भारतीय जनजीवन के अमर चितेरे
मुंशी प्रेमचंद
31 जुलाई 1880 में वाराणसी के लमही गाँव में कोहिनूर जगमगा उठा जो हिन्दी साहित्य जगत में प्रेमचंद के नाम से मशहूर हुआ। आज उन्हीं की 146 वीं जयंती पर उन्हें सादर नमन करते हुए उनकी कुछ बहुचर्चित रचनाओं पर अपने विचार रख रही हूँ ।
मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य के ऐसे युगप्रवर्तक साहित्यकार हैं, जिन्होंने भारतीय जनजीवन की पीड़ा, संघर्ष, संवेदना और यथार्थ को अपनी लेखनी के माध्यम से अमर कर दिया। वे केवल कथाकार नहीं थे, बल्कि भारतीय समाज के सजग और संवेदनशील इतिहासकार भी थे। उन्होंने अपने साहित्य में किसान, मज़दूर, स्त्री, दलित, निम्न एवं मध्यम वर्ग तथा ग्रामीण जीवन की समस्याओं को जिस आत्मीयता और यथार्थ के साथ चित्रित किया, वह हिंदी साहित्य में अद्वितीय है। यही कारण है कि उन्हें भारतीय जनजीवन का अमर चितेरा कहा जाता है।
महादेवी वर्मा जी के ये उद्गार प्रेमचंद जी के जीवन और उनके स्वर्णिम साहित्य के खरेपन को जांचने की कसौटी है । वहीं शरदचंद्र चटर्जी ने उन्हें उपन्यास सम्राट की उपाधि से सम्मानित किया ।
प्रेमचंद की रचनाएं हिंदी साहित्य की धरोहर हैं। हर रचना बहुमूल्य है जो अपने समय की सच्चाई को बयां करती हैं और उनकी ख़ासियत है कि वे आज भी प्रासंगिक हैं।उन्होंने साहित्य में यथार्थवाद की नींव रखी।
उन का रचना संसार बहुत बड़ा और समृद्ध है। बहुआयामी प्रतिभा के धनी प्रेमचंद ने गद्य की हर विधा में अपनी कलम चलाई है ।उनकी कहानियां और उपन्यास उन्हें प्रसिद्धि के जिस मुकाम तक ले गए वो आज तक अछूता है।
प्रेमचंद का आरंभिक लेखन उर्दू में हुआ, किंतु सन् 1918 में उनका पहला हिंदी उपन्यास सेवासदन प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास वेश्यावृत्ति की समस्या तथा समाज में महिलाओं के आर्थिक और सामाजिक शोषण पर आधारित है। सेवासदन की सफलता के बाद उन्होंने मुख्यतः हिंदी में ही लेखन किया और हिंदी कथा-साहित्य को नई दिशा प्रदान की।
उनका बहुचर्चित उपन्यास कर्मभूमि सन् 1932 में हिंदी में प्रकाशित हुआ तथा दो वर्ष बाद मैदान-ए-अमल नाम से उर्दू में भी प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास उस समय की राजनीतिक और सामाजिक चेतना का सशक्त दस्तावेज़ है। उस काल में किसान आंदोलन, लगानबंदी आंदोलन, दलितों के मंदिर-प्रवेश का प्रश्न, अंग्रेज़ी शिक्षा का विरोध तथा स्वतंत्रता आंदोलन समाज को आंदोलित कर रहे थे। प्रेमचंद ने इन सभी परिस्थितियों को गहराई से समझा और उन्हें अपनी रचनाओं में अभिव्यक्ति दी। उन्होंने महिलाओं की बदलती भूमिका को भी पहचानते हुए अपने साहित्य में उन्हें महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान किया।
ग़बन में उन्होंने मध्यमवर्गीय जीवन, आभूषण-प्रेम, सामाजिक प्रतिष्ठा की लालसा तथा नैतिक द्वंद्व का चित्रण किया है। रमानाथ और जालपा के माध्यम से उन्होंने मानव-मन की दुर्बलताओं और सामाजिक दबावों को अत्यंत स्वाभाविक रूप में प्रस्तुत किया है।
प्रेमचंद का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास गोदान भारतीय किसान-जीवन का महाकाव्य माना जाता है। इसमें किसान की आर्थिक विवशता, कर्ज़, लगान, सूदखोरी, ज़मींदारी व्यवस्था तथा सामाजिक विषमताओं का अत्यंत मार्मिक और यथार्थ चित्रण है। किसान होरी केवल एक पात्र नहीं, बल्कि भारतीय कृषक समाज का प्रतिनिधि बनकर सामने आता है। इस उपन्यास के माध्यम से प्रेमचंद ने भारतीय ग्राम्य जीवन की जटिलताओं को गहराई से समझने और समझाने का प्रयास किया है।
प्रेमचंद ने नारी-जीवन और उसकी समस्याओं को भी गंभीरता से चित्रित किया। निर्मला दहेज-प्रथा और अनमेल विवाह की त्रासदी को प्रस्तुत करता है, जबकि प्रतिज्ञा विधवा-जीवन की समस्याओं पर प्रकाश डालता है। उनकी प्रसिद्ध कहानी बूढ़ी काकी वृद्धों की उपेक्षा और मानवीय संवेदनाओं की मार्मिक कथा है, वहीं बड़े घर की बेटी पारिवारिक मूल्यों, त्याग और विवेक का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करती है।
जिस समय हिंदी कथा-साहित्य में तिलस्मी, ऐयारी और जादुई कथाओं का प्रभाव था, उस समय प्रेमचंद ने कहानी को यथार्थ की नई दिशा प्रदान की। उन्होंने साधारण मनुष्य के जीवन-संघर्ष को साहित्य का केंद्र बनाया। उनके पात्र किसी कल्पना-लोक के नायक नहीं, बल्कि हमारे आसपास के किसान, मज़दूर, स्त्रियाँ, दलित और संघर्षरत सामान्य लोग हैं।
प्रेमचंद की कहानी पूस की रात आज भी उतनी ही प्रासंगिक प्रतीत होती है। इस कहानी में किसान की गरीबी, आर्थिक अभाव और विवशता का अत्यंत सजीव चित्रण है। हल्कू का चरित्र यह दर्शाता है कि खेती किसान के लिए सम्मानजनक आजीविका के बजाय विवशता का प्रतीक बनती जा रही है। किसान की पीड़ा, कर्ज़ का बोझ, प्राकृतिक आपदाओं का संकट और खेती से पलायन जैसी समस्याएँ आज भी समाज के सामने विद्यमान हैं। पूस की रात पढ़ते समय लगता है मानो प्रेमचंद आज के समय को भी देख रहे हों।
प्रेमचंद की भाषा सरल, सहज, मुहावरेदार और जनसामान्य के निकट है। उन्होंने साहित्य को अभिजात वर्ग की सीमाओं से निकालकर आम जन के जीवन से जोड़ा। निम्न और मध्यम वर्ग के जीवन का जितना प्रामाणिक चित्रण उन्होंने किया है, वह हिंदी साहित्य में अनुपम है।
प्रेमचंद का साहित्य केवल अपने समय का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि भारतीय समाज की चेतना का जीवंत इतिहास है। उन्होंने भारतीय समाज को केवल देखा नहीं, बल्कि उसे जिया और अपनी लेखनी के माध्यम से आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित कर दिया। उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, क्योंकि उनमें मनुष्य, समाज और जीवन का शाश्वत सत्य निहित है। आने वाली पीढ़ियाँ भी उनके साहित्य से संवेदना, यथार्थ और मानवीय मूल्यों की प्रेरणा प्राप्त करती रहेंगी।
ऐसे युगप्रवर्तक साहित्यकार, भारतीय जनजीवन के अमर चितेरे मुंशी प्रेमचंद को उनकी जयंती पर शत-शत नमन।
- मधूलिका श्रीवास्तव
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