स्मृति संस्मरण :
नर्मदा फिर मंडला के दरवाजे पर
- विवेक रंजन श्रीवास्तव , लंदन से
मंडला का नाम लेते ही मेरे मन में सबसे पहले मां नर्मदा की स्मृति आती है। इस शहर को नर्मदा ने जैसे अपनी बांहों में ले रखा है। नदी यहां तीन ओर से अंग्रेजी के ‘यू’ अक्षर की तरह मंडला को घेरती हुई बहती है। इसलिए मंडला को केवल एक शहर कहना शायद उसके भूगोल और उसके स्वभाव, दोनों के साथ न्याय नहीं होगा। यहां नर्मदा जीवन का हिस्सा नहीं, जीवन की धड़कन है। जीवन रेखा है। हमारा पुश्तैनी घर "महलात" यही नर्मदा जी वार्ड में था।
इन दिनों जब नर्मदा फिर उफान पर है और वहां से सुदूर लंदन में बैठे , मैंने बाढ़ के दृश्य तो टी वी पर देखे तो , बचपन चित्रवत याद हो आया ।
मंडला की सड़कों तथा निचले इलाकों में नर्मदा का पानी पहुंच गया है, मेरी स्मृतियां लगभग एक सदी पीछे की घटनाओं में लौट जाती हैं, सन 1926 में ।
मंडला में हमारा पुश्तैनी घर ‘महलात’ कहलाता है। वह आसपास के सामान्य घरों से लगभग एक मंजिल ऊंचे मिट्टी के टीले पर बना है। आज उस ऊंचाई को देखकर लगता है कि हमारे पूर्वजों ने शायद नर्मदा के स्वभाव को हमसे बेहतर समझा था।
नदी के किनारे रहने वाले लोग नदी को केवल देखते नहीं थे, उसके मिजाज को पढ़ते भी हैं।
सन 1926 में मंडला में नर्मदा की भयंकर बाढ़ आई थी। उसी वर्ष मेरे पिताजी का जन्म हुआ था। मेरे बचपन में मेरी दादी (स्व श्रीमती सरस्वती देवी )उस बाढ़ की कहानी सुनाया करती थीं। उनके लिए 1926 कोई पुरानी तारीख मात्र नहीं थी, बल्कि परिवार की स्मृति में जीवित एक घटना थी।
वह बाढ़ इतनी विकराल थी कि चारों ओर पानी फैल गया था। बहुत से लोग अपने घरों में फंस गए थे। तब महलात का ऊंचा टीला उनके लिए आश्रय बन गया। दादी बताया करती थीं कि आसपास के घरों की दीवारें तोड़कर ( खासकर असगर वकील साहब का घर , जिसमें उनके पार्टिशन के दौरान पाकिस्तान चले जाने के बाद अब जसवानी परिवार रहता है )रास्ते बनाए गए, ताकि पानी से घिरे लोगों को हमारे महलात तक सुरक्षित लाया जा सके। जहां कोई हाथ मदद के लिए उठा, उसे थाम लिया गया।
मैं कल्पना करता हूं कि उस समय हमारा घर केवल हमारा घर नहीं रहा । वह संकट में घिरे लोगों का उनका घर बन गया था।
दादी बताती थीं कि हजारों लोगों ने वहां शरण ली थी। पानी कब उतरेगा, इसका किसी को पता नहीं था। हमारे पूर्वजों ने उनके भोजन और रहने की व्यवस्था की। नर्मदा का पानी धीरे-धीरे उतरता रहा और महलात का टीला उन दिनों न जाने कितने परिवारों के लिए जीवन का सहारा बना रहा।
हमारे पास उस समय के अंग्रेज डिप्टी कमिश्नर द्वारा दी गई सनद भी सुरक्षित है। वह पुराना कागज मेरे लिए किसी सरकारी दस्तावेज से अधिक है। उसमें एक बीते समय की छाया है और उस छाया में उन लोगों की कहानी भी, जिन्होंने विपत्ति के समय अपने घर की सीमाएं दूसरों के लिए खोल दी थीं।
आज जब हम बाढ़ को जलस्तर, खतरे के निशान और सरकारी चेतावनियों के आंकड़ों में समझते हैं, तब उस समय की कल्पना करना कठिन लगता है। न मोबाइल था, न मौसम की तत्काल सूचना, न आधुनिक बचाव दल। फिर भी लोगों के पास एक ऐसी व्यवस्था थी जिसे किसी सरकारी पुस्तिका में दर्ज नहीं किया जा सकता , एक-दूसरे के लिए खुला हुआ मन और घर।
इतिहास के दस्तावेज बताते हैं कि 1926 नर्मदा की बड़ी ऐतिहासिक बाढ़ों में थी। मंडला के उपलब्ध आधिकारिक जलस्तर अभिलेखों में उसके बाद 1974 का बाढ़ स्तर सर्वाधिक दर्ज है।मेरे लिए 1926 का महत्व किसी आंकड़े से तय नहीं होता। वह मेरे परिवार की स्मृति में उस बाढ़ का वर्ष है, जब महलात ने अपने दरवाजे हजारों लोगों के लिए खोल दिए थे। मेरे स्व पिताजी प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध जो वरिष्ठ साहित्यकार के रूप में विख्यात हुए ,का जन्म उसी दौरान हुआ था।
यही स्मृति आज की बाढ़ को देखते हुए और गहरी हो जाती है।
लगभग सौ वर्ष बाद नर्मदा फिर उसी शहर में अपने रौद्र रूप में है। घाटों और निचले इलाकों में पानी पहुंच रहा है। कुछ परिवारों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। प्रशासन और बचाव दल सतर्क हैं। नदी फिर अपने पुराने अधिकार का स्मरण करा रही है।
समय बदल गया है। घर बदल गए हैं। बचाव के साधन बदल गए हैं। नदी को मापने के हमारे तरीके बदल गए हैं। लेकिन नदी का स्वभाव नहीं बदला।
और शायद मनुष्य की असली परीक्षा भी नहीं बदली।
बाढ़ जब आती है तो वह यह नहीं पूछती कि किसका घर कितना बड़ा है। कौन हिंदू है और कौन मुसलमान है, पानी सब दीवारों को एक ही भाषा में पढ़ता है। ऐसे समय में किसी ऊंचे घर की उपयोगिता उसकी ऊंचाई में नहीं, उसके खुले दरवाजे में होती है।
महलात का वह टीला आज भी है। उसके आसपास बहुत कुछ बदल गया है, लेकिन उसकी मिट्टी में जैसे 1926 की स्मृति अब भी बसी हुई है। मुझे लगता है, उस मिट्टी ने केवल पानी नहीं देखा होगा , उसने भय देखा होगा, प्रतीक्षा देखी होगी, लोगों को एक-दूसरे का सहारा बनते देखा होगा।
इतिहास हमें बताता है कि बाढ़ कितनी ऊंची थी। स्मृति बताती है कि उस बाढ़ में कितने हाथ एक-दूसरे को थामे हुए थे।
इसीलिए आज जब नर्मदा फिर मंडला के दरवाजे तक आई है, मेरी आंखों के सामने महलात का वही ऊंचा टीला उभर आता है। दादी की आवाज जैसे फिर सुनाई देती है , पानी बढ़ रहा था, लोग आते जा रहे थे, दीवारें तोड़ी जा रही थीं और महलात सबके लिए खुला था।
नर्मदा जीवनरेखा है। कभी वह जीवन देती है, कभी जीवन की नश्वरता का बोध कराती है। मंडला ने उसके दोनों रूप देखे हैं।
और महलात ने भी।
शायद किसी घर की सबसे बड़ी विरासत उसकी दीवारें नहीं होतीं। उसकी असली विरासत वह स्मृति होती है कि किसी कठिन समय में उसके दरवाजे कितने लोगों के लिए खुले थे।
मुझे लगता है, महलात आज भी उसी ऊंचाई पर खड़ा होकर नदी को देख रहा है, जैसे एक बूढ़ा घर अपनी पुरानी नदी से कह रहा हो, तुम्हें अपना स्वभाव याद है, मुझे अपना।
--विवेक रंजन श्रीवास्तव
इन दिनों लंदन से
Tags:
विविध
.jpg)