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सूखा खेतों में है, सवाल व्यवस्था की जड़ों में - प्रो. आरके जैन “अरिजीत” शिक्षाविद् ,बड़वानी



सूखा खेतों में है, सवाल व्यवस्था की जड़ों में

[जब धरती प्यासी हो, तब फाइलें नहीं — पानी चाहिए]

[1972 का सूखा इतिहास, 2026 का व्यवस्था की नाकामी]

      महाराष्ट्र में इस बार सूखे ने सिर्फ खेत नहीं सुखाए, व्यवस्था की तैयारी भी उजागर कर दी है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने लातूर, धाराशिव और सोलापुर के हालात को 1972 के सूखे से भी गंभीर/भयावह बताया है। 1972 महाराष्ट्र के लिए सिर्फ सूखे का साल नहीं, एक बड़ी त्रासदी था। तब पानी नहीं था; आज पानी के साथ सर्वेक्षण, पंचनामे, समितियाँ, जीआर (शासन निर्णय) और घोषणाएँ भी हैं। फिर भी किसान की जरूरत वही है—पानी और राहत। तब वह आसमान देखता था, आज आसमान के साथ सरकार की ओर भी देखता है। सवाल अब सूखा पहचानने का नहीं, यह है कि कार्रवाई पानी की तरह खेत तक पहुँचेगी या फाइल की तरह वहीं सूख जाएगी।
सोलापुर से लातूर और धाराशिव तक खेतों की हालत सरकारी आँकड़ों से कहीं ज्यादा भयावह है। फसलें सूख चुकी हैं, कुएँ जवाब दे चुके हैं और किसान की उम्मीद अब मौसम की भविष्यवाणी पर टिकी है। लातूर और धाराशिव में सामान्य से करीब आधी बारिश हुई और सोयाबीन जैसी फसलों को भारी नुकसान हुआ। किसान के लिए यह सिर्फ फसल का नुकसान नहीं—बीज, खाद, मजदूरी, कर्ज और परिवार की उम्मीद, सब दाँव पर हैं। विडंबना यह है कि खेत में पानी नहीं, लेकिन सरकारी शब्दावली में भरपूर पानी है—सर्वेक्षण, पंचनामा, मदद, व्यवस्था और समीक्षा। किसान का सीधा सवाल है—इनमें से कौन-सा शब्द उसके सूखे कुएँ में पानी उतारेगा?
विकास ने पानी को पीछे छोड़ दिया—यही 1972 और आज के सूखे का सबसे बड़ा अंतर है। तब उपग्रह, डिजिटल रिकॉर्ड, मौसम अलर्ट और आधुनिक जल-संरक्षण तकनीकें नहीं थीं; आज ये सब हमारे पास हैं। फिर भी मोबाइल पर बारिश की चेतावनी पहुँचती है, खेत में पानी नहीं। ड्रिप सिंचाई और जल-संरक्षण की तकनीकें मौजूद हैं, लेकिन सूखे खेत अब भी किसान की नियति बने हुए हैं। शहरों में स्मार्ट सुविधाएँ बढ़ रही हैं और गाँव में पानी का घड़ा भारी होता जा रहा है। हमने सूचना को डिजिटल कर लिया, पानी की व्यवस्था को नहीं। प्रकृति ने इस बार कम पानी दिया है, लेकिन सवाल व्यवस्था से है—जो पानी मिला, उसे हमने कितनी दूरदृष्टि से बचाया और बाँटा?
किसान के हिस्से में जोखिम आता है, राहत नहीं। मौसम की मार वह झेलता है, बाजार का उतार-चढ़ाव सहता है, कर्ज चुकाता है और फसल सूखने पर सरकारी प्रक्रिया के चक्कर भी काटता है। बीज उसका, मेहनत उसकी, नुकसान उसका—अब राहत की प्रतीक्षा भी वही करे। फडणवीस ने प्रभावित किसानों को सहायता का भरोसा दिया है और सरकार दुष्काल संबंधी निर्णय व राहत प्रक्रिया आगे बढ़ाने की बात कह रही है। अब कसौटी घोषणा नहीं, उसका खेत तक पहुँचना है—कितनी जल्दी, कितनी पारदर्शिता से और कितने परिवारों तक। किसान को अपनी पीड़ा पर सरकारी मुहर नहीं, उसके साथ मदद चाहिए। भूख को प्रमाणपत्र नहीं, भोजन चाहिए; प्यास को अधिसूचना नहीं, पानी।
हमारी जल-व्यवस्था की आदत अजीब है—पानी रहते उसकी चिंता नहीं और संकट आते ही पानी-पानी। बारिश अधिक हुई तो बाढ़, कम हुई तो सूखा; दोनों के बीच तैयारी कहीं दिखाई नहीं देती। तालाबों का पुनर्जीवन, भूजल पुनर्भरण, नदियों का संरक्षण, जलागम विकास, सिंचाई दक्षता और फसल-पद्धति बदलने की बातें वर्षों से हो रही हैं, पर जमीन पर उनका हिसाब अब भी बाकी है। हर सूखे के बाद वही सवाल लौटता है—पानी गया कहाँ? सच यह है कि पानी जितना आसमान ने नहीं रोका, उससे अधिक हमने उसे रोकने, बचाने और बाँटने की व्यवस्था को प्राथमिकता नहीं दी। सूखा आधा मौसम की देन है, आधा हमारी नीतियों का परिणाम।
प्रकृति को कटघरे में खड़ा करना आसान है, अपनी जल-व्यवस्था को नहीं। जलवायु परिवर्तन से तापमान बढ़ा है, बारिश का मिजाज बदला है और लंबे सूखे ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मुश्किल बढ़ाई है। लेकिन हर संकट का दोष प्रकृति पर डाल देना भी सुविधाजनक है। हमने तालाबों को उपेक्षित किया, नदियों पर दबाव बढ़ाया, भूजल खींचा और पानी बहाया; फिर बादलों से शिकायत की कि वे बरसे क्यों नहीं। सूखा केवल बारिश की कमी नहीं, हमारी जल-बुद्धि की परीक्षा है। जहाँ पानी की योजना संकट तक सीमित हो, वहाँ सूखा प्राकृतिक आपदा से आगे प्रशासनिक चुनौती बन जाता है। इसलिए राहत के साथ हिसाब भी जरूरी है—कितना पानी आया, कितना बचा और कितना हमारी लापरवाही में बह गया?
सूखा हर साल नया नहीं होता, हमारी तैयारी जरूर पुरानी रहती है। आज दो-तिहाई से अधिक जिलों में सूखा-सदृश स्थिति की खबरें हैं और प्रशासन दुष्काल के मानकों की समीक्षा कर रहा है। इससे साफ है कि संकट किसी एक तहसील या फसल तक सीमित नहीं, महाराष्ट्र की व्यापक जल-सुरक्षा से जुड़ा है। इसलिए राहत पैकेज जरूरी है, पर पर्याप्त नहीं। किसानों को तत्काल आर्थिक सहायता के साथ पीने का पानी, पशुओं का चारा, रबी की तैयारी और अगले वर्ष के लिए जल-सुरक्षा चाहिए। वरना हर साल सूखे का नया रिकॉर्ड बनेगा और सरकार तैयारी का वही पुराना रिकॉर्ड दोहराती रहेगी। आज की राहत यदि कल की तैयारी नहीं बनती, तो अगला सूखा केवल मौसम की मार नहीं होगा।
अब सवाल फडणवीस के बयान का नहीं, उसके बाद उठने वाले कदम का है। उन्होंने संकट को गंभीर बताया और प्रभावित इलाकों का दौरा भी किया। महाराष्ट्र अब देखेगा कि खेत तक पहुँची सरकारी गाड़ी के साथ राहत भी पहुँचती है या नहीं। क्योंकि सूखा भाषण से नहीं बुझता, फाइलों से नहीं—पानी खेत तक पहुँचे, किसान का नुकसान खाते में दिखे और अगली फसल की उम्मीद लौटे, तभी सूखा कम होगा। 1972 से भयावह सूखा बताना चेतावनी है; उसे 1972 से मजबूत तैयारी में बदलना असली परीक्षा। इतिहास यह नहीं पूछेगा कि सूखे को किसने सबसे भयावह बताया था; वह पूछेगा—जब धरती प्यासी थी, तब पानी को प्राथमिकता किसने दी?

 --प्रो. आरके जैन “अरिजीत”
शिक्षाविद् ,
बड़वानी (मप्र)
ईमेल: rtirkjain@gmail.com
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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