चर्चित मुद्दा :
आरक्षण हटाओ आंदोलन डिजिटल लहर पर सवार हो सड़कों तक पहुंचा
- विजय प्रकाश पारीक
_स्तंभकार एवं चिंतक_
प्रस्तुति डॉ घनश्याम बटवाल मंदसौर
भारत के सामाजिक-राजनीतिक विमर्श में आरक्षण सदैव एक संवेदनशील और जटिल विषय रहा है।
जुलाई 2026 के अंतिम सप्ताह में यह विषय एक बार फिर तेज़ी से केंद्र में आ गया। नीट-यूजी पेपर लीक मामले को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर चले ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के छात्र आंदोलन और तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के तुरंत बाद, 22 जुलाई 2026 को सोशल मीडिया पर ‘रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन’ (आरएचए) का जन्म हुआ। बेहद कम समय में यह अभियान इंटरनेट की सीमाओं को पार कर कई शहरों की सड़कों तक पहुँच चुका है।
यह आंदोलन स्वयं को गैर-राजनीतिक और नागरिक-नेतृत्व वाला बताता है। इसके समर्थक जाति-आधारित आरक्षण को योग्यता के मार्ग में बाधा और सामाजिक विभाजन का कारण मानते हैं। उनका तर्क है कि गरीबी की कोई जाति नहीं होती, इसलिए आरक्षण का आधार केवल आर्थिक स्थिति होना चाहिए।
RHA आंदोलन की पाँच प्रमुख माँगें स्पष्ट हैं—जातिगत कोटे को समाप्त कर आय-आधारित आरक्षण लागू करना, एक परिवार को केवल एक पीढ़ी तक लाभ सीमित रखना, सभी वर्गों के लिए समान कट-ऑफ, फीस और आयु सीमा सुनिश्चित करना, खाली आरक्षित सीटों को सामान्य वर्ग में स्थानांतरित करना, तथा सरकारी दस्तावेज़ों से जाति का उल्लेख हटाना ताकि ‘एक राष्ट्र, एक पहचान’ का आदर्श साकार हो सके।
सोशल मीडिया पर इसकी पहुँच उल्लेखनीय रही है। आंदोलन के मुख्य इंस्टाग्राम हैंडल ने कुछ ही दिनों में लगभग साठ लाख फॉलोअर्स का आँकड़ा पार कर लिया। यह संख्या इसे हाल के वर्षों के सबसे तेज़ी से बढ़ने वाले डिजिटल अभियानों में शामिल करती है। परंतु यह केवल ऑनलाइन चर्चा तक सीमित नहीं रहा।
आर एस एस मुख्यालय नागपुर में ‘आरक्षण हटाओ जन जागृति रैली’ आयोजित हुई, जबकि जयपुर, लखनऊ और विशाखापत्तनम भोपाल इंदौर जैसे शहरों में भी युवाओं ने विरोध प्रदर्शन किए। करणी सेना जैसे कुछ संगठनों ने समर्थन जताया और आगामी चुनावों में भाजपा को वोट न देने की चेतावनी तक दी है।
जंतर-मंतर पर 21 अगस्त को बड़े प्रदर्शन की चर्चा भी सोशल मीडिया पर तेज़ है, हालाँकि इसकी अंतिम अनुमति और स्वरूप अभी स्पष्ट नहीं हुए हैं।
सरकार और राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया सतर्क रही है। केंद्रीय मंत्री रामदास अठावले ने इस नारे को असंवैधानिक करार देते हुए प्रधानमंत्री को पत्र लिखा और सोशल मीडिया खातों पर कार्रवाई की माँग की। वहीं कुछ भाजपा नेताओं ने क्रीमी लेयर को आरक्षण से बाहर रखने की बात दोहराई है। राजनीतिक दल इस मुद्दे पर फूंक-फूंककर कदम रख रहे हैं, क्योंकि आरक्षण भारत की संवैधानिक संरचना का अभिन्न अंग है।
आंदोलन के समर्थक योग्यता की रक्षा, क्रीमी लेयर के बार-बार लाभ उठाने और जातिगत दूरियों के बढ़ने की बात करते हैं। आलोचक और सामाजिक कार्यकर्ता इसके विपरीत तर्क देते हैं कि आरक्षण गरीबी हटाओ योजना नहीं, बल्कि सदियों की सामाजिक असमानता और छुआछूत के खिलाफ प्रतिनिधित्व का माध्यम है। वे कहते हैं कि ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में आज भी कई समुदाय मुख्यधारा से कटे हुए हैं, और संवैधानिक अधिकारों को केवल सोशल मीडिया ट्रेंड से नहीं बदला जा सकता।
कानूनी दृष्टि से आरक्षण व्यवस्था में बड़ा बदलाव अत्यंत जटिल है। इसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत के साथ संविधान संशोधन आवश्यक होगा, साथ ही आधे से अधिक राज्यों की विधानसभाओं की स्वीकृति भी। सुप्रीम कोर्ट ‘मूल संरचना’ के सिद्धांत के तहत इसकी न्यायिक समीक्षा कर सकता है।
यह RHA आंदोलन डिजिटल युग की उस शक्ति को दर्शाता है जिसमें युवा आकांक्षाएँ तेज़ी से संगठित हो सकती हैं। साथ ही यह याद दिलाता है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में किसी भी नीतिगत बदलाव के लिए संवैधानिक प्रक्रिया, सामाजिक संवेदनशीलता और लंबे संवाद की आवश्यकता होती है। आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि यह डिजिटल लहर सड़कों पर कितना ठोस रूप लेती है और राजनीतिक दलों के समीकरणों को किस हद तक प्रभावित करती है। आरक्षण का प्रश्न केवल संख्याओं या नारों का नहीं, बल्कि समानता, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय के गहरे संतुलन का है—एक ऐसा संतुलन जो सहजता से नहीं, बल्कि विचार और विवेक से ही संभव हो सकता है।
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