अरे अधकचरे भाई कचरा मत डाल
- देवेन्द्र कुमार रावत, भोपाल
" गाड़ी वाला आया, घर से कचरा निकाल" गीत सुनाती हुई गाड़ी रोज़ हमारे गली मोहल्ले में आती है । वह हमारा कचरा ले जाती है ताकि घर और आसपास स्वच्छता बनी रहे । परंतु यहाँ कचरा निकालने की नहीं, बल्कि 'कचरा न डालने' की बात कही जा रही है । अर्थात् हम भौतिक पदार्थों से निकले हुए कचरे की बात नहीं कर रहे हैं, बल्कि हमारे भीतर के उस मानसिक कचरे की बात कर रहे हैं जो धर्म साहित्य ,संस्कृति और राजनीति के नाम पर समाज में फैला रहे हैं । यह मानसिक कचरा बहुत खतरनाक है, क्योंकि यह भौतिक कचरे की तरह दिखाई नहीं देता । पर जब यह सूखा कचरा किसी के दिमाग से निकलता है तो , गीला होकर फैलता है । तब इसके दुष्प्रभाव से मानवता कराह उठती है । इसलिए इस कचरे से बहुत अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है । क्योंकि भौतिक पदार्थों से निकला कचरा तो कुछ समय के बाद खाद बन जाता है और विज्ञान की नई तकनीकों से रिसाइकल होकर नए रूप में आ जाता है; पर यह मानसिक कचरा आसानी से समाप्त नहीं होता, बल्कि इससे कई नई-नई समस्याएं रक्तबीज की तरह जन्म लेती हैं । यदि यह कहें कि हम सब आज कचरे के ढेर पर बैठे हुए हैं, तो यह कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । असल में चिंता इस बात की है कि भौतिक कचरे का निपटान तो तत्काल हो जाता है, लेकिन जो मानसिक कचरा हम फैला रहे हैं, उसे साफ़ करने में सदियाँ लग जाती हैं । यह मानसिक कचरा फैलाने वाले लोग भी अजब-गजब हैं । इनके चश्मे से 99.99 प्रतिशत अच्छाई दिखाई नहीं देती, बस .0001 प्रतिशत से भी कम की बुराई भी इन्हें विराट रूप में दिखती है । यदि इन्हें कोई ऐसी बुराई दिख जाए, तो ये उसे ही अपना प्रमुख लक्ष्य बना लेते हैं । वे उसे पकड़कर इस तरह दुष्प्रचार की वर्षा करते हैं, मानो आकाश से पुष्प वर्षा कर रहे हों । असल में समाज में भेदभाव, आतंक और हिंसा फैलाने के लिए यह उनके किसी पाठ की तरह होता है, जिसे एक सुनियोजित रणनीति की तरह ये पहले तो इकट्ठा करते हैं और बाद में फैलाते हैं । इसे फैलाने के लिए किसी बाहरी साधन की भी आवश्यकता नहीं होती, यह तो दूषित विचारों का रूप लेकर फैलता है । ऐसे लोग अभिव्यक्ति की आज़ादी का दुरूपयोग ही करते है लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि लोग कुछ भी कहें और समाज पर उसका दुष्प्रभाव पड़े । संसार में अच्छे और बुरे, ये दोनों पक्ष होते हैं । पर गुणों को ग्रहण करना और दोषों का परित्याग के संबंध में तुलसीदास जी कहते है :-
चरन चोंच लोचन रंगौ, चलौ मराली चाल ।
क्षीर-नीर बिबरन समय, बक उघरत तेहि काल ।।
अर्थात् ये बगुले (ढोंगी लोग)
हंसों की जगह लेने की कोशिश करते हैं; परंतु समाज
जब उनकी परीक्षा लेता है, तो वह बगुले
और हंस के बीच का अंतर समझ जाता है । तुलसीदास जी ने समझाया है कि विधाता ने इस
जड़-चेतन संसार को गुण और दोष दोनों से युक्त बनाया है । लेकिन संत रूपी हंस दोष
रूपी जल को छोड़कर केवल गुण रूपी दूध को ही ग्रहण करते हैं । क्योंकि संसार में
सत्य-असत्य, हिंसा-अहिंसा, माया-भक्ति
और गुण-दोष सब कुछ शामिल है । यह हम पर निर्भर करता है कि हम इसमें से क्या चुनें
और किसे त्याग दें । इसीलिए कहा गया है कि अपने विवेकानुसार ही संसार की
वास्तविकता का बोध हो सकता है । पौराणिक कथाओं में यदि राम हैं, तो
रावण भी है । पर जब हम रावण के पक्ष में खड़े लोगों को देखते हैं,
तब
सोचने की आवश्यकता है कि सिर्फ ऐसे लोगों से फैलने वाले मानसिक कचरे से समाज को
कितनी हानि होगी । कितने आश्चर्य की बात है कि जहाँ धर्मो में विश्व कल्याण की कामना की गई है,
वहाँ
से भी इन लोगों को अच्छाई दिखाई न देकर केवल कचरा ही दिखाई दे रहा है । ये लोग
चाहते हैं कि यह वैचारिक कचरा पूरे समाज में फैल जाए और लोगों का दिमाग सड़ जाए,
जिसकी
दुर्गन्ध से इंसानियत ही ख़त्म हो जाए ।
पता नहीं इन्हें इतनी बुराई क्यों दिखने लगी है कि इनके देखने का चश्मा ही बदल गया
है । अब इसमें अच्छाई तो दिखेगी नहीं, बस दोष ही
दिखेंगे ।असल में, इस मानसिक कचरे वाले 'प्रदूषण
दर्शन' के लोग इसके इतने आदी हो जाते हैं कि इन्हें दूसरों के दोष
देखने के बदले अपने अंतर्मन का कचरा दिखाई ही नहीं देता । इस संदर्भ में इतिहास
गवाह है कि इसी मानसिक कचरे ने संसार से भाईचारा और सद्भाव समाप्त करने की पूरी
कोशिश की है । लेकिन यह भी सच है कि ऐसे मानसिक कचरा फैलाने वालों को मानव समाज
कभी माफ़ नहीं करता है । जैसे, रावण का वध
भले ही त्रेतायुग में हुआ था, किंतु आज भी
वह अज्ञान रूपी रावण अर्थात् बुराई का पुतला मानव समाज द्वारा प्रतिवर्ष दशहरे पर
जलाया ही जाता है । शास्त्रों में वर्णन आया है कि दुर्गुणों से ही मनुष्यों का
पतन होता है । अतः मानवता के हित में यह आवश्यक है कि हम केवल सार तत्त्व (अच्छाई) को ही ग्रहण करें,
और
जो अच्छा नहीं है, उसे त्याग दें । जैसे हम भौतिक पदार्थों से निकलने वाले अवशिष्ट
(कचरे) को तो बाहर निकालते हैं ताकि बाहरी
स्वच्छता बनी रहे, ऐसे ही हमारे कुविचार
के रूप में जो मानसिक कचरा मौजूद है, उसे बाहर न
फैलाकर भीतर ही उसका पूरी तरह निपटारा कर दें; इसी
में हमारी भलाई है ।
महेंद्रा स्कावयर्स
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