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दीपक गिरकर के उपन्यास "एक बैंक मैनेजर की डायरी" का लोकार्पण सम्पन्न : उपन्यास में आंतरिक द्वंद्व होना चाहिए - सूर्यकांत नागर


 

दीपक गिरकर के उपन्यास "एक बैंक मैनेजर की डायरी" का लोकार्पण सम्पन्न 

उपन्यास में आंतरिक द्वंद्व होना चाहिए - सूर्यकांत नागर

इंदौर । नगर की साहित्य संस्था क्षितिज के द्वारा किए गए आयोजन में शहर के ख्यात समीक्षक और लेखक श्री दीपक गिरकर के उपन्यास "एक बैंक मैनेजर की डायरी" का लोकार्पण वरिष्ठ साहित्यकार श्री सूर्यकांत नागर के करकमलों से श्री मध्यभारत हिंदी साहित्य समिति के सभागार में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में संपन्न हुआ। इस अवसर पर श्री सूर्यकांत नागर ने कहा कि उपन्यास में आतंरिक द्वंद्व होना चाहिए। इस कृति को उसकी भाषा शैली की दृष्टि से डायरी कहना ही उचित होगा। श्री दीपक गिरकर समीक्षा और आलोचना में भी अपनी दखल रखते हैं इसलिए उन्होंने कृति की विषय वस्तु को भी उसी दृष्टि से रखा।

कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शोभा जैन अपने उद्बोधन में कहा कि यह कृति समकालीन समय का सहज दस्तावेज है। डायरी की शक्ल में लिखा उपन्यास बैंकिंग व्यवस्था और खामी का समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण व्यक्त करती है जिसमें लेखक दीपक गिरकर ने बैंकिंग राजनीति के आंतरिक परिवेश पर भी अपनी पैनी नजर रखी है। उपन्यास के केंद्रिय पात्र भैया जी कॉमरेड हैं जिनका मूल नाम गिरीश है। जो कृति में अपने किरदार से कॉर्पोरेट सेक्टर की कईं परतें खोलते है। कृति निजी स्तर पर सहेजे प्रसंगों घटनाओं और तत्सबंधी बौद्धिक भावनात्मक प्रतिक्रियाओं का लेखा जोखा है। अपनी भाषा और कथ्य की दृष्टि से यह उपन्यास विधा के बजाय डायरी विधा के अधिक निकट है, इसलिए इसमें हम औपन्यासिक कथ्य और  मानक एवं परिष्कृत भाषा की बहुत अपेक्षा नहीं कर सकते। कृति बैंकिंग कार्यक्षेत्र की अकादमिक गतिविधियों के साथ कुछ आदर्श पात्रों जैसे रमण, शोभा मैडम, संदीप, दिलीप दफ्तरी रमेश आदि के द्वारा उचित निदेशन सम्पन्न संकेत भी देती है।

कुछ सूत्र वाक्य इसे मंचन योग्य भी बनाते हैं जैसे -

- नौकरी में इंसान नौकर बन जाता है। (पृष्ठ 38)

- लक्ष्मण और विजय को देखकर लगता है चापलूसी जीवन का अनिवार्य अंग है। (पृष्ठ 9)

- एनपीए वसूली में सबको एक ही लाठी से हाँकने का नियम सफल नहीं होता। अलग -अलग चूककर्ताओ के लिए अलग -अलग तरीके अपनाने पड़ते हैं। (पृष्ठ 74)

इस तरह के सूत्रों  साथ कृति व्यंग्य और लघुकथा दोनों के स्वाद को स्पर्श देती है। समकालीन समय का सहज दस्तावेज यह कृति युवाओं को एक बार जरूर पढ़नी चाहिए।

सारस्वत अतिथि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती अंतरा करवड़े ने अपने उद्बोधन में कहा "एक बैंक मैनेजर की डायरी" कृति जीवन की बैलेन्स शीट को बराबर करती है। इस कृति से दो चार होने के बाद दो सिद्धांतों से जुड़े तथ्य सबसे पहले सामने आते हैं। एक राजा को एक बार रास्ते में चलते समय पैर में कंकड़ चुभ गया। सिरफिरे राजा ने घोषणा कर दी, कि राज्य की पूरी ज़मीन पर गालीचा बिछा दिया जाए। तब परेशान मंत्रिमंडल ने उनके गुरु की शरण ली, जिसके फलस्वरुप राज्य की पूरी ज़मीन पर गलीचा बिछाने के स्थान पर, राजा के पैरों के लिये आरामदेह जूतियां बनवाई गई।

कुछ ऎसे ही, अपने सिद्धांतों पर अडिग रहकर, समय प्रबंधन का हाथ पकड़े हुए इस कृति का बैंक मैनेजर अपने पैरों में अनुशासन, क्रमिक विकास और जानकारी से भरे अनुभव की आरामदायक जूतियां पहनकर अपने बैंकिंग के कार्यकाल को स्वर्णिम बना देता है।

और दूसरी बात, जिसे हम कॉर्पोरेट भाषा में ब्राण्ड की छवि या इमेज कहते हैं। इसका उदाहरण देखें, तो आज भी आप ग्रामीण भागों में जाएं, तो कुछ वाक्य ध्यानाकर्षण प्रस्ताव देते प्रतीत होते हैं, जैसे ’कोलगेट कर लिया क्या?’ या फिर ’एल आई सी बना लिया क्या?’ यहां पर मुखमार्जन करने या जीवन बीमा करने जैसे तथ्यों पर इसके इन तथाकथित ब्राण्ड का प्रभाव इतना गहरा है कि हम ये नही कहते कि बीमा करवा लिया है क्या या दांत साफ कर लिये हैं क्या? इन्हीं तथ्यों का सीधा प्रभाव सामने आता है, जब हमें पता चलता है कि कोई व्यक्ति बैंक में काम कर चुका है, तब उस बैंक के ब्राण्ड के साथ ही आंकड़ों की समझ, समय प्रबंधन का पाठ और अनुशासन के सबक साथ ही चलते हैं। अर्थात बैंक का साथ और उसका ब्राण्ड, व्यक्ति को जीवन के हिसाब की सही समझ दे देता है, वह भी अप्रत्यक्ष रुप से।

लेखक श्री दीपक गिरकर का एक विशिष्ट डायरी शैली में लिखा गया उपन्यास आपको एक स्वादिष्ट और वैविध्यपूर्ण बुफे भोजन की तरह का अनुभव देता है। इसमें पाठक की प्लेट में सिर्फ वही है जो वह वास्तव में पढ़ना चाहता है। तथ्यों को लेकर कोई भूमिका नहीं है, अनावश्यक संवेदनात्मक कोलाहल नहीं है,  किसी चरित्र को लेकर बिना बात के लंबी गाथाएं नही और घरेलू मोर्चे की सदा सर्वदा वाले स्वभाव की घटनाओं का विस्तारित वर्णन नहीं है। इस उपन्यास के साथ चलते हुए आप भी बैंकिंग जैसे गूढ़, रुखे और आंकड़ों के इर्द गिर्द घूमते विषय को रस लेकर सीखने लगते हैं। कार्यालयीन घटनाओं, औपचारिकताओं और कार्यपद्धतियों का बारीकी से लेकिन बोरियत से बचते हुए सीधा सीधा वर्णन धीरे से कब आपको वहां के किसी कर्मचारी या प्रबंधक के खोल में प्रवेश करा देता है और आप भी अपनी ज़िम्मेदारी को सही मानकर कुर्सी सम्हाल लेते हैं, यह आपको भी पता नही चलता।

1977 के जून माह से यह बैंकिंग की यात्रा शुरु होती है, और यही लगता है कि इस उपन्यास का मुख्य पात्र कभी बैंक से घर गया ही नहीं। यह एक तरीके से सही भी लगता है क्योंकि इस एक संसार में बहुत से उप संसार मौजूद हैं और श्री गिरकर हमें उस उप संसार की एक छोटी सी परंतु सशक्त झलक दिखलाते हैं।

आज आर्थिक लेन देन को फोन के टच स्कैन से पूरा करते हम सभी, यह नही जानते कि इस सुविधा और आधारभूत संरचना के पीछे कौन सा तकनीकी संजाल मौजूद है। इसके अलावा, किन नीतियों का पालन कर एक सार्वजनिक आर्थिक आधार तैयार किया जाता है और कैसे समाज के प्रत्येक वर्ग को उनकी आवश्यकता के अनुसार आर्थिक सुविधाएं प्रदान कर उनके जीवन को सरल किया जाता है। इस पूरी कार्य नीति से इस उपन्यास में दो चार होते हुए कई बार आश्चर्य होता है कि एक सामान्य सी सुविधा भी जब आप अपने विविध परिवेश से आने वाले करोड़ों ग्राहकों को देते हैं, तब उसके पीछे कितना बड़ा तंत्र काम कर रहा होता है।

इस पुस्तक में वैसे तो नायक, नायिका, खलनायक, चरित्र नायक आदि नहीं है। परंतु हम बारीकी से देखें, तो लेखक स्वयं नायक है, बैंक उसकी नायिका है, भैयाजी जैसे व्यक्ति इसके खलनायक है और विविध शाखाओं में अपनी पदस्थापना के दौरान आने जाने वाले विश्वस्त, स्नेहिल, कुछ घाघ और कुछ सरल सहकर्मी विविध चरित्र नायकों के समान इस उपन्यास के रजत पटल पर अपनी उपस्थिति दर्शाते हैं। इसके अलावा एक विशेष उपस्थिति के रुप में एनपीए भी अपनी मंचीय अदाकारी में कम नही है।

नायक की बात करें, तब एक मध्यमवर्गीय परिवार से निकला हुआ उत्साही, मेहनतकश और स्वप्निल आयु का युवक बैंकिंग के क्षेत्र में प्रवेश कर अपने जीवन को नवीन आयाम देता दिखाई देता है। इस व्यक्ति में मुख्य गुण ईमानदारी, अनुशासन, अनीति के प्रति बिना समझौते का विरोध और निरंतरता जैसे सद्गुण मौजूद हैं। अपने काम के प्रति जुनून, सीखने की अदम्य इच्छा और साथियों के प्रति सद्भाव, अन्याय का विरोध जैसे गुण एक आदर्श नायक के रुप में लेखक को स्थापित करते हैं।

नायक केवल बैंकिंग, उसकी नीतियां, आंकड़ों का खेल, बैलेन्स शीट मिलान करना और अपनी पदोन्नति के लिये काम करना तक ही सीमित नहीं  है। पुस्तक में उसके बैंकिंग जीवन के उतार चढ़ावों से परे एक समानांतर पारिवारिक जीवन है, स्नेही पत्नी विनीता है, दो मेधावी बेटियां हैं। इसके अलावा परिवार के साथ विविध पर्यटन स्थलों पर घूमने के विविध वर्णन इस उपन्यास को सुरम्य बनाते हैं। यह सही है कि बैंकर एक रुखा सा व्यक्तित्व होगा यह अपेक्षित विचार सभी के मन में होता है लेकिन यह बैंकर पर्यटन का शौकीन है, यह अपने बैंककर्मियों को भी परिवार समान मानकर उनके सुख दुख की सुध लेता है। यह धार्मिक भी है और जहां शिमला मनाली घूमता है वहीं गिरनार की दस हज़ार से अधिक सीढ़ियां चढ़कर श्री दत्त गुरु पादुका के दर्शन भी उतनी ही श्रद्धा से करता है।

एक ऎसा व्यक्तित्व, जो अपने समाज के प्रति देय को भी समझता है, पारिवारिक कर्तव्यों का निर्वहन बिना थके करता है और परेशानी या अवरोध आने पर भी नकारात्मक नहीं होता, समाधान खोजने में विश्वास करता है।

आर्थिक व्यवहार, खाते, ऑडिट, एनपीए, सीसी लिमिट और ओवरड्यू जैसी शब्दावली के बीच आगे बढ़ता यह उपन्यास आपको मुख्य नायिका के रुप में बैंक जैसी संस्था के सर्वगुण संपन्न सौन्दर्य के दर्शन करवाता है। जैसे कहा जाता है, कि किसी स्त्री का सौन्दर्य परिभाषा में नही बांधा जा सकता। एक सुरुचिसंपन्न प्रकार से सुसज्जित स्त्री भी कभी कभी वात्सल्य और स्नेहरस में डूबी और अपने व्यक्तित्व के प्रति उदासीन गृहिणी के समक्ष फीकी लग सकती है। कुछ वैसे ही, बैंक नामक संस्थान के आर्थिक व्यवहार, लाभ हानि खाते, दायित्व और संपत्तियों का मेल और वसूली के कामों के साथ यह संस्था सर्वगुणसंपन्न नायिका के रुप में पूरे उपन्यास में अपनी उपस्थिति में पाठकों को कई बार आश्चर्य में डालती है तो कई बार हम आदर भाव से भर उठते हैं।

इस उपन्यास में हम कभी नायक के घर, उसकी पत्नी, गृहस्थ जीवन आदि की कल्पना शायद ही कर पाएं, चूंकि पूरी डायरी कार्यालयीन व्यवहार और उतार चढ़ावों का हिसाब किताब देती है, हम भी उन घटनाओं में ही संवेदना, विविध रस, भावनाएं और कल्पनाएं आदि का सृजन कर लेते हैं। बैंक में ही करुणा का सृजन होता है, वहीं पर चल रही राजनीति और वर्चस्व के खेल में पारिवारिक कलह के समान का दृश्य भी उपस्थित होता है, एक नन्ही प्रेम कहानी भी आकार लेती है और अनेक भ्रम टूटते हैं, मिथक समाप्त होते हैं।

यह हमारे जीवन का प्रतिनिधित्व करती दिखाई देती है। संपूर्ण समर्पण के पश्चात भी हमेशा ही यश आपको नहीं  मिलता, आप कितने ही अच्छे रहें, परिवार के सभी सदस्यों के हिसाब किताब हमेशा ही अलग दिशाओं में ही जाते हैं। कुल मिलाकर आप अपने काम को पूरे अनुशासन, समय प्रबंधन और तरीके से करें, तब छोटी परेशानियों को छोड़ देने पर आप प्रगति तो करते ही हैं, फिर वह सामान्य जीवन हो या बैंक का कामकाज।

भैयाजी नामक खलनायक की उपस्थिति को लेखक ने इतने बारीक और महीन बुनावट के साथ इस डायरी उपन्यास में जोड़ा है, कि उनके धूर्त, चालाक और अहंकारी व्यक्तित्व को लेकर पहले से ही पाठक के मन में घृणा का बीज रोपित हो जाता है। व्यवस्था के पोलेपन का लाभ लेता, अपनी कार्यकुशलता की कमियों को अपने अहंकार, स्वार्थ और राजनीति के बल पर ढंकता हुआ यह खलनायक समय समय पर उपस्थित होता है। वह अपने सारे नकारात्मक हथकण्डे अपनाकर व्यवस्था को अपने तरीके से चलाना चाहता है।  उसके लिये पद, अनुशासन, कार्य के प्रति समर्पण और प्रगति का कोई मोल नही है। उसके व्यक्तित्व को, जीवन के कटु सत्य के समान ही, जीवन की थाली में परोसी गई नियति मानकर चलने के अलावा कई बार कोई रास्ता दिखाई नहीं देता।

यही स्थितियां हमारे जीवन में सामान्य रुप से बनती हैं। हम अनिवार्य बुराई के नाम पर अनेक अन्याय सहते हैं। और यही हमारा उपेक्षा भाव इन खलनायकों की करतूतों के लिये खाद पानी बनता है। इस उपन्यास में नायक इस खाद पानी की आपूर्ति बंद करता है, अपनी मेहनत के बल पर पाए गए पद का सदुपयोग करता है और खलनायक का अहंकार धीरे धीरे चूर होता है। उसके साथ जीवन अपना न्याय करता है और उसका पारिवारिक स्वरुप बिखरता जाता है। बावजूद इसके, नायक समय समय पर उसकी वयोगत मर्यादाओं का पूरा सम्मान भी करता है। ये खलनायक ही कई बार हमें बल भी देते हैं, कि हम अपनी क्षमताओं का पूरा पूरा दोहन कर पाएं। यह पुस्तक हमें अनेक विषयों का मार्गदर्शन भी करती है। विविध क्षेत्रों के प्रतिनिधियों को ऋण देने के पीछे बैंक की सोच क्या होती है, ॠण की वसूली के समय क्या नीतियां ध्यान में रखी जाती हैं, औद्योगिक आर्थिक लेन देन, कृषि संबंधी लेन देन, व्यक्तिगत लेन देन कितने प्रकार के और किस नियम के आधीन होते हैं जैसी जानकारियां एकदम सीदे सरल स्वरुप में सामने आती हैं।

इस पुस्तक की विशेष उपस्थिति अर्थात एनपीए। नॉन परफॉर्मिंग असेट्स को लेकर एक सामान्य मनुष्य के मन में पहले तो भय की स्थिति बनती है। किसी का भी खाता एनपीए होना सही तो नही माना जा सकता। एक ग्राहक के रुप में इसकी ओर देखने के बजाय यह उपन्यास हमें इसकी ओर बैंक की दृष्टि से देखना सिखाता है।

नायक द्वारा ए बी और सी प्रकार से कैसे एनपीए खातों का वर्गीकरण किया जाता है, कैसे एक वसूली टीम गठित कर उसमें सरल, कठिन और दुरुह प्रकार के खातों से वसूली की नीतियों का निर्धारण किया जाता है! एक किसान, सामान्य नौकरीपेशा व्यक्ति, एक उद्योग संचालक और कोई प्रभावशाली व्यक्ति का रिश्तेदार, इन सभी के साथ एनपीए वसूली कैसे की जाती है और कैसे किसी बैंक को जीरो एनपीए के स्तर तक लाया जाता है! यह एक उत्साही टीम द्वारा अपनी पूरी तैयारी, जोश, अवरोध पार करने का जुनून और जीतने की अदम्य इच्छाशक्ति के साथ प्राप्त किया जाने वाला लक्ष्य वास्तव में मेहनत, रणनीति और विशुद्ध प्रदर्शन के आधार पर जीते जाने वाले विश्वकप के समान ही रोमांचक होता है। इसमें नायक अपने प्रभावशाली मित्रों के व्यवस्थापना सहयोग और बैंक से बाहर निकलकर भी कैसे विविध नीतियों से एनपीए को शून्य किया जा सकता है, इस मिशन का रोमांचक वर्णन किया है।

नायक की प्रबंधन क्षमता का लोहा प्रत्येक पायदान पर मानने का मन करता है। वह पारिवारिक स्नेह का प्रबंधन हो या कार्यालय के कर्मचारियों के बीच समन्वय को लेकर होने वाली व्यवस्थाएं, नवीन तथ्यों को सीखना हो या जीवन की चुनौतियों के समक्ष खड़े होने की आत्मिक शक्ति। यहां तक, कि सहकर्मियों या अधीनस्थ कर्मचारियों द्वारा बैंक की कार्य पद्धतियों और कानूनी जटिलताओं को लेकर किये गए प्रश्नों के सविस्तार उत्तर देता हुआ नायक हमें कहीं से भी उपदेशक नहीं  लगता। हम उन प्राप्त जानकारियों के आधार पर बैंक की कार्यप्रणाली और जटिलताओं को जानकर बैंकिंग के प्रति आदर से भर उठते हैं। यहां पर आंकड़ों में उलझा नायक साहित्य के प्रति भी समर्पित है, वह अपनी साहित्य और व्यंग्य विधा पर आधारित ही नही, बैंकिंग में एनपीए को शून्य करने को लेकर अपने अनुभवों के सार स्वरुप भी एक पुस्तक प्रस्तुत कर साहित्य जगत में जोरदार उपस्थिति दर्ज करवाता है।

कुल मिलाकर यह डायरी हमें देश की विशिष्ट संस्था और अर्थव्यवस्था की रीढ़, अर्थात बैंकिंग को लेकर महत्वपूर्ण जानकारियां देती है, समृद्ध करती है साथ ही नायक, एक बैंकर के रुप में जीवन के उतार चढ़ावों की बैलेन्स शीट और लाभ हानि खाते का मिलान करने का मार्गदर्शन करती है।

कुछ स्थानों पर पुनरावृत्ति वाचन के प्रवाह में अवश्य अवरोध बनती है। जैसे भैयाजी के व्यक्तित्व का वर्णन जो उपन्यास में स्थान स्थान पर मौजूद है। इसके अलावा प्रवास वर्णन एक त्रयस्थ भाव से लिखा गया है। डायरी आपकी निश्छल भावनाओं का निर्बन्ध प्रवाह होती है और ऎसे में इसका थोड़ा भावनात्मक हो जाना भी स्वाद बढ़ा सकता था।

लेकिन कुल मिलाकर यह उपन्यास आपको एक अलहदा अनुभव देता है, जिसे प्रत्येक पाठक को अनिवार्य रुप से लेना चाहिये। इस नवाचार का स्वागत होना चाहिये और लेखक यह मानकर चले कि अब अपेक्षाओं का मीठा बोझा उनके कांधों पर आनेवाला है और वे इसे अपनी आनेवाली सृजनात्मक कृतियों के साथ उतार भी सकेंगे।

एक जानकारीपरक और लीक से हटकर रचना हेतु श्री दीपक गिरकर को साधुवाद!

कार्यक्रम के आरंभ में अतिथियों द्वारा माता सरस्वती की मूर्ति पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया गया।  सरस्वती वन्दना वाणी जोशी द्वारा की गई। अतिथियों का स्वागत डॉक्टर अखिलेश शर्मा, श्री सुरेश रायकवार, श्रीमती ज्योति जैन और श्रीमती आशा मुंशी द्वारा किया गया।  कार्यक्रम का संचालन श्रीमती रश्मि चौधरी और आभार प्रदर्शन श्रीमती तनुश्री उपगड़े  द्वारा किया गया। 

कार्यक्रम में शहर के वरिष्ठ साहित्यकार श्री अश्विनीकुमार दुबे, डॉ. पुरुषोत्तम दुबे, डॉ. योगेन्द्रनाथ शुक्ल, श्री ब्रजेश कानूनगो,  श्री नंदकिशोर बर्वे, श्री किशन शर्मा "कौशल", डॉ. वसुधा गाडगिल, तनुजा चौबे, श्रीमती गरिमा दुबे, आशा वडनेरे, श्रीमती सुषमा व्यास "राजनिधि", श्री राममूरत राही, श्री प्रदीप नवीन, श्री बी एल तिवारी, श्री मुकेश तिवारी, श्री गोपाल शास्त्री, श्री  मनीष व्यास, डॉ. दीपा व्यास, श्रीमती माधुरी व्यास "नवपमा", श्रीमती उषा गुप्ता, डी. आर. चव्हाण, श्री आर. सी. रोनीवाल, श्री श्याम पांडेय, श्री आर एस माथुर, श्री प्रकाश शर्मा, श्रीमती विद्या पाराशर,  डॉ. ज्योति सिंह , श्री अशोक सिसोदिया, श्री प्रदीप कोरी, श्री मुकेश इंदौरी, श्री भाटवाडेकर, श्री दीपक नाइक, श्री बी आर स्वामी, श्री एस डी वले, श्री बिडवलकर, डॉ. नितिन उपाध्ये, श्री रणजीत सिंह छाबड़ा, डॉ. मनीष दवे मौजूद थे।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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