काव्य :
अघट घट
वह घट-घट के घट-घट में है,
उसमें ही घट-घट है।
उसी अघट घट की सन्निधि में
प्लावित सभी घड़े हैं।
जो निस्तीर्ण हुए, होकर भी
उसके मध्य पड़े हैं।
वह प्लावन, वह प्लव, तितीर्षा,
वही पाद-प्रक्षालन।
वह राघव है, वह गंगा है,
नौका है, केवट है।
ध्वनि उसकी धुन, अक्षर स्तुति, हर
शब्द उसी का गायन।
वह नीरस भी और उसी से
उपजे सभी रसायन।
जो अव्यक्त-अकथ-अनहद है,
तप है उसी विभा का;
और व्यक्त जो, उसकी अर्चा
में बलता दीवट है।
- आकाश पाठक ,वाराणसी
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