सबके राम सबमें राम
सबके *राम* ये सच है!
पर सबमें *राम*
ये कितना सच है,आज के परिवेश में?
क्या ?उतना ही जितना राम नाम सच है!
क्या? उतना ही जितना राम मर्यादित थे!
क्या उतना जितना राम आज्ञाकारी पुत्र थे!
क्या?
उतना जितना वो प्रजा के लिए एक आदर्शवादी राजा थे!जिसने देश और प्रजा की खातिर पत्नी का परित्याग किया
और सबसे बड़ा प्रश्न? जो कि आज के परिवेश की सबसे ज्वलंत समस्या है कि राम का चरित्र क्या हर पुरुष में विद्यमान है?
आज का ये विषय ऐसे अनेक प्रश्नों को जन्म देता हुआ है
क्योंकि राम का वो चरित्र जिसपर एक पूरे महाग्रंथ की रचना की गई, जिसमें उनके उन मानवीय गुणों का बखान किया गया जो जीवन की महत्ता का दर्पण है,और इस दर्पण में देखते हुए मनुष्य अपने भीतर उन राम के गुणों का पदार्पण कर अपने जीवन को पुरुषोचित कर्तव्य का निर्वहन करने की मर्यादा सिखाता है।
पर क्या? उसका अंश मात्र भी आज क्या *राम*इस संसार में व्याप्त हैं,
क्या राम के पदचिन्हों पर चलने वाला क्या एक भी पुरुष यहाँ विद्यमान है,जिसमें राम केवो सब गुण समाहित हों, हाँ या नहीं-
शायद हाँ! या शायद नहीं!
अब शायद क्यों ,कुछ अजीब है ना!
क्योंकि राम एक पत्नीव्रत और मर्यादित पुरुष थे यानि *मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम*
पुरुषोत्तम यानि पुरुषों में उत्तम
लेकिन राम की मर्यादा केवल मानक नहीं थी ,उन सब गुणों की एक संग्रहित मानवीय गुणों की संयोजन शक्ति थी,जो एक पुरुष को परिपूर्ण बनाती है,जो जीवन के हर उस रिश्ते से बंधी थी ,जो नके जीवन में बंधे थे,ये मर्यादा किसी एक रिश्ते के लिए सीमित नहीं थी,
राम जन्म हुआ था मानवीय गुणों को प्रतिष्ठित करने की संसार चलाने की नींव तैयार कर उन पर चलने की नीति पर,कि कौन से मानवीय गुण एक पुरुष में हों,जिससे संसार की गतिशीलता सुव्यवस्थित होकर चल सके।
जिसमें हर उस रिश्ते का जिक्र हो,जो हमें जन्म लेने का कारण बताते हैं!
प्रथम-गुरुवचन की मर्यादा
पिता के वन की मर्यादा
भातृ प्रेम और अधिकार की मर्यादा
एक पत्नीव्रत पालन की मर्यादा
माता की आज्ञानुसार वन गमन की मर्यादा
प्रजा सुखाय नियम पर पत्नि परित्याग की मर्यादा
एक राजा होकर अश्वमेघ यज्ञ का आयोजन कर एक न्यायप्रिय राजा होने की मर्यादा।
अब कहाँ राम ने अपने चरित्र का ह्रास किया?
कहाँ राम अपने जीवन दर्शन में खरे नहीं उतरे?
कहीं रामायण में ये लिखा गया है क्या कि राम ने पुरुष धर्म का पालन नहीं किया,नहीं, लिखा ना! तभी तो उन्हें,मर्यादापुरुषोत्तम कहा गया लेकिन फिर आज का मनुष्य उसी रामायण को पढ़कर राम की जगह रावण क्यों बन रहा है,वह भी उसका एक ही पहलू देखकर,रावण बनने के लिए भी उसका पूर चरित्र जानना आवश्यक है,लेकिन मनुष्य बिना सोच विचार के आज का मनुष्य,कारण और निवारण जाने बिना,अपने बुद्धि और विवेक से काम कर रहा है,आज क मनुष्य राम के चरित्र का क्या मतलब निकाल रहा है,आज का पुरुष क्या कर रहा है,समझ नहीं आता-सर्वत्र स्तरी का परित्याग हो रहा है,माना कि कुछ शूर्पनखा एं भी होतीं हैं,जिनके नाक-कान कटना आवश्यक होता है,लेकिन हर किसी को शूर्पनखा तो नहीं है ना, वह सीता ,सावित्री नही है,लेकिन एक स्त्री है,जिसकी रक्षा करना पुरुष का काम है,लेकिन जब वो स्वयं ही रावण बन जाए तो इसे स्त्री की नियति का नाम दिया जाए, क्या राम दर्शन में यही बखान किया गया है कि स्त्री परित्यक्ता है,फिर पुरुष कहाँ मर्यादित है,ये विश्लेषण कौन, कहाँ,कब करेगा,
क्या राम की चरित्रता,जीवन के कर्तव्यों पर आधारित है,अगर हाँ!तो,कोई आज सहिष्णु क्यों नहीं है,
क्यों , अपने कर्तव्य को भूल रहा है हर प्राणी?
चूंकि कलयुग का प्रभाव इस कदर सर चढ़कर बोल रहा है,कि वह अपने अंदर विद्यमान राम के गुणों को नहीं पहचान पा रहा है,या उसमें वे गुण होते हुए भी समय के प्रवाह को नहीं रोक पा रहा है,क्योंकि कलयुग के समय के प्रवाह की गति इतनी तीव्र है,कि उसके साथ चलना असंभव हो रहा है,इससे यह कहाजा सकता है ,कि सबके राम तो हैं,लेकिन क्या सबमें राम हैं,शायद हाँ,या शायद नहीं!
- किरण मोर कटनी,म.प्र.
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