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बंद दरवाज़ों के बीच सिमटता बचपन- डॉ. रीटा अरोड़ा,करनाल



विचारात्मक आलेख :

बंद दरवाज़ों के बीच सिमटता बचपन

जब पूरे समाज की परवरिश सिमटकर केवल माता-पिता की ज़िम्मेदारी बन गई

"मम्मी, आज फिर मैं अकेली ही रहूँगी?"
स्कूल से लौटते ही आठ साल की ईशा ने दरवाज़े पर खड़ी, दफ्तर जाने को तैयार माँ से उदास होकर पूछा।
माँ ने जल्दी-जल्दी उसके काँधे से टिफ़िन का थैला लिया और घड़ी देखते हुए कहा, "बस बेटा! दफ्तर में एक बहुत ज़रूरी मीटिंग है। तुम तब तक अपना पसंदीदा कार्टून देख लेना, मैं जल्दी आ जाऊँगी।"
ईशा ने कुछ नहीं कहा। उसने चुपचाप अपना बैग रखा, टीवी का रिमोट उठाया और सोफे पर बैठ गई।
कमरे के एक कोने में खड़ी दादी ने गहरी साँस लेते हुए कहा, "हमारे समय में बच्चा कभी अकेला नहीं रहता था। कोई न कोई गोद, कोई न कोई प्यार भरी आवाज़ और कोई न कोई खुला आँगन उसका इंतज़ार करता था।"

माँ के कदम कुछ क्षण के लिए दरवाज़े पर ही ठहर गए। शायद उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि आज बच्चों के पास सुविधाएँ पहले से कहीं अधिक हैं, लेकिन अपनों का साथ पहले से कहीं कम।

यह केवल एक घर की कहानी नहीं है। यह आधुनिक समाज का वह आईना है, जिसमें बच्चों के कमरे बड़े हो गए हैं, लेकिन उनका संसार छोटा। सुरक्षा बढ़ी है, पर अपनापन घटा है।

मानव सभ्यता का इतिहास बताता है कि बच्चे कभी केवल अपने माता-पिता के भरोसे नहीं पले। दादा-दादी, चाचा-चाची, पड़ोसी, रिश्तेदार और पूरा समाज मिलकर उनके व्यक्तित्व का निर्माण करता था। समाजशास्त्र में इसे 'एलोपेरेंटिंग' (Alloparenting) या 'सामाजिक माता-पिता' कहा जाता है। इसका अर्थ है कि बच्चा केवल एक परिवार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि पूरे समाज की साझी धरोहर होता है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि हाथी, चिंपैंज़ी और व्हेल जैसे सामाजिक जीवों में भी बच्चों की सामूहिक देखभाल की परंपरा मिलती है। यह व्यवस्था केवल संस्कृति नहीं, बल्कि प्रकृति का भी नियम है।

भारतीय समाज में यह भावना स्वाभाविक रूप से दिखाई देती थी। संयुक्त परिवार केवल एक साथ रहने की व्यवस्था नहीं थे, बल्कि भावनात्मक सुरक्षा का सबसे मजबूत आधार थे। दादी कहानियों से संस्कार देती थीं, दादाजी अनुभवों से जीवन सिखाते थे, चाचा खेल-खेल में अनुशासन सिखाते थे और पड़ोसी भी बच्चे की गलती पर उसे समझाने का अधिकार रखते थे। बच्चा रिश्तों की गर्माहट में बड़ा होता था। उसे सुरक्षा सीसीटीवी कैमरों से नहीं, बल्कि अपनों की मौजूदगी से मिलती थी।

लेकिन समय बदल गया।

रोज़गार की तलाश में लोग गाँवों और कस्बों से महानगरों की ओर आ गए। संयुक्त परिवार धीरे-धीरे बंद फ्लैटों में सिमट गए। आज माता-पिता ही बच्चे के शिक्षक हैं, मित्र हैं, देखभाल करने वाले हैं और चौबीसों घंटे उसकी सुरक्षा की चिंता करने वाले भी। जो जिम्मेदारी पहले कई लोगों में बँटी होती थी, वह अब केवल दो लोगों के कंधों पर आ गई है। यही आधुनिक पालन-पोषण के अकेलेपन की सबसे बड़ी त्रासदी है।

नतीजतन, आज का माता-पिता हर समय किसी न किसी चिंता में जी रहा है। बच्चा सुरक्षित स्कूल पहुँचा या नहीं? वह इंटरनेट पर क्या देख रहा है? किससे बात कर रहा है? कहीं उसके साथ कुछ गलत तो नहीं हो रहा? यह लगातार बनी रहने वाली चिंता धीरे-धीरे मानसिक थकान में बदल जाती है। मनोवैज्ञानिक इसे 'पैरेंटल बर्नआउट' कहते हैं।

इस बदलाव की सबसे बड़ी कीमत बच्चे चुका रहे हैं।
पहले बच्चे स्कूल से लौटकर दादी की गोद में बैठते थे।
आज वे सीधे मोबाइल की स्क्रीन के सामने बैठ जाते हैं।
पहले शामें गली के खेलों और दोस्तों की हँसी से गूँजती थीं।


आज वही शाम ऑनलाइन गेम और सोशल मीडिया में गुजरती है।
पहले दोस्त दरवाज़े पर आकर आवाज़ लगाते थे।
आज केवल मोबाइल का नोटिफिकेशन बजता है।

धीरे-धीरे स्क्रीन ने उस खालीपन को भरना शुरू कर दिया है, जिसे कभी रिश्ते भरते थे। मोबाइल और टैबलेट कई घरों में 'डिजिटल आया'  (Digital Babysitter)  बन चुके हैं। वे बच्चों को कुछ समय के लिए व्यस्त तो रख सकते हैं, लेकिन अपनापन, धैर्य, संवाद और भावनात्मक सुरक्षा कभी नहीं दे सकते।

एक और बदलाव हमारी भाषा में भी दिखाई देता है। पहले बच्चे हर बड़े व्यक्ति को किसी रिश्ते के नाम से पुकारते थे - चाचा, ताऊ, मौसी, बुआ या दादी। यह केवल संबोधन नहीं था, बल्कि विश्वास का प्रतीक था। आज वर्षों तक एक ही इमारत में रहने वाले पड़ोसी भी एक-दूसरे का नाम नहीं जानते। जब रिश्तों की भाषा कम होने लगती है, तो भरोसे की संस्कृति भी कमजोर पड़ने लगती है।

समाधान अतीत में लौटना नहीं है, बल्कि अतीत की आत्मीयता को वर्तमान की सुविधाओं के साथ जोड़ना है। हमें अपने बच्चों के लिए फिर से एक 'आधुनिक गाँव' बनाना होगा। ऐसा वातावरण, जहाँ दादा-दादी दूर रहकर भी रोज़ बातचीत का हिस्सा हों, पड़ोसी केवल फ्लैट नंबर नहीं बल्कि परिचित चेहरे हों और बच्चे केवल कोचिंग व मॉल तक सीमित न रहकर पार्क, पुस्तकालय, खेल और सामुदायिक गतिविधियों में भी शामिल हों।

हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि हर खाली समय को मोबाइल से भर देना समाधान नहीं है। बच्चों को कभी-कभी ऊबने दीजिए। उन्हें मिट्टी में खेलने, साइकिल चलाने, दोस्तों से झगड़ने और फिर सुलह करना सीखने दीजिए। जीवन की सबसे बड़ी सीखें किसी मोबाइल ऐप से नहीं, बल्कि अनुभवों से मिलती हैं।

अंततः हमें स्वयं से एक प्रश्न पूछना होगा - क्या हमारे बच्चों के पास केवल महँगी सुविधाएँ हैं, या ऐसे लोग भी हैं जो उन्हें नाम से पहचानते हैं, गिरने पर उठाते हैं और रोने पर गले लगाते हैं?

क्योंकि बचपन कभी चार दीवारों में नहीं खिलता।
वह रिश्तों की छाँव में खिलता है।
वह विश्वास की मिट्टी में बढ़ता है।

हो सकता है आज गाँव पहले जैसे न रहे हों, लेकिन यदि हम अपने शहरों, सोसायटियों और मोहल्लों में फिर से संवाद, विश्वास और अपनत्व की संस्कृति जीवित कर सकें, तो बच्चों का बचपन भी फिर से मुस्कुरा सकेगा।

क्योंकि बच्चे केवल किसी एक परिवार की ज़िम्मेदारी नहीं, पूरे समाज का भविष्य होते हैं।

-  डॉ. रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर
करनाल

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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