लघुकथा :
मन की बात
“कभी-कभी लगता है, शादी में सबसे ज्यादा झगड़ा किस बात पर होता है?”
“पैसों पर?”
“नहीं।”
“फिर?”
“इस पर कि ‘उसे खुद समझना चाहिए।’”
मीना मुस्कराई।
“यानी उम्मीदें।”
“हाँ। पत्नी सोचती है-पति बिना कहे समझे।”
“पति सोचता है-कहेगी तो कर दूँगा।”
“और दोनों चुप।”
“फिर शिकायतें बोलती हैं।”
सविता हँस पड़ी।
“मैंने इतना किया… उसने देखा तक नहीं।”
“और वह शायद सोच रहा हो-‘मुझसे कहा ही क्या था?’”
“तो क्या रिश्ते में उम्मीदें नहीं होनी चाहिए?”
“क्यों नहीं? लेकिन उम्मीद को परीक्षा मत बनाओ।”
“मतलब?”
“समय चाहिए तो कहो। मदद चाहिए तो माँगो। मन दुखा है तो बताओ।”
सविता ने कुछ सोचकर कहा,
“लेकिन हर छोटी बात भी तो कहनी पड़े?”
“नहीं। प्यार में समझ होती है।”
“और सीमा?”
“वह भी होती है।”
दोनों कुछ देर शांत रहीं।
सविता ने धीरे से कहा,
“शायद हम सामने वाले से उसकी तरह प्यार पाने की उम्मीद करते हैं, जैसे हम प्यार करते हैं।”
मीना ने उसकी ओर देखा।
“और यहीं गलती हो जाती है।”
“तो समाधान?”
मीना हल्का-सा मुस्कराई।
“पहले अपनी जरूरत पहचानो…”
“फिर?”
“फिर सामने वाले से पूछो- वह क्या दे सकता है।”
सविता ने सिर झुका लिया।
बात वहीं रुक गई।
शायद दोनों के मन में कोई अपना रिश्ता था-
*जिसमें कुछ कहा जाना बाकी था।*
- डॉ रीटा अरोड़ा , करनाल
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कथा कहानी
