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काव्य : अघट घट - आकाश पाठक ,वाराणसी


 

काव्य : 

अघट घट

वह घट-घट के घट-घट में है,

उसमें ही घट-घट है। 


उसी अघट घट की सन्निधि में

प्लावित सभी घड़े हैं।

जो निस्तीर्ण हुए, होकर भी

उसके मध्य पड़े हैं। 


वह प्लावन, वह प्लव, तितीर्षा,

वही पाद-प्रक्षालन।

वह राघव है, वह गंगा है, 

नौका है, केवट है। 


ध्वनि उसकी धुन, अक्षर स्तुति, हर

शब्द उसी का गायन।

वह नीरस भी और उसी से

उपजे सभी रसायन।


जो अव्यक्त-अकथ-अनहद है,

तप है उसी विभा का;

और व्यक्त जो, उसकी अर्चा

में बलता दीवट है। 

   -  आकाश पाठक ,वाराणसी

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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