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लघुकथा : हिसाब - डॉ अंजना गर्ग (सेवानिवृत) म द वि रोहतक


 

 लघुकथा : 

 हिसाब


घुमंतू उस दिन फिर उसी घर के सामने ठिठक गया।

कभी इस आँगन में कोकिला की तेज़ आवाज़ गूंजती थी— “माँ जी, ये दवा के 320 रुपए… और बाबूजी, कल जो दूध आया था, उसके 60 अभी बाकी हैं।”

सास-ससुर चुपचाप अपनी पेंशन की गड्डी से नोट निकाल कर दे देते। कोकिला बड़ी सफाई से अपने सास - ससुर के हर खर्च का हिसाब रखती थी।

समय बदला… आँगन सूना हुआ… सास-ससुर की चारपाई अब खाली थी।

आज वही कोकिला अपने बेटे के सामने खड़ी थी— “ यह क्या छोटी छोटी चीज के भी  पैसे माँग रहा है। हमने तुझे पढ़ाया-लिखाया, बड़ा किया… अब तू भी हमसे हिसाब करेगा?”

बेटा कुछ पल चुप रहा। फिर उसकी नज़रें सीधे माँ की आँखों में टिक गईं।

वो कुछ बोला नहीं… पर उसकी खामोशी में जैसे बचपन की सारी यादें बोल रही थीं।

हर दवा का हिसाब…  दूध के हर गिलास का हिसाब… हर साँस का हिसाब…

कोकिला  की आँखें झुक गईं।

घुमंतू ने धीरे से कहा— “बच्चे अक्सर बातें नहीं सीखते… व्यवहार सीखते हैं।”

- डॉ अंजना गर्ग (सेवानिवृत)

म द वि रोहतक

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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