विचारात्मक आलेख :
आस्था से आगे, समझ की ओर
परंपरा के सम्मान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के संतुलन से ही भविष्य के सशक्त नागरिक तैयार होते हैं।
एक गांव में दो बच्चे साथ-साथ बड़े हुए। एक को हर बात बिना सवाल किए मानना सिखाया गया। दूसरे को कहा गया कि बड़ों का सम्मान करो, लेकिन हर बात को समझने की कोशिश भी करो। समय बीता। पहला बच्चा वही बातें दोहराता रहा जो उसने सुनी थीं, जबकि दूसरा नई बातें सीखता गया और जीवन में आगे बढ़ता गया। दोनों के बीच अंतर केवल इतना था कि एक ने विश्वास करना सीखा था, दूसरे ने समझना।
यही शिक्षा का सबसे बड़ा उद्देश्य होना चाहिए।
आजकल शिक्षा में धार्मिक ग्रंथों को शामिल करने को लेकर चर्चा हो रही है। कुछ लोग इसे जरूरी मानते हैं, तो कुछ लोग इसका विरोध करते हैं। लेकिन असली सवाल यह नहीं है कि धर्म पढ़ाया जाए या नहीं। असली सवाल यह है कि बच्चों को सोचने की क्षमता दी जाए या केवल मानने की आदत।
भारत विविधताओं का देश है। यहां वेद और उपनिषद हैं, बुद्ध और महावीर हैं, सिख गुरुओं की शिक्षाएं हैं, सूफी परंपरा है और आधुनिक विज्ञान भी है। हमारी यही विविधता हमारी ताकत है। इसलिए शिक्षा का उद्देश्य किसी एक विचारधारा को श्रेष्ठ बताना नहीं, बल्कि सभी विचारों को समझने का अवसर देना होना चाहिए।
स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे अभी सीखने और समझने की अवस्था में होते हैं। वे जो सुनते हैं, उसे आसानी से सच मान लेते हैं। इसलिए उन्हें किसी एक विचार को अंतिम सत्य बताने के बजाय विभिन्न दृष्टिकोणों से परिचित कराना अधिक उपयोगी होगा। जब बच्चे अलग-अलग विचारों को जानेंगे, तभी वे स्वयं सोचने की क्षमता विकसित कर पाएंगे।
उच्च शिक्षा में स्थिति अलग होती है। कॉलेज और विश्वविद्यालय के विद्यार्थी अधिक परिपक्व होते हैं। वे विभिन्न विचारधाराओं का अध्ययन कर सकते हैं और उनके बारे में अपनी राय बना सकते हैं। यही कारण है कि दुनिया के अनेक विश्वविद्यालयों में धर्मों और दर्शन का अध्ययन कराया जाता है। वहां किसी धर्म का प्रचार नहीं होता, बल्कि उनके इतिहास, समाज और विचारों को समझाया जाता है।
यदि किसी विद्यार्थी को केवल एक ही दृष्टिकोण बताया जाए, तो उसकी समझ सीमित रह सकती है। लेकिन यदि उसे हिन्दू, बौद्ध, जैन, सिख, सूफी, मानवतावादी और आधुनिक वैज्ञानिक विचारों के बारे में भी बताया जाए, तो उसका दृष्टिकोण व्यापक होगा। वह दूसरों के विचारों का सम्मान करना सीखेगा और अपनी राय भी सोच-समझकर बनाएगा।
आज दुनिया तेजी से बदल रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), अंतरिक्ष अनुसंधान, जैव प्रौद्योगिकी और नई तकनीकें भविष्य को आकार दे रही हैं। आने वाले समय में वही देश आगे बढ़ेंगे जिनके पास ज्ञान, कौशल और नवाचार की शक्ति होगी।
इसलिए शिक्षा का मुख्य लक्ष्य होना चाहिए-
वैज्ञानिक सोच विकसित करना,
तार्किक ढंग से विचार करना,
प्रश्न पूछने की आदत पैदा करना,
और नई समस्याओं के समाधान खोजने की क्षमता विकसित करना।
वैज्ञानिक सोच का मतलब धर्म का विरोध करना नहीं है। इसका अर्थ है किसी भी बात को समझने और परखने की आदत विकसित करना। यही आदत व्यक्ति को अंधविश्वास से बचाती है और सही निर्णय लेने में मदद करती है।
साथ ही, अपनी संस्कृति और परंपराओं को जानना भी जरूरी है। वेद, उपनिषद, रामायण, गुरु ग्रंथ साहिब और अन्य धार्मिक ग्रंथ हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। इनका अध्ययन हमें अपने इतिहास, साहित्य और समाज को समझने में मदद करता है। लेकिन इन्हें पढ़ाने का उद्देश्य किसी एक विश्वास को स्थापित करना नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक विरासत को समझाना होना चाहिए।
शिक्षा का काम यह नहीं है कि वह विद्यार्थियों को बताए कि उन्हें क्या मानना चाहिए। शिक्षा का काम यह है कि वह उन्हें सोचने और समझने की क्षमता दे, ताकि वे स्वयं सही निर्णय ले सकें।
एक शिक्षक ने कहा था, "यदि आप बच्चों को केवल उत्तर देंगे, तो वे परीक्षा पास कर लेंगे। लेकिन यदि आप उन्हें प्रश्न पूछना सिखा देंगे, तो वे जीवन में सफल होंगे।"
यह बात आज पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
हमें ऐसे नागरिक चाहिए जो अपनी परंपराओं का सम्मान करें, लेकिन नए विचारों को भी अपनाएं; जो अपनी आस्था रखें, लेकिन दूसरों की आस्था का भी सम्मान करें; जो संस्कृति से जुड़े हों और विज्ञान को भी महत्व दें।
**फंडा यह है कि शिक्षा का उद्देश्य किसी विशेष आस्था का निर्माण करना नहीं, बल्कि समझ का निर्माण करना है। क्योंकि समझ से ही विवेक पैदा होता है, और विवेक ही व्यक्ति, समाज और राष्ट्र को सही दिशा देता है।**
- डॉ रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर
करनाल
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विविध
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