लघु कथा :
नाप
"चाची, ये ब्लाउज़ शाम तक तैयार हो जाएगा?" ग्राहक ने कपड़ा मेज़ पर रखते हुए पूछा।
"हाँ, हो जाएगा," अंजू ने मुस्कराकर कहा।
सिलाई सीखने आई राधा चुपचाप उन्हें देख रही थी।
सामने नई-नई डिज़ाइनों के कपड़ों का ढेर था, लेकिन अंजू की अपनी साड़ी का किनारा कई जगह से उधड़ चुका था।
अचानक सुई उँगली में चुभ गई।
खून की एक छोटी-सी बूँद उभर आई।
अंजू का हाथ वहीं ठहर गया।
वह कुछ पल उस बूँद को देखती रहीं, जैसे बरसों बाद किसी पुराने दर्द ने उन्हें पुकार लिया हो।
राधा घबरा गई, "चाची... बहुत लगी क्या?"
अंजू हल्का-सा मुस्कराईं, "सुई तो पूरी उम्र चुभती रही,
राधा... बस आज पता नहीं क्यों दर्द महसूस हुआ।"
कमरे में कुछ पल के लिए सन्नाटा छा गया।
उन्होंने नाप लेने वाला फीता उठाया और ग्राहक से बस इतना कहा- "ज़रा सीधे खड़े हो जाइए।"
राधा की नज़र अंजू की फीकी, कई जगह से रफू की हुई साड़ी पर गई।
उसने धीरे से पूछा, "चाची... अपने लिए नई साड़ी कब लोगी और उसका ब्लाउज कब सिलोगी?"
अंजू ने राधा की ओर देखा।
होंठ हिले, लेकिन शब्द बाहर नहीं आए।
उन्होंने उँगली पर लगी खून की बूँद पोंछी...
और फिर मशीन का पहिया घुमा दिया।
खट... खट... खट...
राधा देर तक उस आवाज़ को सुनती रही।
उसे समझ नहीं आया...
सुई आज उँगली में चुभी थी,
या पूरे जीवन में।
- डॉ. रीटा अरोड़ा ,
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर
करनाल
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कथा कहानी
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