जहां मृत्यु भी एक उत्सव है, वाराणसी तीर्थ एवं महाश्मशान की परम्परा
"श्मशानेष्वाक्रीडा स्मरहर पिशाचाः सहचराः
चिता-भस्मालेपः स्रगपि नृकरोटी-परिकरः
अमङ्गल्यं शीलं तव भवतु नामैवमखिलं
तथापि स्मर्तॄणां वरद परमं मङ्गलमसि"।
हे भोलेनाथ!!! आप श्मशान में रमण करते हैं, भुत-प्रेत आपके संगी होते हैं, आप चिता भस्म का लेप करते हैं तथा मुंडमाल धारण करते हैं। यह सारे गुण ही अशुभ एवं भयावह जान पड़ते हैं। तब भी हे श्मशान निवासी आपके भक्तो को आप इस स्वरूप में भी शुभकारी एव आनंददायी ही प्रतीत होते हैं ।
वाराणसी अत्यंत पावन महा मोक्षदायक अविनाशी तीर्थ है ।जिसके कण कण में शिव विराजते हैं।
तीर्थ का अर्थ संभवत तरण स्थल होता है। वह स्थान जहाँ रहने या स्नान करने से सांसारिक पापों का प्रक्षालन होता है, साथ ही सांसारिक बाधाओं को व्यक्ति पार कर जाता है। बनारस पूर्ण अर्थ में तीर्थ है। यहाँ स्नान तीथों की भी बड़ी संख्या है। गंगा के विभिन्न घाटों के साथ विभिन्न प्रकार के स्नानपरक महत्व जुड़े हुए हैं। इनके साथ ही तंत्र-मंत्र-भूषित अनेक कूप है, जिनमें स्नान करने से तरह तरह के संकटों से मुक्ति होती है। पुष्ठकर भी अनेक है, जो भिन्न -भिन्न प्रकार के देवताओं के नाम से जुड़े है। इनके स्नान के अलग-अलग लाभ कहे जाते हैं। इन पर अलग-अलग तिथियों को स्नान -पूजक विषयक मेले लगते है।
भारत के मध्य कालीन इतिहास से ही बनारस एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थल के रूप में चर्चित हो चुका था।गया और प्रयाग के साथ इसकी त्रिस्थली में गिनती होने लगी और यहाँ की तीर्थयात्रा मुक्ति की सीढ़ी मानी गई है। काशी की पवित्रता से यह परिणाम निकला कि भारतवर्ष के कोने कोने से चलकर हिन्दू यात्री रास्ते के सब शारीरिक कष्टों को पार करते हुए इस पवित्र क्षेत्र में आकर बस गये। यहाँ के गंगा स्नान और गंगाजल की इतनी माहिमा बढ़ गयी कि काशी से कांवरियाँ भर-भर कर गंगा-जल सुदूर दक्षिण में रामेश्वरम तक जने लगा और दक्षिण भारत में तो काशी की यात्रा किये हुए लोग विशेष पुण्य के भागी माने जाने लगे।
भारतीय जीवन में तीर्थ यात्रा, दान, पूजा का आध्यात्मिक महत्व वैदिक ग्रन्थों में मूल रूप से प्रतिपादित किया गया है। काशी में धर्म, कर्म,तीर्थ, देवदर्शन का जितना महत्व है, अन्य स्थानों पर नही है। रामायण, महाभारत में तीर्थ के रूप में काशी का उल्लेख मिलता है। महाभारत के वन पर्व में पाण्डव तीर्थयात्रा करते तथा लोमस्य धोम्य तीर्थ का वर्णन करते हुए कहते हैं कि वाराणसी एक प्रमुख तीर्थ क्षेत्र है। वहाँ कपिला क्षेत्र में स्नान करके शंकर भगवान को पूजा करने से राजसूय यज्ञ का फल मिलता है। स्कन्द पुराण में पंचकोशी का विशेष महत्त्व बताया गया है। बनारस की पवित्रता पंचकोशी की सीमा के अन्दर मानी जाती है। पंचकोशी की सड़क मणिकर्णिकाघाट से आरम्भ होकर दक्षिण-पश्चिम कंदवा को जाती है। वहाँ से राजा तालाब के दक्षिण भीमचंडी के मंदिर को, फिर वहाँ से उत्तर चौखण्डी होती हुई बरुना पर स्थित रामेश्वर को, वहाँ से पार कर पाँचो- पंडाव तालाब होते हुए शिवपुर को,वहाँ से संगम के पास कपिलधारा और कोटवा के मंदिर होते हुए फिर मणिकर्णिका पर सड़क समाप्त हो जाती है। पंचकोशीय यात्रा का इतिहास कितना प्राचीन है, इसका उल्लेख प्राचीन साहित्य में नहीं मिलता है। 18 वीं सदी के अन्त में तो पंचक्रोशी की यात्रा बनारस की तीर्थ यात्रा का एक खास अंग बन गयी थी।
किसी कारणवश जो पंचकोशी की यात्रा नहीं कर सकते थे, उनके लिए पंचतीर्थ का विधान है,अर्थात ये पंचगंगा,मणिकर्णिका, दशाश्वमेघ और अस्सी घाट पर स्नान करके तीर्थ यात्रा को सफल बनाते है। वैसे वाराणसी के प्रायः सभी घाटों पर किसी न किसी तीर्थ की स्थापना की गई है। घाट के थोड़े-थोड़े जल में विभिन्न नामों के तीर्थों की कल्पना की गई है। जैसे चौसही घाट पर स्नान करके योगिनी तीर्थ, विसंध तीर्थ, नार्मद तीर्थ, वसिष्ट्य तीर्थ , आदिकेशव घाट पर वादोदक साख्य अर्वाक चक्र, गदा पद्म आदि तीथों का पुण्य प्राप्र होता है। ललिता घाट पर गोपी गोविन्द तीर्थ , लक्ष्मी सिंह तीर्थ, पंचगंगा घाट पर मार्कण्डेय तीर्थ, प्रहलाद्घाट पर हिरण्यगर्भ तीर्थ , राज मन्दिर घाट पर कर्नादित्य तीर्थ, मणिकर्णिका घाट पर मणिकर्णिका पुष्करिणी, पाशुपति आदि तीथों की कल्पना की गई है। इन तीर्थो में मणिकर्णिका प्राचीन है। पंचगंगा घाट काशी का मुख्य तीर्थ माना गया है क्योंकि हिन्दुओं का ऐसा विश्वास है कि पाँच नदियाँ गंगा, धूतपापा, जीरननंदा, किरणा और सरस्वती यहाँ आकर मिलती हैं।
पौराणिक पृष्ठभूमि के आधार पर निःसंदेह काशी मुख्यतः तीर्थस्थल है। तीर्थ के महत्व को जीवित बनाए रखने के लिए उसमें तीर्थस्थलों के तीर्थ-पुरोहित रहा करते थे।
वाराणसी की महत्ती महाश्मशान की दृष्टि से काफी है। भगवान शिव की नगरी है। शिव स्वयं संहारक है। जब से शिवनगरी की रचना हुई , उसी काल से श्मशान की भी परंपरा चली। वाराणसी में श्मशान की स्थापना के विषय में पौराणिक श्रुति लोक-प्रचलित है कि भगवान शंकर ने कामदेव को अपने त्रिनेत्र से भस्म किया था। उससे उद्भूत अग्नि से शव जलाने की प्रथा चालू हुई, और वह अग्नि अनवरत गति से बनी रही, और आज भी मुर्दा जलाने की क्रिया में पहले से जलते हुए मुर्दे की अग्नि से दूसरा शव जलाया जाता है। काशी में कई घाटों पर शव जलाए जाते हैं और श्मशान घाट स्वतंत्र रूप से एक घाट है।
बनारस में यहाँ मुर्दे जलाने की प्रथा कब से प्रारस्म हुई यह बात ज्ञात नहीं है। हिन्दू नगरों में दक्षिण में श्मशान होने से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जब बनारस की बस्ती उत्तर में थी तब शायद श्मशान यहाँ था, पर शहर की बस्ती तो बनारसे के दक्षिण में बढ़ती गई, पर श्मशान जहाँ का तहाँ रहा। यह विवादास्पद है कि यह प्राचीन श्मशान सभी कालों में एक ही जगह पर था, अथवा वह अपना स्थान बदलता रहा है। काशी के लोगों का विश्वास है कि प्राचीन श्मशान जमघाट पर था, जो संकटाघाट से सटा हुआ है। यहाँ रामधरमेश्वर और हरिश्चन्देश्वर के मन्दिर भी हैं और यम द्वितीया का स्नान भी लगता है। चौक में भद्दामल की काठी के नीचे श्मशान-विनायक का मंदिर है। वर्षाकाल में मुर्दे यहाँ जलाए जाते थे और उनकी हड्डियाँ अस्थि-निक्षेप-तड़ाग, जिस जगह अब हड्हा के सराय में फेंके जाते थे। पास में अस्थिकेश्वर महादेव का मन्दिर आज भी है। संभव है कि जमघाट से श्मशान - विनायक तक जिसकी दूरी चार फर्लांग है, पहले श्मशान भूमि रही हो।
काशीखंड के अनुसार हरीशचंदेश्वर का मंदिर केदारघाट के उत्तर और दशाश्वमेध के दक्षिण पड़ने के कारण श्मशान घाट इसके मध्य कहीं रहा होगा ऐसा अनुमान है।सौ वर्ष पहले अस्सी घाट पर जहाँ आज भी पानी एकत्र है। उसी स्थान पर शमशान घाट था। अब केदार घाट पर है। मणिकर्णिका घाट पर महाशमशान की स्थापना सेठ कश्मीरीमल ने की थी। अपनी माँ का शव कश्मीरीमल हरिशचंद्र घाट ले गए पर उठवा लाये और पंडो और जमींदारों से जगह खरीद कर उसी जगह पर माँ का दाह करके वहाँ घाट बनवा दिया। तथा शव के लिए डोमो का निर्ख़ बाँध दिया।दक्षिण पड़ने के कारण इमरान इसके माता था। अब केदारघाट पर है। मचिकीर्षका घाट पर महाश्मशान की स्नानाचे कामी शेमाल ने की थी। आपनी मी काश्मीरी मल रिषचन्द्रघाट में शस, १२ वहीं लेन देन के बार में डोगों से कुछ कहासुनी हो गई। शव को साकनिका धार पर उठगलाए, और पण्डों और जमींदारों से जगह सारोदकर उस पर भी फादार करके वहीं घाट बनवा दिया तथा शवदाह के लिए डोगो कागि में बीच विका
एक लोकश्रुति के अनुसार वाराणसी मुख्यतः महाश्मशान ही था। यहाँ के आदिनिवासी डोम और पण्डे हैं। महाश्मशान की महता के कारण ही लोग मोक्ष प्राति के भाव से यहाँ आकर बसने लगे थे। यातायात के साधनों के अभाव में शवों को दूर ले आना संभव नहीं था। इसलिए मरणासन्न व्यक्ति या वृद्धों को मोक्ष भाव से यहाँ बसा दिया जाता था। धीरे-धीरे वर्तमान नगर के स्वरुप का विकास इसी रूप में हुआ।
वर्तमान वाराणसी मुख्यतः विधा-केन्द्र है। यहाँ तीन विश्वविद्यालय एवं चौथे विश्वविद्याल के स्नातकोत्तर विद्यालयों के साथ प्रायः डेढ़ हजार तरह के शिक्षा - संस्थान हैं। अब लोकोमोटिव कारखाना भी खुल गया है फिर भी नगर की प्रतीष्ठा तीर्थ और विद्या केंद्र में ही है। प्रतीष्ठा का दूसरा कारण यहाँ की हस्तकलाएं भी हैं।
- डॉ.सरितकिशोरी श्रीवास्तव
2A सर्किट हाउस एरिया (ईस्ट)
जमशेदपुर।
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