लघुकथा :
व्यंग्यकार की वापसी यात्रा
बड़ी राजधानी में राष्ट्रीय सम्मान ग्रहण कर एक व्यंग्यकार छोटी राजधानी लौट रहे थे। संयोग से वही प्रकाशक उनके सहयात्री थे जो उन्हें सम्मान समारोह में लेकर गए थे।
प्रकाशक ने मुस्कुराकर पूछा, “सर, अब तो देश का सबसे बड़ा साहित्यिक सम्मान मिल गया। अब निठल्ले होकर बैठेंगे या कुछ क्रांतिकारी लिखेंगे?”
व्यंग्यकार हँसे,
- “अब शायद साहित्यकार-धर्म निभाऊँ। अब न कुछ पाने को बचा है, न खोने को।”
“तो अभी तक क्या निभा रहे थे?”
- “सम्मान-पुरस्कार धर्म।”
दोनों हँस पड़े।
प्रकाशक ने अगला प्रश्न दागा, “आजकल व्यंग्य कैसा लिखा जा रहा है?”
- “आजकल सबसे अधिक व्यंग्य सरकारी दफ़्तरों, बैंकों, बीमा कंपनियों और रेलवे से रिटायर लोग लिख रहे हैं। अनुभव उनके पास खूब है, पर लेखन इतना कैलकुलेटेड कि किसी को बुरा न लग जाए। जबकि व्यंग्य का पहला धर्म ही है— जिसे लगना चाहिए, उसे बुरा लगे।”
“उदाहरण?”
- “अधिकांश रचनाएँ पाँच किस्म की हैं—नोटशीट व्यंग्य, ज्ञापन व्यंग्य, शिकायती व्यंग्य, सपाट निबंध और अख़बारी व्यंग्य। विषय एक होता है, डंडा दूसरे पर चलता है और कीचड़ तीसरे पर उछलता है। अंत में एक क्लिक के साथ रचना संपादक की स्क्रीन पर पहुँच जाती है।”
“कोई परसाई जी या शरद जोशी जैसा भी लिख रहा है?”
व्यंग्यकार ने लंबी साँस ली।
- “कुछ लोग तो पहले ही परसाई जी को लाल कपड़े में बाँधकर सबसे ऊँचे अरगले पर रख चुके हैं, ताकि भूल से भी उनका प्रभाव न पड़ जाए। शरद जोशी की ‘जीप पर सवार इल्लियाँ’ कभी-कभार याद आ जाती हैं, तो उतनी देर बेचैनी रहती है। फिर सब सामान्य हो जाता है। हाँ, कुछ अच्छे व्यंग्यकार आज भी हैं, लेकिन उनकी संख्या उँगलियों की पोरों से आगे नहीं बढ़ती।”
“धार क्यों नहीं रही?”
- “धार अनुभव, अध्ययन और निर्भीक दृष्टि से आती है। वह वातानुकूलित कमरों में नहीं मिलती। आज यात्रा भी तीर्थ-पर्यटन तक सीमित है और लेखन सम्मान-पर्यटन तक। धार्मिक आडंबर पर चुप्पी, राजनीति से भय और पुरस्कार का लोभ—इन तीनों के साथ व्यंग्य नहीं लिखा जाता। व्यंग्य तो निर्भीक और निस्संग का साथी है।”
प्रकाशक ने अंतिम प्रश्न किया, “फिर अख़बार ऐसे व्यंग्य छापते क्यों हैं?”
व्यंग्यकार मुस्कुराए।
- “क्योंकि सबको निष्पक्ष और प्रगतिशील दिखने की अभिनय-कला आती है। आजकल व्यंग्य भी कैलकुलेशन से लिखा और छापा जाता है। विज्ञापन को साध कर व्यंग्य छापा जाता है।”
अब आप गोष्ठियों में अध्यक्ष या मुख्य अतिथि बनेंगे या व्यंग्य लिखेंगे।
- हाँ, सोचते हैं बुढ़ापा संवार लें।
इतने में झटके के साथ ब्रेक लगा और ट्रेन छोटी राजधानी के एक नंबर प्लेटफ़ॉर्म पर एक नंबर व्यंग्यकार के लिए रुक गई।
दोनों उतरे। प्रकाशक ने ट्रॉफ़ी संभाली और व्यंग्यकार ने सम्मान की शॉल ओढ़ी।
व्यंग्यकार के चेले स्टेशन के बाहर बैनर लेकर खड़े थे -
“निर्भीक अभिव्यक्ति का हार्दिक स्वागत है।”
दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा, मुस्कुराए और बिना कुछ कहे आगे बढ़ गए।
- सुरेश पटवा , भोपाल
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