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आधुनिक विकास ने किया संस्कृति और सभ्यता का शोषण -दिनेश जैन राही , बांदकपुर


 

 आधुनिक विकास ने किया संस्कृति और सभ्यता का शोषण

      आज स्थिति में हम विकास की अधिकतम सीमा तक पहुंच गए हैं। इस विकास ने हमारे संस्कारों का, मानवता का, मानसिकता काऔर सज्जनता का बड़ी बेरहमी से बलात्कार कर दिया है। पोशाकों से लेकर खाने पीने के तरीकों तक को बदल कर रख दिया है। हम अपनी हैसियत भूल कर,अपने पड़ोसी को देखकर, अपने आप को उतना ही आजाद बनाना चाहते हैं। जितना वह है। और धोखा खा जाते हैं। चाहे हम किसी भी क्षेत्र के बारे में सोचें। हम अपने आप को दूसरे को देख कर के सुपीरियर बनाने की दौड़ में दौड़ने लगते हैं। यह भूल जाते हैं कि हमारा परिवेश, वातावरण, क्षेत्र, और संसाधन वैसे हैं या नहीं। या उनकी हम पूर्ति कर पाएंगे या नहीं। जब हम यह सब भूलकर उस दौड़ में दौड़ना प्रारंभ करते हैं,और आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पाती है। तब हम एक अन्य मार्ग का चयन करते हैं। जो हमें विनाश की ओर ले जाता है। इसीलिए कहा गया है कि विकास ने ही किया बलात्कार।

 मैं यह नहीं कह रहा हूं कि हमें विकास की ओर अग्रसर नहीं होना चाहिए। परंतु हमें किसी से उधार मांग कर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति करना पड़े। तो ऐसा ऐसे विकास क्यों नहीं दौड़ना चाहिए। क्योंकि यही नवाचार हमारे जीवन को खोखला और दूसरे पर आश्रित बनाने में परिपूर्ण रूप से सहयोगी होता है। हम सामाजिक दृष्टि से देख लें कि आज हमने फिल्मों सीरियलों को देखकर पाश्चात्य सभ्यता को उनकी पहनाव हो अपना तो लिया है। परंतु क्या वह हमारे परिवेश वातावरण और संस्कारों को रास आएगा! नहीं ना। अर्थात हम राह भटक जाएंगे ।अपना अस्तित्व खो देंगे। ना हम विदेशी ही बन पाएंगे। और ना  ही देशी रह पाएंगे। यह ठीक उसी प्रकार की परिस्थिति पैदा करेगा । जब कोई ग्रामीण व्यक्ति दूसरे व्यक्ति से खड़ी भाषा यानी शहरी भाषा में बात करने का प्रयास करता है। तब वह बीच में चूक जाता है।अपनी निजी भाषा का उपयोग करता है। और मात्र हंसी का पात्र बनता है। ना वह पूरी तरह से शहरी भाषा का उपयोग कर पाता है। ना ही पूरी तरह से अपनी ग्रामीण भाषा में बात कर पाता है। और खुद को शर्मसार महशूस करता है। 

      बात यहां यह है खूब पढ़ो, खूब बढ़ो । पर अपने संस्कारों को पुनः गढ़ो। यह पंक्ति है " हिंदी हैं हम वतन है हिंदोस्तां हमारा, हम बुलबुले हैं इसके यह गुल्सितां हमारा"। हमने इसे पढ़ा है जानते हैं पर इसकी रक्षा हम नहीं कर पाते। विकास के चक्कर में इसे हम पाश्चात्य सभ्यता के हाथों बेच आते हैं। सारी विदेशी सभ्यता को हम अपनाने लगे हैं। विदेशी संस्कारों को अपनाने लगे। बस निजी हमारे देसी हिंदुस्तानी संस्कारों को भुलाने लगे। इसीलिए कहा है विकास नहीं किया बलात्कार। विकास तो हम प्राप्त कर गए। परंतु हमारे संस्कारों का खुलेआम बलात्कार हो गया । इसे हम स्वीकार कर रहे हैं।

     धिक्कार है ऐसे विकास को जो हमारी संस्कृति को विनाश की ओर ले जा रहा है। धिक्कार है ऐसे पहनावों को हमारे लिए ही काल हो रहा है। अरे ऐसा क्या मॉडर्न होना। जिससे हमारे संस्कार बेइज्जत हो रहे हो। जागो अभी भी जागो और बचा लो अपनी मातृभूमि को,अपने संस्कारों को। नहीं तो वह दिन दूर नहीं! जब लोग भारत माता का चित्र भी मॉडर्न ड्रेस में तैयार करेंगे। हम इसे सहन नहीं कर पाएंगे। अगर हमअपना वजूद बचा करके रखेंगे तो अपनी भारत मां की इज्जत को ही बचा पाएंगे। अन्यथा विकास इसी प्रकार बलात्कार करता रहेगा। और हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे।

 - शिक्षक दिनेश जैन राही 

बांदकपुर जिला दमोह मध्य प्रदेश


देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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