ad

विवाह के पहले और बाद रिश्तों के प्रति घटता विश्वास - किरण मोर कटनी म.प्र.



विवाह के पहले और बाद रिश्तों के प्रति घटता विश्वास

    अभी पिछले कुछ सालों से वैवाहिक जीवन में काफी उथल-पुथल देखने को मिल रही है,अगर विवाह हो चुका है,तो निभ नहीं पा रहा है,और अगर होने वाला भी है तो विचारों  में मेल न होने के कारण टूट जाते हैं,लेकिन सबसे ज्वलंत समस्या यह है कि जब लड़के -लड़की का विवाह तय हौ गया लेकिन वो करना नहीं चाहते लेकिन बजाय मना करने के अपराध की ओर रुख कर रहे हैं,बेखौफ होकर अपराध को अंजाम दे रहे हैं,कोई शादी के बाद मार रहे हैं,कोई शादी के पहले ,हमारा वो भारतीय समाज जिसमें संस्कार कूट-कूट कर भरे हैं,क्या इसका बड़ा कारण सोशल मीडिया है जो हर समस्या के समाधान के लिए तत्पर खड़ा है,या आज की पीढ़ी की तत्काल चाहत की उतावलेपन की की वो हद जो पार हो चुकी है,सबका समाधान होता है,बशर्ते बैठकर बातचीत की जाए, लेकिन आज के युवाओं को अपनी ही सोच सही लगती है,नापसंद है या कोई और पसंद है इस बारे में बैठकर समझाकर हल निकाला जा सकता है,लेकिन हाथ में मौजूद मोबाइल और उसमें मौजूद उपाय उनको ज्यादा आकर्षित करते हैं,वैसे मैं इसे इतना बड़ा कारण नहीं मानती क्योंकि जिस तरह तम्बाकू सिगरेट के पैकेट पर लिखा होता है कि जानलेवा है फिर भी लोग खाते हैं,उसी तरह ये जानते बूझते की मरना,मारना अपराध है फिर भी ऐसे कामों को अंजाम देने से नहीं हिचकते,मुझे तो लगता समाज  अब हम किसी से कम नहीं की तर्ज पर काम कर रहा है,और देखा देखी चलन की भेड़चाल में शामिल हो रहा है,जिस तरह शादी विवाह में देखा-देखी हैसियत हो या ना हो,लेकिन दिखावा करना है,बिना अंजाम की परवाह किए, उसी तरह अब अपराध भी पनप रहे हैं,चाहे वह गलत हो या सही क्या फर्क पड़ता है,और इसका एक सबसे बड़ा कारण हमारी न्याय व्वस्था अधिक लचीलापन भी है,कुछ कठोर नियम होने चाहिए और जो मानने के लिए बाध्य भी हों,कानून का कठोर होना अति आवश्यक है,वैसे भी भारत गर्त की ओर जा ही रहा है,और एक समय ऐसा आएगा जब कुछ भी हाथ ना आएगा,क्योंकि आज जान की कीमत ही नहीं रह गई है,चाहे वह खुद की हो या किसी की भी ,जान लेना और देना दोनों बहुत आसान हो गया है,तरीके आपके हाथ में हैं,बस तत्काल निर्णय और अंजाम -बिन सोचे,सुनने की,समझने की,मानने की और सहनशीलता कमी है,लेकिन इसका एक और बड़ा कारण है,जो है एक दूसरे पर विश्वास लेकिन  पहले औरत रहने को मजबूर थी ,विश्वास था या नहीं लेकिन मजबूरी जरूर थी,क्योंकि महिलाओं को मिलना चाहिए वह कभी भी नहीं मिल पाया,औरत ने भरसक कोशिश की,और अच्छे से अच्छा बनकर सबकुछ न्यौछावर करने के बाद भी जब वो अपने लिए  वो जगह नहीं बना पा ई जो वो डिजर्व करती है ,तब उसे अपने लिए स्टेंड लेना पड़ा,जैसेकि आप अपनी पीढ़ी की भी बात की,कि घर बाहर दोनों संभालने के बाद भी आपने वो नहीं पाया जिस की हकदार थीं,क्योंकि हर एक नया कदम उठाने के बाद उसके साथ एक नये नियम और कानून का भी साथ में इजाफा हुआ,जो सिर्फ औरत के हिस्से में आया,जबकि अगर आर्थिक सम्पन्नता की बात की जाए तो अभी औरत कुछ भी कर ले ,उसे वो इज्जत और मान नहीं मिलता जो एक पुरुष को मिलता है,आफिस के बाद घर मेंतुरंत औरत रसो ई में चाय बनाने और पति थककर आया,तो
चाय की फर्माइश, कोई ये नहीं समझता या जानबूझकर नहीं समझना चाहता कि वो भी थककर ही आई है,कारण वह औरत है और उसका काम है रसोई संभालना,दूसरा वह दूसरे घर से आई है,तो इन सब दुर्व्यवहार और दुर्भावना के कारण प्यार, प्रेम और अपनापन के लिए हमेशा तरसती ही रही ,चाहे वह कुछ भी कर ले,उसके लिए नियम और कड़े होते गए, तब फिर वह क्या करे,वह बागी होने लगी !परिणामस्वरूप रिश्तों में अनबन,अलगाव और फिर तलाक की वजह से बच्चे हैं अगर तो उनका भरण-पोषण और फिर जब उसकी ससुराल में उसकी जगह ही नहीं तो उसका मु आवजा,और फिर ये बन गया एक चलन जिसके कारण बढ़ते अपराधों की श्रंखला में इजाफा और फिर एक दहशत,लेकिन साथ-साथ बढ़ती उम्र  की छटपटाहट, फिर अकेलापन और फिर एक साथी की तलाश और किस्मत अच्छी हुई तो बहुत बढ़िया नहीं तो किसी भी उम्र की आज कोई गारंटी नहीं,क्योंकि अब स्वार्थ ने अपराध का रूप धारण कर लिया है,तो आपकी किस्मत!!!

 - किरण मोर कटनी म.प्र.


देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post