काव्य :
खुद को समझना ही जीवन है
सब ने सबको समझा,
पर मैंने पहले खुद को समझा।
हर किसी को अपने जैसा ही मासूम समझा,
मगर ठोकर खाकर अब यह समझ आया—
खुद को पूरी तरह जान लेना ही जीवन है।
सबने मुझको अच्छा समझा,
पर मैंने रिश्तों को अंदर से कच्चा समझा।
मैंने लोगों के चेहरों और मुखौटों को अच्छा समझा,
पर उन लोगों ने मेरी सादगी और मुझे सच्चा समझा।
अब अंत में बस यही समझ आया,
कि खुद को समझ लेना ही सब कुछ पूर्ण है।
मत उलझो इस दुनिया में किसी को समझने की,
लोग तुम्हें अपनी नज़र से ही गलत समझेंगे,
और इस बाहरी शोर में तुम कहीं खुद को ही खो दोगी।
क्योंकि हर उलझन का एक ही हल है
खुद को समझ लेना ही असली जीवन है।
- प्राची शर्मा , भोपाल
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