डॉ. आशुतोष शर्मा की सेवानिवृत्ति: अस्पताल उदास, लेकिन करुणा और सेवा गूंजती रही
[डॉ. आशुतोष शर्मा: चिकित्सा क्षेत्र में मानवता और आदर्श का प्रतीक]
इंदौर मप्र के लाल अस्पताल (अब हुकुमचंद पाली क्लीनिक) की दीवारें जैसे मौन हो गई हैं। गलियारों में एक अनकही उदासी तैर रही है, हर चेहरे पर भावनाओं की नमी है और हर कोने में गहरा खालीपन महसूस हो रहा है। ऐसा प्रतीत होता है मानो अस्पताल का कोई अपना, कोई आत्मीय, कोई ऐसा अभिन्न हिस्सा 31 मार्च को विदा ले गया हो, जिसकी उपस्थिति से यह परिसर वर्षों तक जीवंत रहा। डॉ. आशुतोष शर्मा सेवानिवृत्त हुए, जिनकी उजली रोशनी ने दशकों तक हजारों परिवारों के जीवन से पीड़ा, निराशा और अंधकार को दूर किया।
38 वर्षों की गौरवपूर्ण शासकीय सेवा के बाद 31 मार्च को डॉ. आशुतोष शर्मा — जिन्हें पूरा शहर स्नेह, श्रद्धा और सम्मान से ‘गरीबों का डॉक्टर’ कहता है — सेवानिवृत्त हो गए हैं। इन 38 वर्षों में से 24 वर्ष उन्होंने लाल अस्पताल के प्रभारी के रूप में बिताए। यह केवल एक प्रशासनिक दायित्व नहीं था, बल्कि जनसेवा का वह संकल्प था, जिसे उन्होंने पूरी निष्ठा, ईमानदारी, करुणा और संवेदनशीलता के साथ निभाया। उनके नेतृत्व में लाल अस्पताल केवल एक सरकारी अस्पताल भर नहीं रहा, बल्कि वह हजारों लोगों के भरोसे, विश्वास, उम्मीद और जीवन का सबसे मजबूत सहारा बन गया। यहाँ आने वाला हर व्यक्ति यह विश्वास लेकर लौटता था कि जब तक डॉ. शर्मा हैं, तब तक उसे केवल उपचार ही नहीं, अपनापन और संवेदना भी मिलेगी।
अस्पताल का पूरा वातावरण उनके अंतिम कार्य दिवस पर भावनाओं से भर उठा। विदाई समारोह में पुराने-नए मरीज, स्टाफ, सहकर्मी, कर्मचारी और वे लोग भी थे, जिनका उनसे केवल एक बार परिचय हुआ, पर जिन्होंने उनके व्यवहार में मानवता की ऊष्मा महसूस की थी। जैसे ही विदाई का क्षण आया, सभागार भावुक हो उठा। कई आँखें नम थीं, अनेक लोग आँसू नहीं रोक सके और कुछ फूट-फूटकर रो पड़े। हर मन में बस एक ही भाव था— आज अस्पताल से केवल एक डॉक्टर नहीं, बल्कि हजारों लोगों का विश्वास और सहारा विदा ले रहा है। ये आँसू किसी साधारण चिकित्सक की विदाई के नहीं थे। ये उस इंसान के लिए थे, जिसने चिकित्सा को कभी व्यापार नहीं बनने दिया। शांत, सरल और नेकदिल व्यक्ति ने हमेशा मरीज के दर्द को अपना दर्द माना।
डॉ. आशुतोष शर्मा हमेशा अपनी सरकारी तनख्वाह पर संतुष्ट रहे। उन्होंने कभी अतिरिक्त कमाई, दिखावा या निजी स्वार्थ को महत्व नहीं दिया। उनके लिए सबसे बड़ी पूंजी मरीजों का विश्वास और सबसे बड़ा धर्म सेवा था। गरीब और जरूरतमंद मरीजों के लिए वे हमेशा उपलब्ध रहते थे। उनकी एक नजर, एक सलाह या एक स्पर्श में ऐसी गर्मजोशी थी कि मरीज को लगता— सामने कोई डॉक्टर नहीं, बल्कि परिवार का सदस्य है, जो सचमुच उनकी पीड़ा समझ रहा है। उन्होंने कभी जाति, धर्म, वर्ग या आर्थिक स्थिति का भेदभाव नहीं किया। हर मरीज उनके लिए समान था— मजदूर हो, रिक्शा चालक, किसान, कर्मचारी या किसी बड़े परिवार का सदस्य। यही कारण है कि वे केवल चिकित्सक नहीं, बल्कि हजारों लोगों का भरोसा बन गए।
कोरोना महामारी के भयावह दिनों में, जब हर ओर डर, अनिश्चितता और असहायता का माहौल था, तब भी डॉ. शर्मा अपनी जिम्मेदारी से पीछे नहीं हटे। जब बहुत-से लोग भयभीत थे, तब वे अस्पताल में डटे रहे। उन्होंने न केवल मरीजों की सेवा की, बल्कि मीडिया के साथियों की भी हर संभव सहायता की। पत्रकार बंधुओं से उनका रिश्ता हमेशा विश्वास, सम्मान और सहयोग का रहा। संकट की उस घड़ी में उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के अनेक लोगों का मार्गदर्शन किया, उनका उपचार कराया और उन्हें मानसिक संबल भी दिया। आज मीडिया जगत भी उनके इस योगदान को गहरी कृतज्ञता के साथ याद कर रहा है।
समय वहीं ठहर गया, जब अपने अंतिम कार्य दिवस पर डॉ. आशुतोष शर्मा ने ऐसी घोषणा की, जिसने पूरे सभागार को भावों की लहर में डुबो दिया। उन्होंने कहा — “मैं सेवानिवृत्त हो रहा हूँ, लेकिन इस अस्पताल को मेरी सेवाएँ सातों दिन, हर समय मिलती रहेंगी।” यह केवल शब्द नहीं थे; यह उनके जीवन-दर्शन, अडिग चरित्र और निस्वार्थ सेवा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति थी। रिटायरमेंट उनके लिए सिर्फ एक औपचारिकता है—सेवा तो उनकी आत्मा में बसती है, और यही उनकी महानता और व्यक्तित्व का सर्वोत्तम परिचय है।
आज के समय में, जब चिकित्सा तेजी से मुनाफे और व्यापार का माध्यम बनती जा रही है, डॉ. आशुतोष शर्मा जैसे चिकित्सक यह प्रतिपादित करते हैं कि यह पेशा अब भी करुणा, संवेदना, पवित्रता और मानवता से ओत-प्रोत रह सकता है। उन्होंने यह स्पष्ट रूप से दिखाया है कि डॉक्टर केवल दवाइयाँ देने वाला नहीं होता, बल्कि टूटते मन को संबल देने वाला, निराश चेहरे पर विश्वास जगाने वाला और संकट की घड़ी में आशा का दीपक बनने वाला होता है। इसी दृष्टिकोण और समर्पण के साथ उन्होंने शासकीय अस्पताल को एंटीरैबीज वैक्सीन सेंटर का ब्रांड बनाया, जिससे यह केन्द्र न केवल चिकित्सा सेवा का प्रतीक बना, बल्कि विश्वास, सुरक्षा और मानवता का भी स्थायी प्रतीक बन गया।
डॉ. शर्मा की सेवा-यात्रा हर चिकित्सक के लिए एक मिसाल है। यदि हर डॉक्टर उनके समर्पण, निष्ठा और मरीजों के प्रति प्रेम का केवल दस प्रतिशत भी अपनाएँ, तो चिकित्सा पेशा फिर से समाज में अपना खोया हुआ सम्मान, विश्वास और गरिमा हासिल कर सकता है। डॉ. आशुतोष शर्मा, भले ही आप आज औपचारिक रूप से सेवानिवृत्त हो रहे हैं, आपकी करुणा, सादगी, निष्ठा और अटूट समर्पण लाल अस्पताल की हर दीवार, हर गलियारा और हजारों-लाखों मरीजों के दिलों में हमेशा जीवित रहेगा।
आपका नाम केवल एक डॉक्टर के रूप में नहीं, बल्कि सेवा, संवेदना और मानवता के प्रतीक के रूप में सदैव याद किया जाएगा। हर मरीज, सहयोगी और सभी जिन्होंने आपके मार्गदर्शन और करुणा को अनुभव किया, वे आपकी निस्वार्थता के लिए सदा ऋणी रहेंगे। सबकी ओर से—अथाह सम्मान, गहरी कृतज्ञता और हार्दिक शुभकामनाएँ। आप स्वस्थ, सुखी और दीर्घायु रहें। जीवन के इस नए अध्याय में भी आपको वही शांति, वही सम्मान और वही संतोष प्राप्त हो, जिनके आप सच्चे अधिकारी हैं।
- प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
शिक्षाविद्
बड़वानी (मप्र)
ईमेल: rtirkjain@gmail.com
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