ad

जज्बातों पर बंदिशें क्यों? : परंपराओं के तराजू में तौलते हमारे इमोशंस - लक्ष्मी चौहान , देहरादून, उत्तराखंड


 

जज्बातों पर बंदिशें क्यों? : परंपराओं के तराजू में तौलते हमारे इमोशंस

-  लक्ष्मी चौहान , देहरादून, उत्तराखंड


भावनाओं का संसार और समाज की संकीर्ण दीवारें

इमोशंस: जीवन का असली संगीत

हम सभी अपनी जिंदगी के सफर में कई तरह के इमोशंस यानी भावों से गुजरते हैं। खुशी, गम, गुस्सा, प्यार और तड़प—इन्हीं सब अनमोल भावों के मेल को हम 'फीलिंग्स' (Feelings) का नाम देते हैं। ये भावनाएँ ही हैं जो हमें एक इंसान बनाती हैं। लेकिन हमारे आसपास की दुनिया में इन भावनाओं को व्यक्त करने के तरीके बड़े अजीब हैं। कुछ लोग अपनी फीलिंग्स को दिल के किसी कोने में छुपा लेते हैं, मानो कोई गुनाह कर रहे हों, तो कुछ लोग उन्हें खुलकर जाहिर कर देते हैं।

रूढ़िवादिता की बेड़ियाँ: "मर्द को दर्द नहीं होता"

आपने अक्सर अपने आसपास, परिवार में या फिल्मों में लोगों को कुछ घिसे-पिटे जुमले बोलते सुना होगा— "लड़कियों को ज्यादा नहीं बोलना चाहिए" या "मर्द को दर्द नहीं होता"। इन बातों को सुनकर गहरा अफसोस होता है। क्या इन वाक्यों से हम यह अंदाजा नहीं लगा सकते कि आज भी हम उसी रूढ़िवादी समाज का हिस्सा हैं, जहाँ इंसान को इंसान बाद में, और लड़का या लड़की पहले समझा जाता है?

बचपन से ही हमारे घरों में बच्चों के दिमाग में यह बात डाल दी जाती है कि लड़कों को कभी रोना नहीं चाहिए, क्योंकि लड़के हमेशा 'स्ट्रांग' यानी मजबूत होते हैं। रोना तो कमजोरों का काम है! लड़के के आँसू आते ही उसे टोक दिया जाता है, जिससे वह अपनी तकलीफों को अंदर ही अंदर दबाना सीख जाता है।

प्रकृति की देन पर परंपराओं का पहरा

हम शायद यह भूल जाते हैं कि हम सभी को ईश्वर ने इमोशंस जैसी एक बेहद नायाब और खूबसूरत चीज दी है। मगर अफसोस की बात यह है कि हमारे तथाकथित सभ्य समाज में परंपराओं के नाम पर इन प्राकृतिक इमोशंस को भी जेंडर (लिंग) के आधार पर बांट दिया जाता है। लड़कियों के हिस्से में चुप रहना और लड़कों के हिस्से में पत्थर बन जाना लिख दिया जाता है।

आजादी के मायने और एक नए समाज की शुरुआत

आजादी के ढोंग और भावनाओं से खिलवाड़

शायद आपको भी यह बात हैरान करती होगी कि आजादी के इतने सालों बाद भी हम मानसिक रूप से आजाद नहीं हो पाए हैं। आज भी हम उन खोखली और रूढ़िवादी परंपराओं से घिरे हुए हैं, जिनका हमारी व्यावहारिक जिंदगी में कोई सकारात्मक महत्व नहीं है। शायद यही वजह है कि इन्हीं दकियानूसी परंपराओं की आड़ में हमेशा से लोगों की सच्ची भावनाओं के साथ खिलवाड़ होता आया है। भावनाओं को दबाने का यह सिलसिला कई बार इंसानी दिमाग पर इस कदर हावी हो जाता है कि लोग डिप्रेशन और अकेलेपन का शिकार हो जाते हैं।

बस, बात सिर्फ इतनी सी है...

हकीकत तो यह है कि इमोशंस हमारी जिंदगी का वह सबसे खूबसूरत हिस्सा हैं, जिससे हम अपने विचारों और अंतरात्मा के भावों को व्यक्त कर सकते हैं। इमोशन किसी इंसान के बनाए नियम नहीं हैं, ये तो कुदरत की अनमोल देन हैं और ये हर धड़कते दिल के अंदर पाए जाते हैं।

ईश्वर ने हमें ये भावनाएँ इसीलिए दी हैं ताकि हम इस सुंदर सृष्टि का मन  से आनंद  ले सकें, दूसरों के दुख-सुख को महसूस कर सकें और आपस में जुड़ सकें। इसीलिए कभी भी, किसी भी जाति, लिंग या परंपरा के आधार पर इन जज्बातों को नज़र   अंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष: इंसानियत की सबसे बड़ी ताकत

भाव या इमोशंस कोई कमजोरी नहीं हैं, बल्कि ये हमारी इंसानियत की सबसे बड़ी ताकत हैं। रोना कमजोरी नहीं, बल्कि दिल का बोझ हल्का करने का कुदरती जरिया है; और खुलकर बोलना उद्दंडता नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व की पहचान है।

एक सचमुच जागरूक, शिक्षित और आजाद समाज वही है, जहाँ हर व्यक्ति—चाहे वो लड़का हो या लड़की—बिना किसी डर, खौफ या झिझक के अपनी भावनाओं को खुलकर व्यक्त कर सके। आइए, आज हम सब मिलकर इन रूढ़ियों को पीछे छोड़ें, रूढ़िवादिता की इन दीवारों को गिराएं और हर इंसान के हर जज्बात का सम्मान करना सीखें। क्योंकि जज्बात हैं, तो ही हम इंसान है

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post