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विलोम व्यंग्य : दी ओल्ड झालमुडी डेज- विवेक रंजन श्रीवास्तव , लंदन



विलोम व्यंग्य : 

दी ओल्ड झालमुडी डेज

- विवेक रंजन श्रीवास्तव , लंदन 

      इन दिनों बंगाल में एक अजीब नया संकट है। लोगों के पास कोसने  के लिए पुराने मुद्दे नहीं  हैं। पहले आदमी सुबह उठता था, चाय पीता था और कट मनी को कोसता था। जीवन में एक उद्देश्य था। एक स्थिरता थी। अब कई लोगों को समझ नहीं आ रहा कि नाश्ते के साथ किसे गाली दें। पुराने दिन याद आते हैं। क्या शानदार व्यवस्था थी।

सरकार कोलकाता से बजट भेजती थी,  और वह रुपया इतना मिलनसार था कि रास्ते में सबसे मिलता जुलता चलता था। किसी को निराश नहीं करता था। वह लोकतांत्रिक रुपया था। वह पहले स्थानीय नेतृत्व का हालचाल पूछता था, फिर कार्यकर्ताओं का, फिर व्यवस्था के पुजारियों का। अंत में यदि कुछ बच जाता था तो लाभार्थी के घर भी कभी कभार दस्तक दे देता था।

नई सरकार के रुपये में वह तहजीब नहीं रही।
सीधे डी बी टी खाते में घुस जाता है। न मोहल्ले के पार्टी प्रतिनिधियों से राम राम, न नमस्कार।

पुराने दिनों में जमीनी विकास पार्टी प्रतिनिधियों के कब्जे में था। यही उसकी सबसे बड़ी विशेषता थी। असली विकास वह होता है जो हर जगह मौजूद हो लेकिन कहीं पकड़ा न जाए। सड़क का पैसा सड़क में न दिखे, पुल का पैसा पुल में न दिखे, योजना का पैसा योजना में न दिखे। वह विकास का आध्यात्मिक रूप था। उसे देखने के लिए मूल रूप से तृण साधना चाहिए होती थी।

अब लोग सड़क देखकर पूछते दिख रहे हैं, यह  कैसे बनी।
समय बदल गया है।
मुझे एक सज्जन मिले। बोले, व्यवस्था सुधर गई है।
मैंने कहा, दुखद समाचार है।
बोले, क्यों।
मैंने कहा, इसलिए कि पंद्रह साल  का अनुभव नष्ट हो गया। हम लोगों ने एक प्रमाण पत्र बनवाने में जितना जीवन दर्शन सीखा था, उतना आजकल की पीढ़ी विश्वविद्यालय से नहीं सीख पायेगी। एक खिड़की से दूसरी खिड़की तक भटकते हुए आदमी समझ जाता था कि संसार माया है, फाइल सत्य है और बाबू ब्रह्म है।
अब आवेदन करो और उत्तर आ जाता है।
आध्यात्मिकता का यह पतन चिंताजनक है।
पुराने समय में कट मनी केवल आर्थिक गतिविधि नहीं थी। वह लोक संस्कृति थी। वह लोक व्यवहार की तरह थी। एक आदमी पैसा देता था, दूसरा आगे बढ़ाता था, तीसरा संभालता था, चौथा वितरित करता था। पूरा तंत्र एक समूहगान की तरह काम करता था। कोई अकेला नहीं खाता था। आजकल लोग भ्रष्टाचार को भी निजी बना देना चाहते हैं। सामूहिकता का यह ह्रास दुखद है।

तब जनता भी बड़ी समझदार थी।
उसे मालूम था कि उसका काम होने वाला नहीं है, फिर भी वह आवेदन देती थी। उसे मालूम था कि शिकायत का परिणाम शिकायत ही रहेगा, फिर भी शिकायत करती थी। लोकतंत्र में विश्वास ऐसा ही होता है।

अब जनता सवाल पूछने लगी है।
पैसा कहां गया।
काम कब होगा।
लाभ किसे मिला।
यह पूछताछ की आदत बहुत खतरनाक है। यदि जनता इसी तरह पूछती रही तो कई महान परंपराएं विलुप्त हो जाएंगी। आने वाली पीढ़ियां संग्रहालय में जाकर देखेंगी कि कभी यहां कट मनी नाम की  परम्परा थी जो जनता के पैसे पर चलती थी ।
एक समय था जब हर योजना के साथ अदृश्य लाभार्थियों की लंबी सूची होती थी। अब लाभार्थी वही है , जो सच्ची मुच्ची में जिंदा है,जिसका नाम लिखा है। यह प्रशासनिक सादगी कुछ लोगों को वैसी ही लगती है जैसे रसगुल्ले से रस निकाल दिया जाए।

 नई सरकार ने समाज में कुछ विचित्र परिवर्तन किए हैं। लोग अब अपने अधिकार की बात करते हैं। योजनाओं का हिसाब मांगते हैं। स्थानीय स्तर पर निगरानी करते हैं। अधिकारियों से प्रश्न पूछते हैं। पहले प्रश्न पूछना असभ्यता माना जाता था। अब उत्तर न देना असुविधाजनक माना जाने लगा है।

लोकतंत्र के लिए इससे बड़ी दुर्घटना और क्या होगी।
अब तो हालत यह है कि कई लोग ईमानदारी को उपलब्धि बताने लगे हैं। जबकि हमारे यहां ईमानदारी मजबूरी मानी जाती थी।

खैर, समय की अपनी जिद होती है।
पुराने कट मनी वाले दिन अब इतिहास के एल्बम में रखी पीली पड़ चुकी तस्वीरों की तरह हैं। उन्हें देखकर कुछ लोगों की आंखें नम हो जाती हैं। वे उन दिनों को याद करते हैं जब जनता विकास का कच्चा माल हुआ करती थी।
 बंगाल अब एक नई झालमुडी की तरह है।
जनता उसका मुरमुरा है। जितना अधिक कुरकुरा, उतना अच्छा।
नई सरकार सरसों का तेल है। उसका काम हर दाने तक पहुंचना है, किसी एक कटोरी में जमा हो जाना नहीं।
जवाबदेही प्याज है। उसे काटते ही कई पुरानी आंखों में पानी आ जाता है।
पारदर्शिता हरी मिर्च है। खाते ही वे लोग उछल पड़ते हैं जिनकी जीभ वर्षों तक मलाईदार मसालों की अभ्यस्त रही है।
कानून नींबू है। वह पूरे मिश्रण को ताजा और स्वादिष्ट बनाए रखता है।

और कट मनी?
वह झालमुडी में गलती से आ गया वह पुराना कंकड़ है जिसे कभी लोगों ने मसाला समझ लिया था।
आज चेतना का तकाजा है कि जनता मुरमुरा बनी रहे, कुरकुरी और जागरूक। सरकार तेल बनी रहे, सब तक समान रूप से पहुंचने वाली। प्याज, मिर्च और नींबू अपना काम करते रहें।
क्योंकि जिस दिन कंकड़ फिर से मसाला घोषित हो गया, उस दिन लोकतंत्र की झालमुडी खाने लायक नहीं बचेगी, केवल दांतों के डॉक्टरों का व्यापार बढ़ेगा।

- विवेक रंजन श्रीवास्तव 
लंदन

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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