काव्य :
स्वीकृति
दूर है तो क्या निगहबां तो है
दुनिया की भीड़ में कोई
मेहरबां तो है
रहता नहीं पास देखता दूर से ही है
हो न जाऊँ कहीं बदनाम सोचता तो है
निगाहों में मेरा चेहरा लिए घूमता है
जताता नहीं अधिकार
मगर चाहता तो है
दुनियावी रास्तों पर दूर ही दूर रहता है
इश्क की गलियों में नील वो साथ चलता तो है
अहसास मुझे भी उसके
साथ होने का है
दिल मेरा भी उसके नाम से धड़कता तो है।
- डा.नीलम , अजमेर
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