काव्य :
आखिर कब तक?
एक बेटी का सवाल,
ये कैसा समाज है।
यहाँ लोग नहीं हैवान हैं।
भरोसा जिसकी भूल थी,
ये कैसा इंसाफ है।
यहाँ लोग नहीं रहते
हैवानों का राज है।
लड़कियों की इज्जत उछालना इनका यही रिवाज है।
कहते हैं जिसे देवी
उसे गुलाम बनाते हैं।
लड़कों के गुनाह छुपाकर लड़कियों पर उंगली उठाते हैं।
कहाँ गई वो खबरें सारी,
जो सिर्फ कहानियों में खो गई?
क्या हुआ उस डॉक्टर का, जिसकी साँसे हमेशा के लिए
सो गई?
उस दिन भी मेरा ये सवाल था क्या गलती थी उसकी,
क्या बस ये कि वो लड़की थी?
या किसी की जान बचाने के लिए ड्यूटी कर रही थी?
दिल्ली के उस कांड का क्या अंजाम हुआ?
उस मासूम तेरह साल की बच्ची का क्यों जीवन तमाम हुआ?
ये प्रश्न है मेरा?
मेरी ये ख्वाहिश है उसे बीच चौराहे लाया जाए
जिसने तड़पाया मासूम को उसे वैसे ही तड़पाया जाए
मिले मौत दरिंदगी की,
कि सरेआम सजा वो पाए
अगला हैवान कदम उठाने से पहले, सौ बार काँप जाए।
- वैभवी मिश्रा, प्रयागराज
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