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कृष्ण भक्त कवि जाति धर्म से परे केवल प्रेम के उपासक -पद्मा मिश्रा , जमशेदपुर


कृष्ण भक्त कवि जाति धर्म से परे केवल प्रेम के उपासक

        -पद्मा मिश्रा , जमशेदपुर

        हिंदी साहित्य  के भक्तिकाल में सगुण कृष्ण-भक्ति शाखा के सर्वोच्च कवि है सूरदास जी।उन्होंने ब्रजभाषा को सामान्य जन की भाषा से  अलग परिष्कृत करते हुए उत्कृष्ट साहित्यिक भाषा के रूप में स्थापित किया।सूरदास का हिंदी साहित्य और भाषा में योगदान अत्यंत व्यापक हैl इसलिए ब्रज भाषा का विकास तो हुआ ही उसका मानक रुप भी शास्त्रीय एवं गेय की श्रेणी में लोक में प्रचलित और सम्मानित हुआ था।

सूरदास जी ने कृष्ण को आराध्य मानकर जिन गेय पदों की रचना की उनका प्रभाव जन जन के हृदयों तक पहुंचा।विशेष रुप से कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर चित्रण वात्सल्य सृजन आज भी हिन्दी साहित्य की अमूल्य निधि है। गोकुल की गलियों में पलते बढते हुए बाल कृष्ण का बचपन किसके मन को मोहित नहीं करता? 

किलकत कान्ह घुटुरवन आवत,तनक तनक चरनन सों नाचत मनहिं मन रिझावत। 

सूर के कृष्ण भारत के घर घर में खेलने वाले छोटे से नन्हे बालक की तरह बड़े हो रहे थे। उनकी भाषा अत्यंत सरस सरल व सहज थी।जिसमें लोकभाषा के शब्द, मुहावरे  और अलंकारों का सौंदर्य देखते ही बनता है।ब्रज के इस साहित्यिक पर सरल रुप ने हिन्दी साहित्य के कोष को समृद्ध किया है।

सूरदास जी को हिंदी साहित्य में वात्सल्य रस का जनक या सम्राट माना जाता है । उन्होंने भगवान कृष्ण की बाल-लीलाओं और मैया यशोदा के मातृ-प्रेम का इतना सजीव और मनोवैज्ञानिक चित्रण किया है जो विश्व साहित्य में दुर्लभ है। 

मैया मोरी मैं.नहिं माखन खायो

भोर भये गैयन के पाछे मधुवन मोहिं पठायो।

तू मोहिं को मारन सीखी जसुमति कबहुं न रीझै।

वात्सल्य के अतिरिक्त उनके पदों में संयोग और वियोग दोनों प्रकार के श्रृंगार रस का अत्यंत मार्मिक वर्णन है।  कृष्ण के मथुरा चलै जाने पर गोपियों के विरह का सजीव वर्णन मन को भावविभोर कर देता है।

मधुवन तुम कत रहत हरे

विरह वियोग श्याम सुंदर के ठाढे क्यों न जरे?

विरह के इन गीतों ,पदों को विप्रलंभ शृंगार के अंतर्गत भ्रमरगीत के नाम से भी जाना गया।उनकी सबसे प्रसिद्ध और प्रामाणिक रचना सूरसागर  है, जिसमें सवा लाख पद बताए जाते हैं। इसमें कृष्ण के जन्म से लेकर मथुरा गमन तक की कथा है। इसके अतिरिक्त सूरसारावली में 1107 छंद हैं और यह एक वृहद होली के गीत के रूप में रची गई है। संयोग शृंगार के भी सुंदर वर्णन मिलते हैं।

मुरली तऊ गोपालहिं भावति,

राखत एक पांय ठाढे करि अति अधिकार जनावति। राधा और कृष्ण के सौंदर्य का वर्णन हृदय को स्पर्श करता है--

नवल किशोर नवल नागरिया

,अपनी भुजा श्याम भुज ऊपर,

 श्याम भुजा अपने उर धरिया।

 भक्तिकाल में मुसलमान कवियोः के योगदान के विषय में भी साहित्यकारों ने रसखान को अप्रतिम कवि बताया है।

कृष्ण भक्ति की समृद्ध परंपरा में कई मुस्लिम कवियों ने अमर रचनाएं की हैं। इनमें रसखान का नाम सर्वोपरि है, जिन्होंने कृष्ण के प्रति अपने अनन्य प्रेम में अपनी सारी सुख-समृद्धि त्याग दी थी। भारतेंदु हरिश्चंद्र ने उनकी भक्ति से प्रभावित होकर लिखा थ"इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन हिंदू वारिए"।

अधिकांश मुसलमान कवि कृष्ण भक्त थे ।रसखान लिखते हैं -

मानुष हौं तो वही रसखान 

बसों ब्रज गोकुल गांव के ग्वारन,

जो खग हौं तो बसेरा करौं 

जमुना  को कूल कदंब की डारन। 

रसखान के अतिरिक्त ताज बीबी का नाम भी उल्लेखनीय है, -

-श्याम प्यारे तिहारे ह्वै रहूंगीं मैं।हौं तो तुरकानी हिंदुआनी ह्वै रहूंगी ।वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ जी के संपर्क में आने के बाद, उन्होंने पुष्टिमार्ग के तहत दीक्षा ली। इसके बाद उन्होंने ब्रजभाषा में कई प्रसिद्ध कृष्ण भजनों की रचना की। हिन्दी साहित्य में उनका योगदान अप्रतिम था। ताज बीबी को  'मुगल मीराबाई' भी कहा जाता था। 17वीं सदी की एक प्रमुख मुगल कवयित्री और भगवान कृष्ण की अनन्य भक्त थीं। मुस्लिम परिवार में जन्मीं ताज बीबी का विवाह सम्राट अकबर से हुआ था। बाद में उनका हृदय श्रीकृष्ण की भक्ति में ऐसा लीन हुआ कि उन्होंने अपना पूरा जीवन ब्रज में बिता दिया। 

काहु को भरोसो वेद चारहू जो पढ़ै होत,काहु को भरोसो गंगा न्हाये साहस चार को।काहु को भरोसो सब देखन को पूजे 'ताज',काहु को भरोसो विधि शंकर उदार को।

कृष्ण की लीलामय छवि भक्त हृदय के अंतर्मन को गहराई से स्पर्श करती है। इसीलिए कृष्ण मोहक हैं,सरस हैं और जनजन के प्रिय भी। 

 - पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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