काव्य :
पुस्तकें और मोबाइल
अलमारी साहित्य की,बंद थी कुछ महीनों से,
खोली तो जैसे पड़ी हो कई लावारिस लाशें।
कोई सड़ गल गई थी और कोई पड़ गई थी पीली,
कुछ की अभी भी घुट रही थी साँसे।
किसी के जिस्म में पड़ी दरारें,
किसी की चमड़ी उधड़ गई थी।
देखकर उनकी ऐसी जर्जर हालत,
सांसें मेरी अटक गई थी।
चर्चा हो रहीं चारों ओर मुथा,
कौन है इन पुस्तकों का कातिल।
किसने किया ये जुर्म भयानक,
साहित्यकारों का दिल घायल।
पकड़ा गया गुनहगार वो आखिर,
जो है हम सबको जान से प्यारा।
और वो कातिल है हर दिल अजीज,
ये प्यारा सा मोबाइल हमारा।
- कवि छगनलाल मुथा-सान्डेराव , मुम्बई
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