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दीनदयाल उपाध्याय के साहित्य में राष्ट्र और समाज - डाॅ०राकेश सक्सेना , एटा


दीनदयाल उपाध्याय के साहित्य में 
राष्ट्र और समाज

   - डाॅ०राकेश सक्सेना , एटा

       पण्डित दीनदयाल उपाध्याय  आधुनिक भारत के उन प्रमुख चिंतकों में थे, जिन्होंने राष्ट्र, समाज, व्यक्ति, संस्कृति, अर्थ-व्यवस्था और राजनीति  को एक-दूसरे से पृथक करके देखने के स्थान पर एक समग्र जीवन दृष्टि के भीतर समझने का प्रयास किया। उनके साहित्य में राष्ट्र केवल भौगोलिक सीमा अथवा राजनीतिक राज्य की संज्ञा नहीं है बल्कि साझा सांस्कृतिक चेतना, ऐतिहासिक अनुभव, सामाजिक सम्बन्ध और राष्ट्रीय आत्मबोध से निर्मित जीवंत सत्ता है। इसी प्रकार समाज उनके लिए व्यक्तियों का यांत्रिक समूह नहीं अपितु परस्पर पूरक सम्बन्धों से निर्मित सावयव व्यवस्था है। उनके प्रमुख ग्रंथों-- राष्ट्र जीवन की समस्याएँ, राष्ट्र जीवन की दिशा, राष्ट्र चिंतन, भारतीय अर्थनीति: विकास की एक दिशा, एकात्म मानववाद, सम्राट चन्द्रगुप्त और जगतगुरू शंकराचार्य जैसे साहित्यिक-ऐतिहासिक लेखन में राष्ट्र और समाज सम्बन्धी चिंतन विविध रूपों में अभिव्यक्त हुआ है। उनकी लेखकीय विशेषता यह है कि वे किसी प्रश्न को केवल राजनीतिक दृष्टि से नहीं देखते। आर्थिक नीति के पीछे सामाजिक संरचना, सामाजिक समस्या के पीछे सांस्कृतिक दृष्टि और राजनीतिक व्यवस्था के पीछे मनुष्य की जीवन-दृष्टि को तलाशना उनके चिंतन की विशेषता है।
     दीनदयाल उपाध्याय के राष्ट्र-विचार का केन्द्रीय आधार राष्ट्रीय आत्मबोध है। उनके अनुसार राष्ट्र की संकल्पना केवल भूमि और जनसंख्या के योग से निर्मित नहीं होती। भूमि के प्रति मातृभाव, साझा सांस्कृतिक चेतना और ऐतिहासिक निरंतरता राष्ट्र की अवधारणा को गहराई प्रदान करते हैं। उनके विचार संग्रह में राष्ट्र की आत्मा को ' चिति ' से जोड़ते हुए समाज को एक जीवमान सावयव सत्ता के रूप में देखा गया है। उनकी अवधारणा के अनुसार स्वतंत्रता तभी सार्थक होती है जब राष्ट्र अपनी राष्ट्रीय पहचान के आधार पर अपने विकास की दिशा निर्धारित करे। उपाध्याय जी के राष्ट्र विचारों को संस्कृति दृष्टि से अलग करके नहीं समझा जा सकता। उनके लिए संस्कृति राष्ट्र के जीवन की आधारभूत चेतना है। संस्कृति और राष्ट्र उनके साहित्य में एक-दूसरे के पूरक दिखाई देते हैं। आपके चिंतन की सबसे प्रमुख अवधारणा एकात्म मानववाद है। सन् 1965 ई० में उनके द्वारा दिए गए चार व्याख्यानों में इसका व्यवस्थित प्रतिपादन हुआ। एकात्म मानववाद में व्यक्ति को केवल आर्थिक प्राणी मानने के स्थान पर उसके शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक पक्षों को समग्रता में देखने का आग्रह मिलता है। इस दर्शन की महत्वपूर्ण विशेषता व्यक्ति और समाज के बीच सम्बन्ध की व्याख्या है। व्यक्ति और समाज से अलग कोई पूर्ण स्वतंत्र इकाई नहीं है, वह परिवार, समाज,राष्ट्र और व्यापक सृष्टि से जुड़ा हुआ है।
     आधुनिक सामाजिक चिंतन में व्यक्ति और समाज के अधिकारों तथा हितों के बीच तनाव का प्रश्न प्रमुख रहा है। उपाध्याय जी इस सम्बन्ध को मूलत: संघर्ष के बजाय पूरकता के रूप में रखते हैं। उनकी दृष्टि में परिवार सामाजिक जीवन की प्रारम्भिक इकाई है। परिवार से समाज और समाज से राष्ट्र की व्यापक संरचना विकसित होती है, इसलिए व्यक्ति के विकास को समाज से काटकर देखना उनके लिए अधूरा दृष्टिकोण है। आपके सामाजिक चिंतन में समरसता का विशेष स्थान है। इनका आदर्श ऐसा समाज है जिसमें विभिन्न सामाजिक इकाइयाँ संघर्ष के बजाय परस्पर सहयोग और पूरकता के आधार पर कार्य करे। इसके साथ ही साथ उपाध्याय जी के सामाजिक चिंतन का एक महत्वपूर्ण पक्ष समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास के लाभ पहुँचाने की चिंता भी है, जिसमें अंत्योदय की अवधारणा विकसित होती है। वे राष्ट्र और राज्य को समानार्थी नहीं मानते। उनके चिंतन में राष्ट्र एक व्यापक सांस्कृतिक सामाजिक सत्ता है,जबकि राज्य उसकी राजनीतिक व्यवस्था का एक अंग है। इस भेद का महत्व इसलिए है कि राज्य की भूमिका बदल सकती है और राजनीतिक दलों का स्वरूप भी बदल सकता है किन्तु राष्ट्र की सांस्कृतिक निरंतरता उससे कहीं अधिक दीर्घकालिक प्रक्रिया है।
    आज राष्ट्र और समाज अनेक प्रकार के परिवर्तन से गुजर रहे हैं। तकनीकी विकास,वैश्वीकरण,तीव्र नगरीकरण, आर्थिक असमानता, सामाजिक विभाजन, पर्यावरणीय संकट और बदलते पारिवारिक सम्बन्धों ने राष्ट्र और समाज की पारम्परिक अवधारणाओं को नई चुनौतियाँ दी हैं, ऐसे समय में दीनदयाल उपाध्याय के साहित्य का अध्ययन कई प्रश्नों को समझने का अवसर देता है कि विकास का अंतिम उद्देश्य क्या हो? व्यक्ति और समाज का राष्ट्रीय एकता के साथ सामाजिक विविधता का संतुलन कैसे बनाया जाए? आपके साहित्य का सम्यक अध्ययन भारतीय राष्ट्रवाद, सामाजिक दर्शन और आधुनिक भारतीय चिंतन के अंतर्संबंधों को समझने में  उपयोगी आधार प्रदान करता है।
                     
- डाॅ०राकेश सक्सेना, 
पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 
68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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