लघु कथा :
माँ की चुप्पी
“मम्मी, आपने कभी पापा से कहा नहीं कि आपको नौकरी छोड़ना अच्छा नहीं लगा?”
माँ ने चाय में चम्मच घुमाते हुए कहा - “उस समय हालात अलग थे।”
“लेकिन मन तो आपका भी करता होगा काम करने का?”
“करता था… पर घर था, बच्चे थे, जिम्मेदारियाँ थीं।”
बेटी ने पूछा - “तो आपने अपने लिए क्या चुना?”
माँ हल्का-सा हँसीं - “हमारे समय में हर चीज़ अपनी पसंद से थोड़े होती थी।”
“फिर भी, कभी लगा नहीं कि कुछ आपका भी रह जाना चाहिए था?”
माँ की उँगलियाँ कप के किनारे पर ठहर गईं।
“तुम लोग आजकल बहुत सवाल पूछते हो।”
“क्योंकि आपने हमें सवाल पूछना सिखाया है, मम्मी। पढ़ाया, कमाना सिखाया, अपने फैसले लेना सिखाया।”
माँ ने नज़रें झुका लीं।
कुछ देर बाद बोलीं - “हमने जो किया, घर के लिए किया।”
बेटी ने धीरे से पूछा -
“और जो आप अपने लिए करना चाहती थीं… उसका क्या हुआ?”
माँ चुप रहीं।
बेटी कुछ पल उन्हें देखती रही, फिर बोली -
“मम्मी… क्या आप कहना नहीं चाहती थीं, या कह नहीं सकती थीं?”
माँ ने कोई जवाब नहीं दिया।
टेबल पर चाय ठंडी होती रही।
- डॉ. रीटा अरोड़ा
सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर
करनाल
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कथा कहानी
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