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कृतज्ञता का रस और समर्पण का सौंदर्य- डॉ. मीनाक्षी दुबे, भोपाल



कृतज्ञता का रस और समर्पण का सौंदर्य

- डॉ. मीनाक्षी दुबे, भोपाल

सो सब तव प्रताप रघुराई। 
नाथ न कछु मोरि प्रभुताई॥

      भारतीय मनीषा ने हमेशा 'मैं' के विसर्जन में ही 'सत्य' की खोज की है। जब गोस्वामी तुलसीदास रामचरितमानस में हनुमान जी के मुख से यह पंक्तियाँ कहलवाते हैं, तो वह केवल एक भक्त का संवाद नहीं लिख रहे होते, बल्कि वे समूची मानवता को अहंकार के गुरुत्वाकर्षण से मुक्त होने का मार्ग दिखा रहे होते हैं। असीम सागर को लाँघने, स्वर्ण लंका को भस्म करने और महाबली राक्षसों का मान-मर्दन करने के बाद भी यदि कोई व्यक्तित्व इतना सहज बना रहे कि वह अपनी पीठ पर सफलता का कोई बोझ न रखे, तो यही अध्यात्म और सभ्यता का शिखर है।  आज का आधुनिक समाज 'क्रेडिट' यानी श्रेय लेने की अंधी दौड़ में दौड़ रहा है, जहाँ हर व्यक्ति अपने छोटे से छोटे कर्म का ढिंढोरा पीटने को आतुर है। ऐसे अशांत समय में हनुमान जी का यह आत्म-निवेदन एक ठंडी हवा के झोंके जैसा प्रतीत होता है। वे कहते हैं कि जो कुछ भी घटित हुआ, वह प्रभु का प्रताप था, मेरी अपनी कोई बिसात नहीं थी। यह कायरता या आत्मविश्वास की कमी नहीं है, बल्कि यह उस परम चेतना के प्रति कृतज्ञता है जो हमें माध्यम बनाकर बड़े-बड़े कार्य करवा लेती है।पौवरणिक इतिहास इस बात का जीवंत साक्षी है कि जब-जब किसी महापुरुष या देवता के मन में क्षण भर के लिए भी 'कर्तापन' यानी यह काम मैंने किया है का भाव आया, तब-तब प्रकृति ने उनके इस भ्रम को बड़ी सहजता से तोड़ा है। महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद का वह प्रसंग अत्यंत प्रासंगिक है जब भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि तुम पहले रथ से उतरो। अर्जुन को थोड़ा संकोच हुआ क्योंकि युद्ध के नियमानुसार सारथी पहले उतरता है और योद्धा बाद में। लेकिन श्रीकृष्ण के बार-बार आग्रह करने पर जब अर्जुन उतरे और उनके बाद जैसे ही श्रीकृष्ण भी रथ से अलग हुए, वह दिव्य रथ धू-धू करके जल उठा। अर्जुन स्तब्ध रह गए और तब श्रीकृष्ण ने मुस्कुराकर कहा कि अर्जुन, यह रथ तो भीष्म, द्रोण और कर्ण के दिव्यास्त्रों से बहुत पहले ही भस्म हो चुका था, यह तो केवल मेरे प्रताप और मेरी उपस्थिति के कारण खड़ा था। अर्जुन का सारा भ्रम एक पल में हवा हो गया। ऐसा ही एक सुंदर प्रसंग गोवर्धन लीला का भी है, जब ब्रजवासियों ने इंद्र की पूजा छोड़कर गोवर्धन की पूजा की और इंद्र ने अपने मद में चूर होकर प्रलयंकारी मेघ भेज दिए। श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठ उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया, लेकिन उस समय ग्वाल-बालों ने अपनी-अपनी लाठियाँ पर्वत के नीचे लगा दीं और सोचने लगे कि पर्वत को उन्होंने रोक रखा है। श्रीकृष्ण ने जैसे ही उंगली थोड़ी सी ढीली की, पर्वत नीचे आने लगा और ग्वालों की लाठियाँ चटकने लगीं, तब जाकर उन्हें समझ आया कि वास्तविक शक्ति किसकी थी।प्रकृति और कला का व्यावहारिक जगत भी हमें हर पल यही शाश्वत सत्य सिखाता है। जब तक बांसुरी के भीतर की गांठें नहीं टूटतीं और वह भीतर से पूरी तरह खाली नहीं होती, तब तक उसमें से कोई मधुर तान नहीं निकल सकती। बांसुरी बजती अवश्य है, लेकिन संगीत उसका अपना नहीं, बल्कि उसमें फूंक मारने वाले का होता है। मनुष्य का अहंकार भी एक ऐसी ही गांठ है। जैसे ही मनुष्य इस भ्रांति से मुक्त होता है कि सब कुछ मैं ही कर रहा हूँ, उसका जीवन बेहद सरल हो जाता है। वह सफलता में उन्मादी नहीं होता और विफलता में अवसाद से नहीं घिरता, क्योंकि वह समझ जाता है कि वह केवल एक निमित्त है, एक सुंदर माध्यम है। जैसे एक कठपुतली मंच पर अद्भुत नृत्य करती है और दर्शक दीवाने होकर तालियाँ बजाते हैं, लेकिन वह प्रशंसा कठपुतली की नहीं होती। वह प्रशंसा तो उस पर्दे के पीछे बैठे सूत्रधार की उंगलियों की होती है, जो उन धागों को हिला रहा है। हनुमान जी खुद को श्रीराम की उंगलियों पर नाचने वाली वही प्रिय कठपुतली मानते हैं। यह चौपाई हमें जीवन जीने की एक अद्भुत कला सिखाती है कि ऊँचाइयों पर पहुँचना बड़ी बात है, लेकिन वहाँ पहुँचकर अपनी जड़ों और उस अदृश्य परम शक्ति को न भूलना ही वास्तविक महानता है। नदी जब तक अलग बहती है तब तक उसका अस्तित्व सीमित रहता है, लेकिन जैसे ही वह सागर में विलीन होती है, वह स्वयं विशाल बन जाती है। ठीक वैसे ही, जब मनुष्य अपनी प्रभुताई को शून्य कर देता है, तभी वह समाज और ईश्वर के हृदय में शाश्वत स्थान पाता है।

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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