति बाहर निकलता है, तो लोग उन्हें 'अचरज' भरी नज़रों से देखते हैं।
लक्ष्मी बताती हैं कि लोग अक्सर उनसे पूछते हैं— "आप फोन कैसे चलाती हैं? आप तैयार कैसे होती हैं?" ये सवाल केवल जिज्ञासा नहीं, बल्कि उस अज्ञानता का प्रतीक हैं जो समाज को मुख्यधारा से दूर रखती है।
मिथकों का खंडन और 'इनक्लूजन' की नई परिभाषा
अद्भुत शक्तियों का भ्रम
लक्ष्मी समाज के उस प्रचलित झूठ पर कड़ा प्रहार करती हैं, जिसमें माना जाता है कि दृष्टिदिव्यांगों के पास कोई 'अद्भुत या दैवीय शक्ति' होती है। वे बहुत ही तार्किक ढंग से कहती हैं, "अगर हमारे पास सच में कोई अद्भुत शक्ति होती, तो आज हमें अपने अधिकारों के लिए लड़ना नहीं पड़ता।" इसी तरह, समाज यह मान लेता है कि हर दृष्टिदिव्यांग व्यक्ति संगीत में माहिर होगा। लक्ष्मी स्पष्ट करती हैं कि कला ईश्वर की देन और मेहनत का परिणाम है। यदि हर दृष्टिदिव्यांग संगीतज्ञ होता, तो आज बॉलीवुड पर सिर्फ उन्हीं का कब्जा होता। अपनी योग्यता के बावजूद, काम न मिलना और क्षमताओं पर शक किया जाना आज भी इस समुदाय की सबसे बड़ी त्रासदी है।
नाम नहीं, आत्मविश्वास चाहिए
लेख में लक्ष्मी ने 'शब्दों के खेल' पर गंभीर विमर्श किया है। सरकार और समाज ने समय-समय पर 'विकलांग', 'दिव्यांग', 'स्पेशल चाइल्ड' जैसे नाम दिए हैं। लक्ष्मी पूछती हैं— "क्या हमें वाकई इन भारी-भरकम नामों की ज़रूरत है?" वे एक क्रांतिकारी उदाहरण देती हैं: जब व्यक्ति वृद्ध होता है, तो उसकी शारीरिक क्षमताएँ कम हो जाती हैं, लेकिन हम उसे 'डिसेबल्ड' की श्रेणी में नहीं रखते क्योंकि हम उसे जीवन का एक स्वाभाविक पड़ाव मानते हैं। तो दृष्टिबाधिता को एक आम शारीरिक स्थिति के रूप में क्यों नहीं देखा जा सकता? लक्ष्मी के अनुसार, हमें नामों से ज्यादा आत्मविश्वास और आत्मनिर्भरता की ज़रूरत है।
बदलाव का रास्ता: तकनीक और समानता
सच्चा 'इनक्लूजन' (Inclusion) तब होगा जब व्यवस्था की नींव समानता पर रखी जाएगी। लक्ष्मी कुछ ठोस सुझाव देती हैं:
तकनीकी उपलब्धता: दृष्टिदिव्यांगों को दया नहीं, बल्कि JAWS और NVDA जैसे स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर चाहिए।
सकारात्मक विज्ञापन: सरकार को विज्ञापन जगत के माध्यम से दृष्टिदिव्यांगों की एक सामान्य और सक्षम छवि पेश करनी चाहिए।
समान व्यवहार: तकनीक और सुविधाओं का लाभ लेते समय उनके साथ 'अलग' व्यवहार न किया जाए।
निष्कर्ष: अपनी आवाज़ खुद बनें
लक्ष्मी का संदेश स्पष्ट है— समाज से उम्मीद करने से पहले हमें खुद को एक आम नागरिक की तरह प्रस्तुत करना होगा। यदि हम अपनी बात तर्क और स्पष्टता के साथ रखेंगे, तो दुनिया हमें सुनेगी।
"जब तक आप अपने विचार खुलकर नहीं रखेंगे, कोई आपकी बात नहीं समझ पाएगा। आत्मविश्वास ही वह कुंजी है जो समाज की बेड़ियों को तोड़ सकती है।"
लक्ष्मी की यह यात्रा केवल उनकी व्यक्तिगत सफलता नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए एक मशाल है जो अपनी 'कमी' को अपनी 'ताकत' बनाने का जज़्बा रखता है।
लेखिका: लक्ष्मी चौहान
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