काव्य :
----ग़ज़ल——
मैं तेरा हूँ या तू मेरा सर्जक है
कठिन प्रश्न सदियों से लेकिन रोचक है
कौन बचाएगा हमको इस पीड़ा से
आज उसी से डर लगता जो रक्षक है
रोज़ बना कर रोज़ नियम तोड़े जाते
आम आदमी तो सदियों से याचक है
फ़र्क़ नहीं पड़ता उसको कुछ भी कह दो
जो कल भी था आज वही खलनायक है
चर्चाओं का दौर रोज़ कितनी बातें
और सदन से ग़ायब मिला विधायक है
आज सूचना तंत्र बहुत मज़बूत हुआ
सच कहने से डरता पर आलोचक है
- किशन तिवारी , भोपाल
9425604488
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