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सावन, शिव- समर्पण व भक्ति - अभिलाषा श्रीवास्तव , गोरखपुर



सावन, शिव- समर्पण व भक्ति

        धार्मिक होना और भगवान् के प्रति पूरी तरह समर्पित होना—दोनों बिल्कुल अलग-अलग तत्व हैं। मंदिरों में केवल माथा टेकने, हाजिरी लगाने या घर के मंदिर में नित्य पूजा कर लेने मात्र से कोई धार्मिक नहीं हो जाता। यदि भगवान के प्रति खुद को कभी अर्पित किया ही नहीं, तो केदारनाथ, काशी विश्वनाथ या अन्य तीर्थस्थलों की यात्राएं केवल यात्राएं यानी पर्यटन बनकर रह जाती हैं, इन्हें सच्ची धार्मिकता नहीं कहा जा सकता। एक बार इस पर गहराई से सोचने की आवश्यकता है!
खैर, सावन का पवित्र महीना चल रहा है, जिसे भगवान शिव का प्रिय माह माना जाता है। कहते हैं बाबा बहुत भोले हैं, वे थोड़ी सी भक्ति से ही प्रसन्न हो जाते हैं, क्योंकि शिव सा दानी और शिव सा गृहस्थ इस पूरी सृष्टि में दूसरा कोई नहीं है।
बाबा को प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र, गंगाजल और सबसे खास—'भाव के पुष्प' चाहिए होते हैं, जो शिव को अत्यंत प्रिय हैं। तभी तो देव, असुर, मानव और भूत-प्रेत तक—सभी उनकी कृपा दृष्टि पाने के लिए आतुर रहते हैं।
मन का एक गहरा सवाल
परंतु इन सबके बीच मेरे मन में अक्सर एक सवाल आता है:
"हम भगवान् से हमेशा कुछ न कुछ मांगते तो है,लेकिन हमने भगवान् के प्रति किया क्या है?? क्या हमने कभी इस बारें में सोचा है?? "
 
लोग कहते हैं कि धर्म का पहला कदम कर्म और दया है, जो मानव मात्र के मन में भगवान रूपी आत्मा को प्रकाशित कर जीवन का मार्गदर्शक बनता है। लेकिन आज वही दया से भरा हृदय स्वार्थ के कवच में कैद होकर समाज को पतन की ओर ले जा रहा है।
इस 'हाय-तौबा' और दिखावे की अंधी दौड़ में राम-भरत के प्रेम का वह पावन उदाहरण कहीं खो सा गया है। दूसरी ओर, माता सीता का महान त्याग और उर्मिला की मौन तपस्या केवल यादों की पुस्तिका बनकर रह गई हैं। कृष्ण और सुदामा जैसी निःस्वार्थ मित्रता तो दूर की बात, आज के रिश्ते केवल इंसान की हैसियत देखकर निभाए जाते हैं।
विचारों का प्रदूषण और बेलपत्र का रहस्य
अक्सर लोग कहते हैं कि गंगा जल दूषित हो गया है, लेकिन किसी को अपने विचारों का दूषित होना दिखाई नहीं देता। हम सावन और शिव को तो जानते हैं, लेकिन बेलपत्र की तीन पत्तियों का रहस्य कभी जानने की कोशिश नहीं की और न ही कभी उसे अपने जीवन में उतारने की सोची।
हम खुद को एक वस्तु की तरह बाजार में परोस रहे हैं और धार्मिकता का आवरण (कवर) ओढ़कर दुनिया के सामने खुद को पेश कर रहे हैं।
किंतु, शिव तो साक्षात आत्मा हैं, परम ज्योति हैं। उनसे भला क्या छिपा है? जो लोग मैला मन लेकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने पहुँच जाते हैं, वे इस सत्य को नहीं जानते कि शिव से कुछ भी छिपाया नहीं जा सकता ।
जब बात शिव की आती है, तो बेलपत्र केवल एक पत्ता नहीं, बल्कि शिव की अखंडता, अटूट विश्वास और प्रेम का जीवंत प्रतीक है।
  पहला पत्ता: 
हमारी श्रद्धा और अटूट विश्वास को दर्शाता है।
  दूसरा पत्ता:
 महादेव के प्रति हमारे सच्चे समर्पण का प्रतीक है।
  तीसरा पत्ता: 
शिव के साथ हमारे अनंत प्रेम की बयार है।
जिस प्रकार बेलपत्र की तीनों पत्तियाँ मिलकर एक डंठल से जुड़ी रहकर अखंड रहती हैं, ठीक उसी तरह हमारा मन, वचन और कर्म भी जब शिव के प्रति पूर्णतः समर्पित हो जाता है, तभी असली भक्ति जन्म लेती है।
आइए, इस सावन केवल मंदिरों में हाजिरी न लगाएं, बल्कि अपने भीतर झांककर देखें। अपने मैल को धोकर, विचारों को पवित्र बनाकर, उस भोले भंडारी को अपने निष्कलंक भाव के पुष्प अर्पित करें—क्योंकि बाबा को दिखावा नहीं, केवल आपका सच्चा और निर्मल प्रेम चाहिए।

अभिलाषा श्रीवास्तव , गोरखपुर
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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