व्यंग्य :
सैंया भये कोतवाल
- देवेन्द्र कुमार रावत , भोपाल
"सैंया भये कोतवाल, अब डर काहे का" वर्तमान में यह मुहावरा इतना लोकप्रिय है कि हिंदी पढ़ाने वाले शिक्षक को भी व्याकरण की कक्षा में वाक्य प्रयोग करके इसका अर्थ बताने की आवश्यकता नहीं रह गई है । क्योंकि इस मुहावरे के अर्थ के अनुसार, आए दिन जहाँ-तहाँ, कभी भी रौब दिखाते हुए ये नकली कोतवाल (छुटभैये नेता जी) अपना प्रायोगिक प्रदर्शन करते दिखाई देते हैं । ये ही वे लोग हैं जो अपने आकाओं के नाम पर जो कुछ भी करते हैं इससे उनकी छबि बिगड़ती है । पर वे क्या करें शीर्ष नेतृत्व को तो बाद में पता चलता है ऐसे ही कभी-कभी तो असली कोतवालों की किरकिरी भी हो जाती है । इसमें भी सबसे ज्यादा ठेस इन कोतवालों की सजनियों को लगती है जबकि, पहले इन असली कोतवालों की पत्नियाँ खुद को बहुत भाग्यशाली समझती थीं, जिन्हें सौभाग्य से पति के रूप में 'कोतवाल' मिल जाते हैं । समाज में उनकी स्थिति ठीक वैसी ही है , जैसे किसी डॉक्टर की पत्नी 'डॉक्टरनी' और मास्टर की पत्नी 'मास्टरनी' कहलाती है । भले ही डॉक्टरनी या मास्टरनी खुद उतनी पढ़ी-लिखी न हों, लेकिन हमारे समाज में तो पत्नी होने के नाते बोलचाल की भाषा में लोग उन्हें पति के पद के अनुरूप ही संबोधित करते हैं । हमारे यहाँ तो किसी भी स्त्री का विवाह होते ही पति के पद की गरिमा और रौब स्वतः ही मिल जाता है । जैसे कोतवाल साहब की पत्नी का रुतबा भी ऐसा ही होता है, जितना उनके पति का । कोतवाल साहब की पत्नी से भी लोग डरते हैं कि "भाई, इनके सैंया तो कोतवाल हैं !" दूसरे शब्दों में कहें तो, जिनके सैंया कोतवाल हो गए, उन्हें भला किसी से डरने की क्या ज़रूरत ? हाँ, दूसरों को डराने और धमकाने का अधिकार अवश्य मिल जाता है । किंतु, समय चक्र नें इस मुहावरे का तो अर्थ ही बदल डाला है । 'नेतागीरी' के चलते इन पत्नियों से छुटभैये नेताओं ने यह सुखाधिकार भी छीन लिया है । अब तो किसी भी सार्वजनिक स्थान पर ये छुटभैये नेता, बिना कोई परीक्षा पास किए, खुद ही 'नकली कोतवाल' की भूमिका में नज़र आते हैं । इन्हें कानून या व्यवस्था का कोई डर नहीं रहता । इसका सबसे बड़ा नुकसान तो यह हो रहा है कि जहाँ असली कोतवाल के पद की गरिमा घट रही है, वहीं कानून-व्यवस्था की धज्जियाँ भी उड़ रही हैं । कहाँ बेचारा वह असली कोतवाल, जिसने कड़ी मेहनत करके यह पद पाया है, वह इन छुटभैये नेताओं के सामने मजबूर हो जाता है । दूसरी तरफ, अब असली कोतवालों की पत्नियों को भी एक नया डर सताने लगा है। वे अब पहले की तरह बीती बातों को याद कर बेखौफ नहीं रहीं, क्योंकि उन्हें डर रहता है कि उनके कोतवाल पति कब इन छुटभैये नेताओं की राजनीति का शिकार न हो जाएँ और कब उन्हें ट्रांसफर (तबादले) का दुःख झेलना पड़े। अब तो ये सजनियां डर-डर कर जीवन जी रही हैं । इन्हें डर इस बात का है कि नई जगह ट्रांसफर होने पर पता नहीं इतनी 'ऊपरी आमदनी' वाली कोतवाली मिलेगी या नहीं ! कहीं मलाईदार पोस्टिंग के बदले 'लाइन हाजिर' (लाइन अटैच) न कर दिया जाए, नहीं तो फील्ड का सारा रौब ही चला जाएगा । इसके अलावा, घर-गृहस्थी के सामान की उठापटक के साथ ही जो निःशुल्क सुविधाएँ मिल रही थीं, उन्हें फिर से प्राप्त करना पड़ेगा। बच्चों की पढ़ाई में भी व्यवधान आएगा, सो अलग । इसके साथ ही, नई जगह जाकर भी चैन से रह पाएँगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है; क्योंकि इन छुटभैये नेताओं का कार्यक्षेत्र बहुत व्यापक होता है । जबकि, मध्यकालीन भारत में किसी विशेष क्षेत्र, शहर, किले या कस्बे के प्रमुख पुलिस अधिकारी को कोतवाल कहा जाता था । अभी भी पुराने लोग थानेदार साहब की जगह 'कोतवाल साहब' कहा करते हैं । किंतु, अब ये नकली छुटभैये कोतवाल की भूमिका में कहीं भी प्रकट होकर अपना रौब झाड़ने लगते हैं । इसके विपरीत, एक असली कोतवाल का कार्यक्षेत्र एक निश्चित सीमा (थाना क्षेत्र) तक ही सीमित होता है; वह अपनी सीमा से बाहर जाकर हस्तक्षेप नहीं कर सकता । लेकिन ये नेता तो पूर्णतः स्वतंत्र हैं । ये लोग खुद को कानून से ऊपर मानते हैं, इसी कारण आज कानून-व्यवस्था के सामने सबसे बड़ा संकट खड़ा हो गया है ।
इसलिए अब यह आवश्यक हो गया है कि सबसे पहले हिंदी व्याकरण में जो इस मुहावरे का अर्थ है, अब उसे ही बदल दिया जाए । "अब सैंया की सजनी का नहीं, बल्कि सैंया के चमचों का ज़माना है, जिन्हें अब कोई डर नहीं है; वे चाहे जो करें, उनकी मर्ज़ी !" इनकी मन मर्जी से सुरक्षा व्यवस्था भी खतरे में पड़ती जा रही है । इस मुहावरे के बदले अर्थ को हम वैश्विक संदर्भ में देखें, तो दुनिया के जो सर्वाधिक शक्तिशाली देश हैं, उनके प्रमुख अपने 'संवैधानिक पदों' को अब उतना महत्व नहीं देते है , जितना कि वे पूरे विश्व का 'कोतवाल' बनना पसंद कर रहे हैं । वर्तमान विश्व की स्थिति को देखकर तो यही कहा जा सकता है कि बेचारे कमजोर देश, इन बड़े वैश्विक कोतवालों के सामने असहाय हो गए हैं और उनकी संप्रभुता भी खतरे में पड़ गई है । अब ये पहिले अपनी सीक्रेट एजेंसियों के द्वारा किसी भी देश में अराजकता फैलाते है बाद में शांति व्यवस्था के नाम पर कोतवाल की भूमिका निभाते है पूरे विश्व में इसी कारण संघर्ष व्याप्त है ऐसी स्थिति में मजे में तो वे देश है जिन्होंने "सैंया भये कोतवाल, अब डर काहे का" बदला हुआ अर्थ समझ लेने से वैश्विक कोतवालों के खेमे में जाकर शरण ले ली है ।
महेंद्रा स्कावयर्स
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