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गुरु पूर्णिमा: गुरु का आशीर्वाद, जीवन की सबसे बड़ी पूँजी - डॉ. रीटा अरोड़ा ,करनाल



गुरु पूर्णिमापर विशेष आलेख :

गुरु पूर्णिमा: गुरु का आशीर्वाद, जीवन की सबसे बड़ी पूँजी

एक वृद्ध शिक्षक से सेवानिवृत्ति के कई वर्ष बाद उनका एक शिष्य मिलने आया। उसने चरण स्पर्श करते हुए कहा, "गुरुदेव, आपने जो पढ़ाया था, उसका बहुत-सा भाग तो मैं भूल गया हूँ।"

शिक्षक मुस्कुराए और बोले, "यदि सच बोलना, बड़ों का सम्मान करना, जीवन की मुश्किल घड़ियों में सही रास्ते पर डटे रहना, गिरकर फिर उठना और किसी ज़रूरतमंद का साथ देना नहीं भूले, तो समझो मेरी शिक्षा आज भी तुम्हारे साथ है।"

शिष्य की आँखें नम हो गईं।

शायद यही गुरु की सबसे बड़ी सफलता होती है।

गुरु पूर्णिमा केवल एक पर्व नहीं, बल्कि कृतज्ञता का उत्सव है। यह हमें उन हाथों को याद करने का अवसर देती है, जिन्होंने हमारी उँगली पकड़कर केवल अक्षर नहीं सिखाए, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाई। माता-पिता हमें जीवन देते हैं, लेकिन गुरु उस जीवन को दिशा देते हैं। वे केवल पाठ्यपुस्तक नहीं पढ़ाते, बल्कि व्यक्तित्व गढ़ते हैं। वे केवल परीक्षा की तैयारी नहीं कराते, बल्कि जीवन की कठिन परीक्षाओं का सामना करना भी सिखाते हैं।

आज का विद्यार्थी ऐसे समय में जी रहा है, जहाँ जानकारी का अभाव नहीं है। मोबाइल की एक स्क्रीन पर पूरी दुनिया उपलब्ध है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) कुछ ही क्षणों में कठिन प्रश्नों के उत्तर दे देती है, लेख लिख देती है और अनगिनत जानकारियाँ जुटा देती है। लेकिन AI जानकारी दे सकती है, *संस्कार नहीं* ; उत्तर दे सकती है, *विवेक नहीं*; भाषा सिखा सकती है, *मानवीय संवेदना नहीं*।

यही वह अंतर है, जो गुरु को सदैव विशिष्ट बनाता है। गुरु केवल यह नहीं बताते कि *क्या पढ़ना है*, बल्कि यह भी सिखाते हैं कि *कैसे सोचना है* और *कैसे जीना है*। वे केवल मस्तिष्क को नहीं, चरित्र को भी शिक्षित करते हैं। बदलती तकनीक के इस युग में गुरु का महत्व कम नहीं हुआ है, बल्कि पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है।

हर विद्यार्थी के जीवन में कोई न कोई ऐसा शिक्षक अवश्य होता है, जिसने केवल विषय नहीं पढ़ाया, बल्कि जीवन का कोई अमूल्य पाठ भी सिखाया हो। किसी ने समय का सम्मान करना सिखाया, किसी ने अनुशासन का महत्व समझाया, किसी ने असफलता से हार न मानना सिखाया और किसी ने यह विश्वास जगाया कि ईमानदारी कभी पुरानी नहीं होती।

समय बीत जाता है। कक्षाएँ बदल जाती हैं। विद्यालय और महाविद्यालय पीछे छूट जाते हैं। लेकिन गुरु की कही हुई कुछ बातें जीवनभर हमारे निर्णयों में साथ चलती रहती हैं। जब जीवन किसी कठिन मोड़ पर खड़ा होता है, तब अक्सर किसी शिक्षक की आवाज़ भीतर से सुनाई देती है-"सही रास्ता कठिन हो सकता है, लेकिन गलत रास्ता कभी समाधान नहीं होता।"

एक विद्यालय में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर विद्यार्थियों से कहा गया कि वे अपने प्रिय शिक्षक के लिए केवल एक पंक्ति लिखें। अधिकांश बच्चों ने लिखा—"आप सबसे अच्छे शिक्षक हैं।"

लेकिन एक विद्यार्थी ने लिखा-

*"गुरुदेव, जब भी जीवन में कोई कठिन निर्णय लेना होता है, आपकी आवाज़ आज भी मेरे मन में सुनाई देती है।"*

उस शिक्षक ने वह पर्ची वर्षों तक संभालकर रखी। क्योंकि हर शिक्षक के लिए इससे बड़ा पुरस्कार कोई नहीं कि उसकी शिक्षा कक्षा की दीवारों से निकलकर विद्यार्थी के चरित्र का हिस्सा बन जाए।

आज हम सफलता को अंकों, पद और वेतन से मापने लगे हैं। लेकिन किसी भी सच्चे शिक्षक से पूछिए, वह अपने विद्यार्थी की उपलब्धियों से पहले उसके संस्कारों पर गर्व करता है। उसे प्रसन्नता तब होती है, जब उसका विद्यार्थी विनम्र होता है, सत्य बोलता है, दूसरों का सम्मान करता है और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाता है। क्योंकि डिग्रियाँ जीवनयापन का साधन बनाती हैं, जबकि संस्कार जीवन को सम्मान दिलाते हैं।

गुरु का सम्मान केवल गुरु पूर्णिमा के दिन पुष्प अर्पित करने तक सीमित नहीं होना चाहिए। सच्चा सम्मान तब होता है, जब विद्यार्थी समय का सम्मान करे, अपने माता-पिता के प्रति आदर रखे, अपने शिक्षकों की सीख को व्यवहार में उतारे और अपने ज्ञान का उपयोग केवल स्वयं की सफलता के लिए नहीं, बल्कि समाज के कल्याण के लिए भी करे। यही वह गुरु-दक्षिणा है, जिसकी अपेक्षा हर सच्चा गुरु अपने शिष्य से करता है।

जीवन में आगे बढ़ते हुए विद्यार्थी को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि सीखने की यात्रा कभी समाप्त नहीं होती। जो व्यक्ति सीखना छोड़ देता है, उसका विकास भी रुक जाता है। इसलिए अच्छा विद्यार्थी वही है, जो हर अनुभव, हर व्यक्ति और हर परिस्थिति से कुछ न कुछ सीखने की विनम्रता बनाए रखे। यही विनम्रता उसे जीवनभर आगे बढ़ाती है।

फिर भी गुरु पूर्णिमा हमें एक और गहरा संदेश देती है। गुरु का उद्देश्य केवल शिष्य को अपने पीछे चलाना नहीं होता, बल्कि उसे इतना समर्थ बनाना होता है कि वह एक दिन स्वयं सही निर्णय लेने लगे। 

आज की दुनिया तेजी से बदल रही है। 
तकनीक बदल रही है, 
पढ़ाने के तरीके बदल रहे हैं,
 साधन बदल रहे हैं। 

लेकिन एक चीज़ कभी नहीं बदलती—एक अच्छे गुरु का स्पर्श। 
वह आत्मविश्वास देता है,
 गिरने पर संभालता है,
 सफलता में विनम्र रहना सिखाता है और 
असफलता में उम्मीद नहीं छोड़ने देता।

 यही कारण है कि जीवन में सबसे भाग्यशाली वही विद्यार्थी है, जिसे एक सच्चे गुरु का सान्निध्य मिल जाता है।

इस गुरु पूर्णिमा पर यदि हर विद्यार्थी अपने किसी शिक्षक को केवल एक संदेश लिख दे, एक बार धन्यवाद कह दे, या मन ही मन यह संकल्प ले कि वह उनकी किसी एक सीख को अपने जीवन का स्थायी हिस्सा बनाएगा, तो यही इस पर्व की सबसे सुंदर गुरु-दक्षिणा होगी। वर्षों बाद लोग आपके अंक भूल सकते हैं, आपकी डिग्रियाँ भी पुरानी हो जाएँगी, लेकिन आपका चरित्र हमेशा बताएगा कि आपके गुरु कौन थे।

*फंडा यह है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आपको उत्तर दे सकती है, लेकिन गुरु आपको सही प्रश्न पूछना सिखाते हैं। AI आपको कुशल बना सकती है, पर गुरु आपको श्रेष्ठ इंसान बनाते हैं। इसलिए इस गुरु पूर्णिमा पर अपने गुरु का सम्मान केवल शब्दों से नहीं, बल्कि उनके दिए संस्कारों को अपने जीवन का आधार बनाकर करें। यही गुरु का आशीर्वाद है- और यही जीवन की सबसे बड़ी पूँजी है।*

- डॉ. रीटा अरोड़ा ,
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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