सृजन गर्भ में पलती रचना कर्म की सहयात्री विधा ..समालोचना
- विवेक रंजन श्रीवास्तव , लंदन
साहित्यिक विमर्श में यह प्रश्न एक अनुत्तरित पहेली की भाँति उपस्थित रहता है, कि क्या आलोचना वास्तव में सृजन है?
सृजन (रचनाकर्म) क्रिएटिव और मौलिक होता है, जबकि आलोचना उसी सृजन का प्रतिबिंब। किंतु, यदि हम 'सृजन' शब्द को केवल 'कुछ नया रचने' के संकुचित अर्थ से मुक्त कर 'अर्थ के नए आयाम उद्घाटित करने' के व्यापक संदर्भ में देखें, तो समालोचना का स्वरूप नितांत भिन्न हो जाता है।
समालोचक भी अनुवादक की तरह मूल लेखक में परकाया प्रवेश कर एक दार्शनिक और वैचारिक यात्रा करता है।
आलोचना केवल रचयिता की त्रुटियों का लेखा-जोखा या 'नीर क्षीर' विवेक करने वाली कोई दंडात्मक प्रक्रिया नहीं है। यह एक जटिल और रचनात्मक अनुशासित प्रक्रिया है। एक आलोचक के लिए केवल प्रखर बुद्धि या भाषाई सामर्थ्य ही पर्याप्त नहीं है, उसे गूढ़ गंभीर साहित्यिक दृष्टि, प्रभूत ज्ञान, तार्किक क्षमता और उच्च स्तरीय संवेदनशीलता का धनी होना पड़ता है।
जब कोई आलोचक किसी कृति का विश्लेषण करता है, तो वह केवल शब्दार्थ नहीं करता, बल्कि वह उस कृति के पीछे के मनोविज्ञान, तत्कालीन परिवेश, निहित सिद्धांतों और अपनी पांडित्यपूर्ण अंतर्दृष्टि के माध्यम से उस कृति को एक नई दृष्टि प्रदान करता है। यहाँ आलोचक का कार्य एक 'व्याख्याता' से ऊपर उठकर एक 'सह-स्रष्टा' का हो जाता है। वह मूल रचना के अंतर्निहित भावों को अपनी विवेचना से उन ऊँचाइयों पर ले जाता है जहाँ तक शायद सामान्य पाठक की दृष्टि न पहुँच सके। अतः, आलोचना, सृजन का प्रति सृजन (Re-creation) है।
साहित्य के क्षेत्र में अक्सर यह विवाद उठता है कि क्या आलोचक का मत अंतिम होता है? इस संदर्भ में आचार्य नंददुलारे वाजपेयी का मंतव्य आज भी प्रासंगिक और वैचारिक रूप से प्रबुद्ध है। उन्होंने स्पष्ट किया था कि
"आलोचक हंस नहीं है। नीर-क्षीर की तरह सत्य-असत्य पर दिया हुआ उसका निर्णय ही अंतिम निर्णय नहीं हो सकता।"
यह कथन एक आलोचक की विनम्रता और उसके कार्य की सीमा को किसी हद में निर्धारित करता है। आलोचना का उद्देश्य किसी कृति पर 'अंतिम मोहर' लगाना नहीं, बल्कि समालोचना के पाठकों तथा मूल रचना के बीच एक 'संवाद' स्थापित करना है। साहित्य का प्रवाह निरंतर होता है। जैसे-जैसे समय बदलता है, समाज की दृष्टि बदलती है, और उसी के साथ एक ही कृति के नए अर्थ निकलकर सामने आते हैं। आलोचक का काम उस अर्थ की यात्रा को दिशा देना है, उसे किसी एक बिंदु पर स्थिर कर देना नहीं होता ।
भगवत गीता, रामायण , मानस, भागवत जैसे अमर ग्रन्थ इसीलिए अमर हैं, क्योंकि उन पर लगातार जाने कितने ही विद्वान सतत युग परिवर्तन के अनुरूप इन महान ग्रंथों की समालोचनाएं करते हुए इनके कथ्य और संस्कृति के संवाहक बने हुए हैं। गंभीरता से विचार करें, तो सृजन और आलोचना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक रचनाकार जब लिखता है, तो वह अनजाने में ही अपनी ही आलोचना भी रच रहा होता है । वह शब्दों का चयन करता है, काटता है, सँवारता है। दूसरी ओर, एक अच्छा आलोचक जब किसी कृति को परखता है, तो वह उस कृति की आत्मा को पुनः प्रतिष्ठित करता है।
आलोचना का 'सृजन' होना इस बात में निहित है कि वह पाठक और कृति के बीच एक सेतु बनाती है। वह साहित्य के सिद्धांतों, दर्शन और समाजशास्त्र के उपकरणों से सुसज्जित होकर रचना को व्यापक फलक प्रदान करती है। वह स्वयं एक साहित्यिक विधा के रूप में 'ललित' और 'गंभीर' दोनों है।
"आलोचना" , यदि "समालोचक" हो तो उसे 'सृजन' मानने में संकोच का अर्थ साहित्य को संकुचित दृष्टि से देखना है।
समालोचना न केवल साहित्य की सुरक्षा करती है, अपितु उसे नवाचार की ऊर्जा भी देती है। समालोचक वह दीपक है जो कृति के उन कोनों को प्रकाशित कर देता है जहाँ तक लेखक की स्वयं की दृष्टि नहीं पहुँच सकी थी, या जिसे पाठक उपेक्षित कर बैठे थे।
अंततः, हम यह कह सकते हैं कि आलोचना का कार्य अंतिम निर्णय सुनाना नहीं, बल्कि प्रश्नों की एक शोध श्रृंखला खड़ी करना है। और जहाँ प्रश्न होते हैं, वहीं जिज्ञासा होती है, और जहाँ जिज्ञासा है, वहीं सृजन की अनंत संभावनाएं निहित हैं। समालोचना, इस अर्थ में, एक सतत चलने वाली सृजनात्मक प्रक्रिया है जो साहित्य को जड़ होने से बचाती है।
आलोचक को यदि उसकी विवेचना को सृजन के समानांतर बनाना है तो उसे लेखक की चाटुकारिता एवं रचना के प्रति पूर्वाग्रह , से बचना चाहिए। उसे स्वयं विषय का विद्वान बनना चाहिए, उसे लेखकीय काया प्रवेश का गुण धर्म आना चाहिए, तभी वह ऐसी समालोचना कर सकता है, जिसे विधा के स्वरूप में मान्यता है।
- विवेक रंजन श्रीवास्तव
लंदन
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