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पुरुषोत्तम मास विशेष: श्रीमद्भागवत = सूर्य का प्रकाश -मिलन चौबे (शिक्षाविद),जबलपुर


 

पुरुषोत्तम मास विशेष: श्रीमद्भागवत = सूर्य का प्रकाश 

भारतवर्ष में इस समय पुरुषोत्तम मास चल रहा है। हमारे संस्कार कहते हैं कि यह मास जप, तप और हरिनाम स्मरण का है। और हरिनाम संकीर्तन की सर्वोत्तम साधिका है - *श्रीमद्भागवत कथा*।

जैसे सुबह सूरज की पहली किरणें रात के गहन अंधियारे को चीरकर सम्पूर्ण आकाश को उज्ज्वलित कर देती हैं, ठीक वैसे ही श्रीमद्भागवत जीवन के अंधकार को समाप्त कर एक नई आभा, एक नई चेतना दे देती है।

श्रीमद्भागवत को "निगम-कल्पतरु का पका फल" और "वेद-उपनिषदों का सार" कहा जाता है। यह ग्रंथ सचमुच सूर्य के प्रकाश जैसा है। जैसे सूर्य के निकलते ही रात का घना अंधेरा एक पल में छँट जाता है, वैसे ही भागवत का एक श्लोक भी श्रद्धा से सुन लेने पर मन में बसा अज्ञान, भ्रम और मोह का अंधेरा दूर हो जाता है। इसीलिए संत कहते हैं: "कृष्ण सूर्य सम, माया होय अंधकार। जहाँ कृष्ण तहाँ नाहि, माया का अधिकार।"

सूर्य को प्रकाशित होने के लिए किसी और दीपक की आवश्यकता नहीं पड़ती। वह स्वयं प्रकाशित है। श्रीमद्भागवत भी ऐसा ही स्वयं प्रमाण ग्रंथ है। इसे समझने के लिए किसी अन्य शास्त्र की बैसाखी टेकने की जरूरत नहीं। पुरुषोत्तम मास में तो विशेष रूप से - बस प्रेम और विश्वास से पढ़ो या सुनो, तो इसका अर्थ अपने आप हृदय में उतर जाता है, जैसे धूप सेंकने से शरीर अपने आप गर्म हो जाए।

सूर्य का एक और गुण है - वह सबको समान रूप से प्रकाश देता है। उसकी किरणें राजा के महल और गरीब की झोपड़ी में भेद नहीं करतीं। भागवत का स्वभाव भी यही है। इसने न जाति देखी, न पिछले कर्म। गणिका का उद्धार किया, अजामिल को तारा, प्रह्लाद को बचाया, ध्रुव को अटल पद दिया। भागवत ने केवल एक चीज देखी - भाव। पुरुषोत्तम मास का भी यही संदेश है कि जिसका हृदय सच्चा, उसके लिए भगवत्-कृपा का द्वार सदा खुला है।

जैसे सूर्य के बिना पृथ्वी पर भौतिक जीवन संभव नहीं, वैसे ही भागवत के बिना आध्यात्मिक जीवन सूख जाता है। भागवत के मंगलाचरण में ही कहा गया है: "निगमकल्पतरोर्गलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्। पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुकाः।।" अर्थात यह वेद रूपी कल्पवृक्ष का पका हुआ फल है, जो शुकदेव जी के मुख से टपके अमृत रस से सना हुआ है। हे रसिक भक्तों, बार-बार इस भागवत रस का पान करो। पुरुषोत्तम मास में तो इसका पान और भी अमोघ फलदायी कहा गया है।

जैसे सूर्य बारह महीनों में अपना चक्र पूरा कर पूरे वर्ष को जीवन देता है, वैसे ही भागवत के बारह स्कंध जीवन के पूरे चक्र को प्रकाशित करते हैं। सृष्टि की रचना से लेकर प्रलय तक, जन्म से लेकर मोक्ष तक - जीवन का कोई ऐसा पहलू नहीं जिसे भागवत ने स्पर्श न किया हो।

सबसे बड़ी बात यह है कि यदि गीता भगवान का 'शब्द' है, तो भागवत भगवान की 'लीला' है। गीता पढ़कर बुद्धि को समझ आता है कि "क्या करना है", पर भागवत सुनकर हृदय बोल पड़ता है कि "बस करते जाओ, रुको मत"। गीता मार्ग दिखाती है, भागवत उस मार्ग पर चलने का प्रेम देती है। पुरुषोत्तम मास में यही प्रेम साधना का प्राण है।

श्रीमद्भागवत का पहला ही श्लोक उसकी घोषणा कर देता है: "धर्मः प्रोज्झित-कैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतां"। यहाँ छल-कपट से भरा संसारी धर्म नहीं है। यहाँ तो वह परम धर्म है जो ईर्ष्या रहित, निर्मल हृदय वाले संतों के लिए है।

इसीलिए शास्त्र कहते हैं - "विद्या भागवतावधि"। विद्या की सीमा भागवत तक है। भागवत जहाँ पूर्ण होता है, वहीं से शब्द समाप्त होते हैं और अनुभव का क्षेत्र शुरू होता है। उसके आगे तर्क नहीं, केवल प्रेम बचता है।

पुरुषोत्तम मास में श्रीमद्भागवत श्रवण, पठन और मनन का अनंत गुणा फल कहा गया है। यह मास स्वयं भगवान का प्रिय है, और भगवान की कथा इस मास का श्रृंगार है।

_नम: पार्वत्ये हर हर महादेव!_

_जय श्री राधे!

_श्रीकृष्णार्पणमस्तु_ 

_मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम की जय_


- मिलन चौबे (शिक्षाविद),जबलपुर

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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