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अगस्त क्रांति : जनशक्ति का महाआंदोलन - मधूलिका श्रीवास्तव , भोपाल



अगस्त क्रांति : 
जनशक्ति का महाआंदोलन

     अगस्त क्रांति, को 'भारत छोड़ो आंदोलन' भी कहा जाता है, इसकी शुरुआत 8 अगस्त 1942 को मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान से महात्मा गाँधी के आवाहन पर  हुई थी।इस क्रांति के बाद ही इस मैदान का नाम अगस्त क्रांति मैदान पड़ गया।
इस क्रांति में बहुत से ऐतिहासिक कार्य हुए। महात्मा गांधी ने आंदोलन का आह्वान करते हुए "करो या मरो" का नारा दिया।यह केवल एक नारा नहीं था, बल्कि स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए अंतिम और निर्णायक संघर्ष का उद्घोष था।
डॉ. राम मनोहर लोहिया और उषा मेहता ने     “ब्रिटिश सेंसरशिप को चुनौती देते हुए डॉ. राममनोहर लोहिया और उषा मेहता के सहयोग से 27 अगस्त 1942 को गुप्त ‘कांग्रेस रेडियो’ का पहला प्रसारण हुआ।” इसका प्रसारण
"यह 42.34 मीटर पर भारत में कहीं से कांग्रेस रेडियो है" वाक्य से शुरू होता था।
9 अगस्त की सुबह होते-होते महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार वल्लभभाई पटेल सहित लगभग सभी प्रमुख नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। अंग्रेज़ सरकार का उद्देश्य आंदोलन को आरंभ होने से पहले ही समाप्त कर देना था किंतु इसका परिणाम बिल्कुल उलटा हुआ। अरुणा आसिफ अली ने 9 अगस्त को ही मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान में तिरंगा फहराकर आंदोलन की कमान संभाल ली तथा नेताओं की अनुपस्थिति में जनता स्वयं भी आंदोलन की संचालक बन गई। गाँवों, कस्बों और नगरों में छात्रों, किसानों, मजदूरों, महिलाओं तथा युवाओं ने आंदोलन की कमान संभाल ली। रेल पटरियाँ उखाड़ी गईं, डाक-तार व्यवस्था बाधित की गई, सरकारी कार्यालयों के विरुद्ध प्रदर्शन हुए और अनेक स्थानों पर समानांतर जन-प्रशासन की स्थापना तक कर दी गई। यह पहली बार था जब स्वतंत्रता आंदोलन केवल नेताओं तक सीमित न रहकर एक व्यापक जनआंदोलन बन गया।इस आंदोलन में महिलाओं ने भी बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। असंख्य महिलाओं ने जेल यात्राएँ कीं, सत्याग्रह किए और स्वतंत्रता संग्राम को नई शक्ति प्रदान की। ब्रिटिश सरकार के आदेश पर प्रदर्शनकारियों पर पुलिस ने बेरहमी से लाठियां और गोलियां चलाईं।कुछ जगहों पर भीड़ को तितर-बितर करने के लिए हवाई जहाजों से मशीन गनों से गोलियाँ चलाई गईं।करीब 1 लाख से अधिक लोगों को जेल में डाल दिया गया था। पर इस आंदोलन को रोकने में ब्रिटिश सरकार नाकामयाब रही।
इस आंदोलन के सफल होने में साहित्यकारों की भी अहम भूमिका रही है।क्योंकि यह
केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं था। बल्कि यह साहित्य, पत्रकारिता और संस्कृति का भी महाआंदोलन था। साहित्यकारों ने अपनी लेखनी को जनजागरण का माध्यम बनाया। उनकी कविताएँ, कहानियाँ और लेख जनता में स्वाधीनता की चेतना जगाते रहे।
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी रचनाओं के माध्यम से राष्ट्रीय स्वाभिमान, सांस्कृतिक गौरव और जनजागरण का संदेश दिया। रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की ओजस्वी कविता ने युवाओं में संघर्ष और आत्मसम्मान का भाव जगाया। सुभद्रा कुमारी चौहान की अमर कविता “झाँसी की रानी” यद्यपि 1857 की वीरांगना पर आधारित है, परंतु 1942 के आंदोलन के दिनों में भी यह कविता स्वतंत्रता सेनानियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी रही। माखनलाल चतुर्वेदी की “पुष्प की अभिलाषा” ने मातृभूमि के लिए समर्पण और बलिदान की भावना को जन-जन तक पहुँचाया।
मुंशी प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों और कहानियों में शोषण, अन्याय और दासता के विरुद्ध जनचेतना को स्वर दिया। उनके साहित्य ने स्वतंत्रता आंदोलन के नैतिक और सामाजिक आधार को सुदृढ़ किया। इस प्रकार साहित्य ने बंदूक नहीं उठाई, किंतु उसने ऐसे नागरिक अवश्य तैयार किए जिनके मन में स्वतंत्र भारत का स्वप्न धधकने लगा।
आज भी स्वतंत्रता आंदोलन का साहित्य हमें यह सिखाता है कि कलम समाज में उतना ही बड़ा परिवर्तन ला सकती है, जितना किसी जनांदोलन से संभव होता है।
इस संग्राम में हिंदी पत्रकारिता केवल समाचारों का माध्यम नहीं थी, बल्कि राष्ट्रीय चेतना की प्रबल वाहक थी। अंग्रेज़ी सरकार ने प्रेस पर कठोर प्रतिबंध लगा दिए, तब भी अनेक हिंदी समाचार-पत्रों और पत्रकारों ने जोखिम उठाकर जनभावनाओं को स्वर दिया। उनके लिए पत्रकारिता एक व्यवसाय नहीं, बल्कि राष्ट्रधर्म थी।
‘आज’ (वाराणसी), ‘प्रताप’ (कानपुर), ‘सैनिक’, ‘वीर अर्जुन’, ‘विश्वमित्र’ जैसे हिंदी समाचार-पत्र राष्ट्रीय विचारधारा के प्रमुख मंच बने। ब्रिटिश सरकार इन पत्रों पर निरंतर मुकदमे चलाती रही, भारी जुर्माने लगाए गए, प्रेस जब्त किए गए और कई बार उनका प्रकाशन बंद करा दिया गया। इसके बावजूद उनकी लेखनी कभी नहीं रुकी।

अंग्रेज़ी शासन भली-भाँति समझ चुका था कि यदि कलम को नहीं रोका गया, तो जनांदोलन को दबाना असंभव होगा। इसलिए प्रेस सेंसरशिप लागू की गई, किंतु पत्रकारों ने संकेतों, सांकेतिक भाषा और वैकल्पिक माध्यमों से जनता तक संदेश पहुँचाने का कार्य जारी रखा। वास्तव में, अगस्त क्रांति ने यह सिद्ध किया कि स्वतंत्रता की लड़ाई केवल मैदानों में ही नहीं, समाचार-पत्रों के संपादकीय कक्षों में भी लड़ी जा रही थी।

9 अगस्त 1942 के बाद अधिकांश राष्ट्रीय नेताओं की गिरफ्तारी के साथ ही ब्रिटिश सरकार ने समाचारों पर कड़ा नियंत्रण स्थापित कर दिया। सरकारी प्रचार के बीच सत्य जनता तक पहुँचाना अत्यंत कठिन हो गया। ऐसी परिस्थिति में भूमिगत समाचार-पत्रों, पर्चों और गुप्त रेडियो ने आंदोलन को जीवित रखा।
रातों-रात हस्तलिखित अथवा साइक्लोस्टाइल मशीनों से तैयार किए गए पर्चे गाँव-गाँव और शहर-शहर पहुँचाए जाते थे। इनमें गिरफ्तार नेताओं के संदेश, आंदोलनों की सूचनाएँ और जनता से संघर्ष जारी रखने का आह्वान होता था। स्वयंसेवक इन्हें गुप्त रूप से वितरित करते थे और पकड़े जाने पर कठोर दंड का सामना करते थे।
इस काल का सबसे उल्लेखनीय प्रयास था उषा मेहता द्वारा संचालित ‘कांग्रेस रेडियो’। 27 अगस्त 1942 से आरंभ हुए इस गुप्त रेडियो ने ब्रिटिश सेंसरशिप को चुनौती दी। इसके माध्यम से महात्मा गांधी और अन्य नेताओं के संदेश, आंदोलन की वास्तविक खबरें तथा देशभक्ति के उद्बोधन प्रसारित किए जाते थे। यह रेडियो लाखों भारतीयों के मन में स्वतंत्रता की नई ऊर्जा भर चुका था।
भूमिगत पत्रकारिता ने यह सिद्ध किया कि जब सत्ता सत्य को दबाने का प्रयास करती है, तब साहसी कलम और निर्भीक संवाद ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति बन जाते हैं।   

अगस्त क्रांति की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह थी कि कई स्थानों पर जनता ने अंग्रेज़ी प्रशासन को निष्क्रिय कर समानांतर सरकारों की स्थापना कर दी। उत्तर प्रदेश के बलिया में चित्तू पांडे के नेतृत्व में कुछ समय के लिए स्वतंत्र प्रशासन स्थापित हुआ। महाराष्ट्र के सतारा में ‘प्रति सरकार’ ने वर्षों तक भूमिगत रहकर प्रशासनिक कार्य संचालित किए, जबकि बंगाल के तामलुक (तम्रलिप्त राष्ट्रीय सरकार) ने न्याय, राहत और जनसेवा का कार्य संभाला। ये घटनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि अगस्त क्रांति केवल विरोध नहीं, बल्कि स्वशासन की चेतना का भी आंदोलन थी।

अगस्त क्रांति ने यह सिद्ध कर दिया कि जब कोई राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता के लिए एकजुट होकर उठ खड़ा होता है, तब किसी भी साम्राज्य की शक्ति उसके संकल्प के सामने टिक नहीं सकती। यह आंदोलन केवल राजनीतिक विद्रोह नहीं था, बल्कि जनशक्ति, साहित्य, पत्रकारिता और सांस्कृतिक चेतना के अभूतपूर्व समन्वय का प्रतीक था। आज, स्वतंत्र भारत में अगस्त क्रांति हमें यह स्मरण कराती है कि राष्ट्रनिर्माण केवल सत्ता परिवर्तन से नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों, निर्भीक पत्रकारिता और संवेदनशील साहित्य से संभव होता है। इसलिए अगस्त क्रांति का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है— अन्याय के विरुद्ध साहस, सत्य के प्रति निष्ठा और राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखने का संकल्प ।
 
 - मधूलिका श्रीवास्तव , भोपाल
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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