लघु कथा :
मरू की बेटी
रेत के टीले पर बैठी वह बाट जोह रही है प्रिय के आने की। आज ही तड़के सुबह उसका साजन,उसी के हाथों बना झोले और कुशन कवर बेचने शहर निकला है। सूर्य
डूबते तक लौट आने को कह गया था।
प्रिय की राह देखते-देखते शाम हो गई, शाम रात में तब्दील हो गई।अंधेरा गहराते गया।वो नहीं आया।प्रतीक्षा में उसकी आँखे थक गई। पलक झपकने लगी। कब उसकी आंखे लग गई उसे खुद पता नहीं लगा और नीँद के आगोश में वह समर्पित हो गई।
दूसरे सुबह भी वह बाट जोहती रही। धूप, उड़ता हुआ रेत कोई भी उसे प्रतीक्षा करने से रोक न सका। बोतल का पानी खत्म हो गया और रोटियां भी सूख चली। लेकिन बावली वह समझ पायी कि परदेश से आने में कई दिन और हफ्ते भी लग सकते हैं। भूखे-प्यासे कई दिनों तक बैठी वह प्रिय आगमन का राह
देखती रही। भूख -प्यास उसकी कहाँ चली गई थी पता नहीं। पेट समतल हो चला, आँखे धंस गईं वह अपने दिल को मना नहीं पाई कि सजन उसका अरसे बाद आएगा।
न समय को, न ही प्रकृति पर दया आई जो उस पर कुछ रहम करता। कड़कती धूप, अचानक से आयी आंधी और रेतों के उड़ते गुबार ने उसे अपने अंदर समा लिया। उसे ऐसे ढका जैसे कोई ताबूत हो और उसके अंदर वह। फ़िर उसका अस्तित्व ही खत्म हो गया। रेतों के गुबार ने पुनः एक टीला तैयार कर दिया।
भटकता प्रिय अपनी प्रेयसी को खोजते-खोजते इधर उधर भटकने लगा। पागल बना फिरता रहा। तभी उसे उसी टीले पर से थोड़ी सी रेत के हट जाने से लाल चुनरी का एक कोना उसे दिख गया। तत्काल उसने टीले के रेतों को हटाना शुरू किया। जहाँ उसकी प्राणप्रिय किसी और दुनिया के लिए प्रस्थान कर चुकी थी।
- डॉ मंजू लता , नोयेडा
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कथा कहानी
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