ad

' याद - ए - दुष्यन्त ' का आयोजन सम्पन्न



' याद - ए - दुष्यन्त ' का आयोजन सम्पन्न

भोपाल ।  दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय के राज सदन में याद -ए  - दुष्यन्त का आयोजन सम्पन्न हुआ। यह आयोजन दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय और मध्यावर्त द्वारा  संयुक्त रूप से आयोजित किया गया। इस आयोजन में दुष्यन्त कुमार के सुपुत्र श्री आलोक त्यागी विशेष रूप से उपस्थित थे।

इस अवसर पर दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय की निदेशक करुणा राजुरकर ने दुष्यन्त के  कई शेरो का उल्लेख करते हुए अपने स्वागत उद्बोधन में दुष्यन्त को याद किया।

कहां तो तय था चिरागां हर एक घर के लिए कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए

कहीं पे धूप की चादर बिछा के बैठ गए
 कहीं पे शाम सिरहाने  लगा के बैठ गए 

तुम्हारे पांव के नीचे कोई जमीन नहीं 
कमाल  ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं 

एक कबूतर चिट्ठी लेकर पहली - पहली बार उड़ा
 मौसम एक गुलेल लिया था पट से नीचे आन गिरा

आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख
घर अंधेरा देख तू आकाश के तारे न देख

दुष्यन्त के येअत्यंत चर्चित शेर हैं जिनका समय - समय पर देश के नेता ,अभिनेता और युवा वर्ग अपने विचारों को व्यक्त करने के लिये उल्लेख  करते हैं।

कार्यक्रम के प्रारंभ में भोपाल के प्रतिष्ठित रचनाकार सुरेश पटवा के ग़ज़ल संग्रह गलियारे में एक दीया का लोकार्पण मंचासीन कवियों आशू मिश्रा, अमन अक्षर, निवेश साहू, शिवाजी राय , मशगूल मेहरबानी और प्रशस्त विशाल  ने किया।इस लोकार्पण में संग्रहालय के अध्यक्ष रामराव वामनकर , आलोक त्यागी, अशोक निर्मल ,करुणा राजुरकर  भी उपस्थित थे। 

सुरेश पटवा ने इस मुशायरे का आगाज़ करते हुए पढ़ा।
तुम दुनिया में हो यह इत्मिनान रखना ,
दिल में ग़म हो होठों पर मुस्कान रखना।
ज़िंदगी की राह में धोखे मिलते हैं ,
मगर दिल में एक भला इंसान रखना।

इस अवसर पर बरेली से पधारे आशू मिश्रा, अमन अक्षर, निवेश साहू, शिवाजी राय, मशगूल, मेहर बानी और प्रशस्त विशाल ने रचना पाठ  किया।

प्रशस्त विशाल ने पढ़ा -
रात जब जप्त आजमाती  है
तेरी आवाज़ याद आती है

मशगूल मेहरबानी -
इस पार अकेले रह जाना 
उस पार अकेले रह जाना 
अपनी किस्मत में लिखा है
 हर बार अकेले रह जाना 

शिवाजी राय -
अवनतियों को उत्कर्ष नहीं कहते हम 
छूट-पुट झड़पों को संघर्ष नहीं कहते हम

निवेश साहू -
फटा पुराना ही पहना लिबास रिश्तों का 
कहीं से उधड़ी  सिलाई तो उधड़ने 
मिट्टी के ये कश्कोल जो अश्कों से धुले हैं
मुझ में कोई तूफान उठाने पर अड़े  हैं 

आशू मिश्रा -
किसको दीवार कहां जाए किसे दर कहिए
 कोई भी दिल नहीं ऐसा जिस घर कहिए 
सूखते पेड़ से पंछी का जुदा हो जाना 
बुतपरस्ती नहीं एहसान फरामोशी है 
मेरे अतराफ में मैं हूं या सुखन है मेरा 
ऐसी तन्हाई में जी लेता हूं फन है मेरा 

अमन अक्षर ने गीत पढ़ा -
पथ पूरे हो जाते हैं
बाधायें  रह जाती है
घनश्याम चले जाते हैं
राधायें यह जाती है

कार्यक्रम के अंत में आलोक त्यागी ने दुष्यन्त कुमार को याद करते हुए उनके संस्मरण सुनाये।

कार्यक्रम का संचालन डॉ विशाखा राजुरकर ने किया। दुष्यन्त के तेवर लिये इसआयोजन में  युवा रचनाकारों का रचना पाठ संग्रहालय की यात्रा का महत्वपूर्ण पड़ाव साबित हुआ।

इस अवसर पर वी के श्रीवास्तव ,बिहारी लाल सोनी अनुज, ममता त्यागी ,स्वर्णा तिवारी, रामराव वामनकर,अशोक निर्मल ,विभावरी राजुरकर और अनेक युवा श्रोता उपस्थित थे।

रिपोर्ट : करुणा राजुरकर 
निदेशक, दुष्यंत स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय 
भोपाल
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

Post a Comment

Previous Post Next Post