लघुकथा :
बुजुर्ग और भगवान
शीला ने दो जुड़वां बेटों को जन्म दिया, जिनके नाम अभिषेक और अनुराग रखे गए। समय के साथ दोनों बड़े हुए और दोनों की एक ही दिन शादी कर दी गई। दोनों बहुएं मिलजुलकर रहने लगीं। पर कुछ समय पश्चात शीला ने दोनों को प्यार रहते ही अलग - अलग कर देना ठीक समझा। अभिषेक और उसकी पत्नी रेणु आगे वाले हिस्से में और अनुराग तथा उसकी पत्नी पूनम घर के पिछले हिस्से में रहने लगे। शीला का जब जो मन करता, वह खाती; जिससे जो काम करवाना होता, करवाती और अपने कमरे में बैठी भगवान का नाम लेती रहती थी।
रेणु जो भी खाने के लिए बनाती, सबसे पहले अपनी सास शीला के पास लाती और कहती, "पहले आप खाइए।" वहीं, पूनम पहले भगवान को भोग लगाती, फिर सास और सबको खाने को देती थी। ऐसे ही, जब भी किसी मौके या त्योहार पर कुछ दान-पुण्य करना होता, तो रेणु सब कुछ सास के पास रखकर कहती, "मम्मी, ये सब आप बांटिए।" इसके विपरीत, पूनम या तो खुद दान करती या अपने पति और बच्चों से बंटवाती थी।
समय के साथ शीला का निधन हो गया। कुछ समय बाद रेणु और पूनम की भी एक ही दिन मृत्यु हो गई और दोनों यमराज के पास पहुंच गईं।
यमराज ने अपने दूतों से कहा, "रेणु को दस साल के लिए स्वर्ग में भेज दो और पूनम को पहले पांच साल के लिए नरक में, फिर पांच साल के लिए स्वर्ग में भेजना।"
यह सुनकर पूनम एकदम चिल्लाई, "महाराज! यह कैसा न्याय है? रेणु को स्वर्ग और मुझे पहले नरक? मैंने तो इससे कहीं अधिक दान-पुण्य किया है! मैं तो हमेशा पहले भगवान को भोग लगाकर ही कुछ खाती-पीती थी, जबकि रेणु ने तो कभी भगवान को भोग भी नहीं लगाया।"
यमराज हंसे और बोले, "रेणु ने जो भी दान-पुण्य किया, वह अपनी सास के हाथों करवाया और खुद पुण्य लेने का कोई लालच नहीं रखा। उस दान का पुण्य तो रेणु को मिला ही, साथ ही घर के बुजुर्गों को मान देकर उनकी आत्मा को प्रसन्न करने का पुण्य भी मिला। जहां तक खाने को भगवान को भोग लगाने की बात है, तो रेणु सबसे पहले अपनी सास को खिलाती थी और इस घर के जीवित बुजुर्ग ही उसके लिए भगवान थे। वे दुआएं भी रेणु को दिल से मिलीं। अब फैसला तुम खुद ही कर लो।"
यह सुनकर पूनम के पास सिवाय पछतावे के कुछ नहीं बचा था।
- डॉ अंजना गर्ग (सेवानिवृत्त)
म द वि रोहतक
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कथा कहानी
