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आदर्श समाज के निर्माण में नई पीढ़ी का संस्कारवान होना आवश्यक


आदर्श समाज के निर्माण में नई पीढ़ी का संस्कारवान होना आवश्यक

वैचारिक निवेश समूह में बाल मनोविज्ञान विषय पर हुआ संगोष्ठी का आयोजन 

मन्दसौर से डॉ घनश्याम बटवाल की रिपोर्ट 

मंदसौर। बदलते हुए सामाजिक मूल्यों और परिवेश में बाल मनोविज्ञान पर ध्यान केंद्रित करना बहुत आवश्यक है।क्योंकि वर्तमान नई पीढ़ी की प्रत्युतपन्न मति बहुत विकसित है। बच्चों पर नकारात्मक और सकारात्मक दोनों ही परिस्थितियों का  तत्काल प्रभाव पड़ता है। ऐसे में परिवार और समाज का यह दायित्व है कि अभी से नई पीढ़ी के बाल मन पर ऐसे संस्कार संप्रेषित किये जाएं कि भविष्य का समाज संस्कार शील हो। मौजूदा दौर में बच्चों में सहनशीलता कम होती जा रही है बाल सुलभ मन में भी प्रतिशोध पनपने लगा है। अभी की कुछ घटनाएं बहुत चिंताजनक है जिनमें बच्चे अपने सामान बच्चों को ओर बड़ों को भी मार रहे हैं। 
इस आशय के विचार नगर के प्रबुद्धजनों ने वैचारिक निवेश संगोष्ठी में व्यक्त किए। 

वरिष्ठ अभिभाषक गोपाल कृष्ण पाटिल ने कहा कि महाभारत में उल्लेख आता है कि अर्जुन के पुत्र अभिमन्यु ने अपनी मां उत्तरा के गर्भ में ही युद्ध में चक्रव्यूह के भेदना सीखा था। अयोध्या के राजा दशरथ  के चार पुत्रों के जन्म के पूर्व गर्भाधान संस्कार कराया ताकि संस्कारवान बच्चे जन्म लेंवे। श्रवण कुमार का उदाहरण सभी के सामने है। उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में बच्चों के जन्म से पहले गर्भ में ही संस्कारों का सृजन किया जाता था। इसीलिए बच्चे आज्ञाकारी बुद्धिमान और सुयोग्य होते थे। वर्तमान में बच्चों को संस्कारित करना बहुत ही अधिक आवश्यक है।

सेवानिवृत न्यायाधीश रघुवीर सिंह चुंडावत ने कहा कि बच्चों के मनोविज्ञान पर सबसे पहले मां का प्रभाव पड़ता है क्योंकि वही प्रथम गुरु होती है। उसके बाद परिवार और समाज का दायित्व होता है कि बच्चों को कैसी दिशा दी जाए। मौजूदा दौर में सबसे आवश्यक यह है कि माता-पिता इस बात का ध्यान रखें कि बच्चों की संगति कैसी है वह किन के साथ रहते हैं क्योंकि गलत संगति ही बच्चों को भटकाती है। उन्होंने कहा कि संस्कारहीन पीढ़ी समाज और परिवार दोनों को ही नुकसान पहुंचाती है।

वरिष्ठ समाजसेवी गुरु चरण बग्गा ने कहा कि बड़ों का आचरण बच्चों के लिए सबसे बड़ी सीखने की प्रक्रिया होती है बदलते समय के साथ परिवार व्यवस्था परिवर्तित हुई है एकाकी परिवारों में बच्चों का सर्वांगीण विकास नहीं हो पाता। समाज के लिए यह चिंतनीय विषय है कि बच्चों को सही दिशा कैसे मिले उन में संस्कार कैसे आएं क्योंकि चारों तरफ जिस तरह का वातावरण बन रहा है वह बच्चों को दिशाहीन बना सकता है। ऐसे में नई पीढ़ी की चिंता और बढ़ जाती है। बच्चों को घर और बाहर दोनों ही जगह अनुकूल वातावरण मिलना आवश्यक है। 

योग गुरु सुरेंद्र जैन ने कहा कि आधुनिक चिकित्सा पद्धति में महिला के गर्भवती होते ही उसे बेड रेस्ट की सलाह दे दी जाती है जबकि पहले के समय में गर्भवती महिलाओं से घर के काम इसलिए कराए जाते थे ताकि उनका इस तरह व्यायाम हो की प्रसुति में उन्हें किसी तरह की कोई कठिनाई न आवे घर का काम खेत के काम ओर मेहनत मजदूरी करते हुए भी महिलाओं की स्वस्थ प्रस्तुति हो जाती थी कभी अस्पताल या ऑपरेशन जैसी स्थिति नहीं आती थी। किंतु अब सब कुछ बदल गया है। श्री जैन ने कहा कि गर्भावस्था में महिलाएं ज्यादा बेड रेस्ट करती हैं तो उनके बच्चे मानसिक शारीरिक रूप से कमजोर रहते हैं इसलिए भावी पीढ़ी को स्वस्थ रखना भी आवश्यक है। स्वस्थ सामाज ही स्वस्थ राष्ट्र का निर्माण करता है। 

पूर्व प्राचार्य शिक्षाविद डॉक्टर रविंद्र कुमार सोहोनी ने कहा कि संयुक्त परिवार प्रथा कम होने से बच्चे वह बहुत कुछ नहीं सीख पाते हैं जो दादा-दादी भुवा चाचा चाची से सीखा जा सकता है। भौतिकवाद की अंधी दौड़ में अभिभावक बच्चों से दूर  होते जा रहे हैं हमारे देश पर जो सांस्कृतिक हमले लगातार होते है उससे नई पीढ़ी सबसे ज्यादा प्रभावित हो रही है। होटल संस्कृति घरों के चूल्हे बुझा रही है।

जन परिषद प्रांतीय सह सचिव एवं वरिष्ठ पत्रकार डॉ.घनश्याम बटवाल ने  कहा कि बच्चों में घटती सहनशीलता चिंता का कारण है नई शिक्षा नीति में बच्चों का बचपन सुरक्षित रहे ये बिन्दू सुनिश्चित होना आवश्यक है। आज के आपाधापी के दौर में अभिभावक घर से बाहर बच्चों पर ध्यान नहीं दे सकते ऐसे में शिक्षण संस्थानों और शिक्षा नीति की भूमिका बढ़ जाती है क्योंकि बच्चों को संस्कारवान बनाना परिवार के साथ ही विद्यालयों और समाज का भी दायित्व है।
शिक्षाविद रमेश चंद्र चंद्रे ने कहा कि समाज और अभिभावकों का विद्यालयों और शिक्षकों के प्रति घटता विश्वास चिंता का कारण है। स्कूलों में बच्चों को शिक्षक थोड़ा सा भी डांट देते हैं तो उनके अभिभावक तत्काल आपत्ति उठाते हैं जबकि पहले ऐसा नहीं होता था तो बच्चे अनुशासित और संस्कारित होकर स्कूलों से निकलते थे।किंतु अब विद्यालयों का अनुशासन और शिक्षकों की सख्ती का प्रतिकार पहले तो बच्चे खुद ही कर लेते हैं और और उनके अभिभावक भी बच्चों के ही पक्ष में खड़े हो जाते हैं। उन्होंने कहा कि माता-पिता के आचरण का प्रभाव भी बच्चों पर पड़ता है। एक आदर्श समाज के निर्माण में बच्चों का संस्कारित होना बहुत आवश्यक है। 
वरिष्ठ पत्रकार एवं समाजसेवी ब्रजेश जोशी ने कहा कि टेलीविजन चैनलों पर चलते क्राइम सीरियल बच्चों को नहीं देखने देना चाहिए इसका उनके मन पर बहुत नकारात्मक प्रभाव पड़ता है हाल ही में शामगढ़ में एक 12 साल की बच्ची ने 4 साल के बच्चे को पानी की होद में गिराकर मार दिया। क्राईम सीरियल देख कर ही ऐसे तरीके बच्चे सीखते हैं। श्री जोशी ने कहा कि बच्चों पर सबसे ज्यादा वातावरण का प्रभाव पड़ता है इसलिए संस्कारवान वातावरण में ही श्रेष्ठ पीढ़ी का निर्माण कर सकते हैं।
समाज सेवी एवं शिक्षाविद विक्रम भटनागर ने कहा कि 
बदलते दौर में बच्चों में भी इगो होने लगा है। शिक्षक की थोड़ी भी सख्ती उन्हें बर्दाश्त नहीं। स्थिति यह हो गई है कि विद्यालयों में शिक्षक विद्यार्थियों से डरने लगे हैं क्योंकि उनके अभिभावक भी कई बार यह दबाव डालते हैं कि उनके बच्चों को डांट भी नहीं लगनी चाहिए। अभिभावकों को यूं तो अपने बच्चों की देखभाल की फुर्सत नहीं मिलती किंतु स्कूल में किसी बात पर बच्चों की छोटी सी शिकायत पर तत्काल लड़ने पहुंच जाते हैं।
श्री भटनागर ने कहा कि पहले 6 वर्ष तक बच्चे घर पर ही अपने परिवार के साथ रहते थे उन्हें स्कूल इतनी छोटी अवस्था में नहीं भेजा जाता था तो उनकी आरंभिक शिक्षा तो घर पर ही हो जाती थी जिसमें संस्कार भी शामिल थे। किंतु अब तो  2 साल के बच्चे भी प्ले स्कूल भेज दिए जाते हैं। 
संगोष्ठी में मौजूद विबोध प्रीस्कूल प्रिंसिपल श्रीमति डॉ श्रुति बटवाल ने कहा कि बच्चों को पढ़ना और बढ़ाना अब एक चुनौती हो गया है अभिभावकों की अपेक्षाएं बहुत ज्यादा होती है ऐसे में स्कूलों पर दबाव बढ़ गया है। उन्होंने कहा कि नए मेडिकल अनुसंधान में बताया गया है कि इस दौर में जो बच्चे जन्म ले रहे हैं उनका ब्रेन स्ट्रक्चर बदल गया है 3 साल के बच्चे में 7 साल के बच्चे की समझ आने लगी है इसलिए भी आयाम बदलने लगे हैं। अभिभावकों शिक्षकों और समाज की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है 

संगोष्ठी में उपस्थित प्रबुद्ध जनों ने हाल ही में मध्यप्रदेश पुलिस महानिदेशक द्वारा पुलिस मित्र से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार एवं सोशल वर्कर डॉ.घनश्याम बटवाल और सकल जैन समाज द्वारा सम्मानित किए गए योग गुरु सुरेंद्र जैन  को बधाई शुभकानाएं व पुष्पगुच्छ भेंट कर सम्मानित किया गया। संचालन ब्रजेश जोशी ने किया।
देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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