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धनत्रयोदशी - मधूलिका श्रीवास्तव , भोपाल



धनत्रयोदशी

            दीवाली, भारत का सबसे प्रमुख और उज्ज्वल त्यौहार है। यह प्रकाश पर्व अंधकार पर प्रकाश, बुराई पर अच्छाई और अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक माना जाता है। दीपों की जगमगाहट, मिठाइयों की खुशबू, रंगोली की सजावट और आपसी स्नेह से सारा वातावरण आनंदमय हो उठता है। यह पर्व न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का संदेश भी देता है।दीपावली का पर्व पाँच दिन मनाया जाता है ।जिसमें धनतेरस, नरक चतुर्दशी, दीपावली, गोवर्धन पूजा और समापन भैयादूज से होता है ।
        दीपावली का आरंभ धनतेरस से होता है। इस  दिन जब घरों में न केवल दीपक जलते हैं, बल्कि उम्मीदों का उजाला भी फैलता है। 
धनतेरस हिंदुओं का एक प्रमुख त्योहार है, जो दीपावली से दो दिन पहले मनाया जाता है। यह पर्व कार्तिक माह (पूर्णिमान्त) की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन मनाया जाता है। कहते हैं कि इस दिन समुद्र मंथन के समय भगवान धन्वंतरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे,अतः इस दिन को भगवान धन्वंतरि का जन्म दिवस भी माना जाता है। उन्हें आयुर्वेद का जनक और स्वास्थ्य का देवता माना जाता है। इसलिए इस तिथि को धनतेरस या धनत्रयोदशी के नाम से जाना जाता है। 
        इस दिन द्वार पर घी के तेरह दिये जला कर लक्ष्मी जी का आवाहन किया जाता है तथा यम व धन्वंतरि की पूजा का भी विधान है।
        भगवान धन्वन्तरि चूँकि कलश लेकर प्रकट हुए थे इसलिए इस अवसर पर बर्तन खरीदने की परम्परा है। लोग नए बर्तन, सोना, चाँदी या अन्य वस्तुएँ खरीदते हैं। ऐसा माना जाता है कि इस दिन की गई खरीदारी घर में सुख-समृद्धि और सौभाग्य लाती है। कहीं कहीं लोकमान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इस दिन ख़रीदारी करने से उसमें तेरह गुणा वृद्धि होती है। इस दिन चाँदी खरीदने के पीछे मान्यता है कि चाँदी, चंद्रमा का प्रतीक है जो शीतलता प्रदान करता है और मन में सन्तोष रूपी धन का वास होता है। सन्तोष को सबसे बड़ा धन कहा गया है। जिसके पास सन्तोष है वह स्वस्थ है, सुखी है, और वही सबसे धनवान है। 
          धनतेरस पर शाम के समय दीपक जलाकर यमराज की पूजा की जाती है, ताकि परिवार में अकाल मृत्यु का भय न रहे।
        भारतीय संस्कृति में स्वास्थ्य का स्थान धन से ऊपर माना गया है कहावत है कि 
*पहला सुख निरोगी काया*
*दूजा सुख घर में माया*
     शास्त्रों के अनुसार धन्वंतरि  विष्णु के अंशावतार हैं। संसार में चिकित्सा विज्ञान के प्रसार के लिए भगवान विष्णु ने धन्वंतरि का अवतार लिया था। धन्वंतरि ने आयुर्वेद का प्रादुर्भाव किया था। उन्हें आरोग्य का‌ देवता कहा जाता है। उन्होंने ही अमृतमय औषधि की खोज की थी। इनके वंशज दिवोदास ने काशी में पहले शल्य चिकित्सा विद्यालय की स्थापना की थी। जिसके प्रधानाचार्य ऋषि विश्वामित्र के पुत्र सुश्रुत थे, जिन्होंने सुश्रुत संहिता लिखी, वे विश्व के पहले शल्य चिकित्सक थे।
   धनतेरस धन और आरोग्य से जुड़ा होने के कारण धन के लिए कुबेर व आरोग्य के लिए धन्वंतरि की पूजा की जाती है। लोग इस दिन ही दीपावली के लिए लक्ष्मी गणेश की पूजा के लिए मूर्ति भी खरीदते हैं।
       जैन आगम में धनतेरस को 'धन्य तेरस' या 'ध्यान तेरस' भी कहते हैं।भगवान महावीर इस दिन तीसरे और चौथे ध्यान में जाने के लिये योग निरोध के लिये चले गये थे। तीन दिन के ध्यान के बाद योग निरोध करते हुये दीपावली के दिन निर्वाण को प्राप्त हुये। तभी से यह दिन धन्य तेरस के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
      सिख धर्म में धनतेरस का सीधा संबंध नहीं है, लेकिन दीपावली के समय “बंदी छोड़ दिवस” मनाया जाता है — वह दिन जब गुरु हरगोबिंद जी को कैद से मुक्ति मिली थी। इस अवसर पर भी प्रकाश और उल्लास का वातावरण होता है, जो धनतेरस की भावना से कुछ हद तक मेल खाता है।
       धनतेरस की शाम दीपों से जगमगाती है। यह केवल घरों का नहीं, मनों का अंधकार भी मिटाने वाला पर्व है। वास्तव में असली समृद्धि भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि स्वास्थ्य, सद्भाव और उजले विचारों में निहित है।
        भारत सरकार ने धनतेरस को राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया है।
     *धन व आरोग्य की हो बौछार*
     *सुख शांति की हो बहार*
     *सफलता कदम चूमती रहे*
     *खुशी हरपल छाई रहे*

 - मधूलिका श्रीवास्तव 
E- 101/17 शिवाजी नगर 
भोपाल (म.प्र.)(462016)
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देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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