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लघुकथा :रोज़-रोज़ का मरना - डॉ रीटा अरोड़ा ,करनाल



लघुकथा :

रोज़-रोज़ का मरना

“क्या हुआ? फिर चुप हो गई?” उसने पूछा।

“क्या कहूँ?”

“जो कहना है, साफ़ कहो।”

“कहती हूँ तो तुम्हें पसंद नहीं आता। फिर झिड़कियाँ, फिर बहस, फिर लड़ाई।”

“तो क्या हर बात पर मेरी हाँ में हाँ नहीं मिलाओगी?”

“मैंने कब कहा? बस चाहती हूँ कि मेरी बात भी सुन लो।”

“तुम्हें हर बात में अपनी मनवानी होती है।”

वह हँस दी। हँसी में दर्द था।

“अजीब है न! अपनी बात कहूँ तो मनवानी, तुम्हारी बात मान लूँ तो समझदारी।”

“अब फिर शुरू मत हो जाना।”

“मैं शुरू करती हूँ या हर बार यहीं से शुरू होता है?”

वह अख़बार उठाकर बैठ गया। बातचीत ख़त्म हो चुकी थी, लेकिन उसके भीतर कुछ फिर टूट गया था।

कभी वह सोचती, आज चुप नहीं रहेगी। फिर घर की शांति के लिए शब्द निगल जाती। कभी सोचती, समझाएगी। फिर पिछली बहसें याद आ जातीं।

रात को उसने पूछा, “तुम खुश हो मेरे साथ?”

“ये कैसा सवाल है?”

“बस, जवाब चाहिए।”

“इतने साल साथ रहे हैं, अब क्या साबित करना है?”

वह करवट बदलकर लेट गई।

सालों का साथ था, आदतें थीं, जिम्मेदारियाँ थीं। बस, कहीं बीच में उसकी अपनी आवाज़ खो गई थी।

सुबह फिर चाय बनेगी, अख़बार खुलेगा, दिन गुज़रेगा।

और वह फिर अपने भीतर कुछ मारकर मुस्कुरा देगी।

- डॉ रीटा अरोड़ा ,करनाल
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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