काव्य :
पहली बारिश
पहली वारिश, कि
रिमझिम फुहार में
बिखर रही मिट्टी ,से
सौंधी सी गंध
मानो,
स्नेह बरस रहा हो मेघो से,और
झुक गई डालियाँ, फूलो के संग
बसंत आ गया पेड़ो पर
गुलाब की पंखुड़ियो से,
टप-टप करती टपकती,बूंदे
मानो,
गा रही है ,मधुर छंद
कोयल की कूंक से गूंजता
संपूर्ण बातावरण
फिजां को,
तरबतर कर गया
प्रकृति का प्यारा स्पंदन .
पहली बारिश....मधुर छंद .
- देवेन्द्र थापक गुलमोहर भोपाल
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