जेंडर वॉर के दौर में 'अर्धनारीश्वर': अधिकारों की जंग नहीं, सह-अस्तित्व का मार्ग
आज का समाज एक अजीब द्वंद्व से गुजर रहा है, जहां एक तरफ हम तरक्की और आधुनिकता के बड़े-बड़े दावों के साथ 21वीं सदी में जी रहे हैं, तो दूसरी तरफ सड़कों से लेकर सोशल मीडिया के डिजिटल गलियारों तक एक अदृश्य 'जेंडर वॉर' छिड़ा हुआ है। यह एक ऐसा अशांत दौर है जहां युवा ऊर्जा एक-दूसरे को समझने के बजाय एक-दूसरे के खिलाफ प्रदर्शन करने, आरोप-प्रत्यारोप लगाने और उग्र नारे बुलंद करने में नष्ट हो रही है। लड़कियां अपनी जायज सुरक्षा और स्वतंत्रता की मांग के दौरान कभी-कभी पूरे पुरुष समाज को कटघरे में खड़ा कर देती हैं, तो वहीं पुरुष भी अपनी असुरक्षा और आक्रोश में प्रतिक्रियावादी रुख अपना रहे हैं। संवाद पूरी तरह खत्म हो चुका है और समाज 'महिला बनाम पुरुष' के दो कट्टर खेमों में बंट गया है। ऐसे अशांत माहौल में, हिंदी साहित्य की दो महान विभूतियों—राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' और यशस्वी साहित्यकार विष्णु प्रभाकर—द्वारा रचित 'अर्धनारीश्वर' की अवधारणाएं आज के सामाजिक संकट का सबसे बड़ा व्यावहारिक और तार्किक समाधान बनकर उभरती हैं।
दिनकर का दार्शनिक आधार: नर और नारी एक ही द्रव्य की दो प्रतिमाएं
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' ने अपने कालजयी निबंध 'अर्धनारीश्वर' में बहुत पहले ही यह वैचारिक आधार रख दिया था कि नर और नारी एक ही द्रव्य की ढली दो प्रतिमाएं हैं, जिनमें से एक के गुण दूसरे के दोष नहीं हो सकते। भगवान शिव के आधा शिव और आधी शक्ति वाले कल्पित रूप के माध्यम से दिनकर जी स्पष्ट करते हैं कि सृष्टि का कोई भी जीव एकांगी नहीं है। जीव विज्ञान और मनोविज्ञान भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि हर पुरुष के भीतर एक स्त्री अंश (कोमलता, करुणा, अंतर्ज्ञान) होता है और हर स्त्री के भीतर एक पुरुष अंश (साहस, दृढ़ता, तर्क) होता है। आधुनिक समाज की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि हमने इन दोनों तत्वों को एक-दूसरे का पूरक मानने के बजाय प्रतिद्वंद्वी बना दिया है। जब तक कोई पुरुष अपने भीतर की करुणा और संवेदनशीलता को स्वीकार नहीं करता, तब तक उसका पौरुष 'विषाक्त' बना रहता है; और जब तक कोई स्त्री अपने भीतर के साहस और स्वाभिमान को नहीं जगाती, तब तक वह पूर्णता को प्राप्त नहीं कर सकती।
विष्णु प्रभाकर का व्यावहारिक यथार्थ: शोषण से आत्मनिर्भरता तक
इसी वैचारिक दर्शन को व्यावहारिक धरातल पर उतारते हुए विष्णु प्रभाकर ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास 'अर्धनारीश्वर' में व्यक्तिमन, समाजमन और अंतर्मन के विविध स्तरों पर नर-नारी की मानसिक उलझनों को बड़ी बेबाकी से बुना है। उनका यह उपन्यास बलात्कार, उत्पीड़न, सामाजिक ढोंग और टूटते रिश्तों के बीच नारी-शोषण की कड़वी हकीकत को दिखाता है। लेकिन विष्णु प्रभाकर जी की विशेषता यह है कि वे स्त्री को किसी उद्धारक या 'मसीहा' के भरोसे छोड़ने के बजाय उसे आत्मनिर्भर और आत्मविश्वासी बनने का संदेश देते हैं। वे अपनी नायिका के माध्यम से यह स्थापना करते हैं कि स्त्री अगर प्रेम करने का संकल्प ले सकती है, तो वह पुरुष-प्रधान क्रूरताओं से लड़कर कर्म करने और नए सार्थक जीवन की तलाश करने का संकल्प भी ले सकती है।
निष्कर्ष: खिलाफ नहीं, साथ खड़े होने का समय
आज सड़कों पर लग रहे उग्र और विभाजनकारी नारों के बीच हमें दिनकर जी के दार्शनिक विचार और विष्णु प्रभाकर जी के व्यावहारिक सामाजिक यथार्थ, दोनों को मिलाकर देखने की सख्त जरूरत है। स्त्रियों को यह समझना होगा कि समानता और अधिकारों की यह लड़ाई पुरुषों को नीचा दिखाने या उनसे नफरत करने की नहीं, बल्कि उनके साथ बराबरी से जीने और आत्मनिर्भर बनने की है। ठीक इसी तरह, पुरुषों को भी यह स्वीकार करना होगा कि स्त्रियों को उनका हक और सम्मान देने से पुरुषों का महत्व कम नहीं होता, बल्कि समाज अधिक सुरक्षित और समृद्ध बनता है; आखिरकार शिव ने जब शक्ति को अपने शरीर का आधा हिस्सा दिया, तो वे कमतर नहीं हुए, बल्कि 'महादेव' कहलाए। स्त्री और पुरुष प्रकृति की गाड़ी के दो पहिए हैं, जिनका एक-दूसरे के विपरीत दिशा में भागना पूरी सभ्यता को विनाश की ओर ले जाएगा। यह समय एक-दूसरे के 'खिलाफ' खड़े होकर चिल्लाने का नहीं, बल्कि एक-दूसरे के 'साथ' खड़े होकर एक ऐसे समतावादी समाज का निर्माण करने का है, जहां नफरत की जगह सह-अस्तित्व और सम्मान की भावना सर्वोपरि हो।
- मिलन चौबे ,
शिक्षाविद, जबलपुर
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