काव्य :
महकता रहा आसमान
संग तारों के अठखेली करता ता-शब जागता रहा आसमान
माथे पर चाँद-टीका सजाए, सजता-संवरता रहा आसमान।
दुधिया चाँदनी हौले से बिखेर गई रातरानी मेरे आँगन में
रात की भीनीं ख़ुशबू समेटे दामन में,महकता रहा आसमान।
रात की खामोशी की गूँज में कहीं खो गया लहरों का शोर
साहिल की रेत पर अपना अक्स टटोलता रहा आसमान।
वक़्त की दरख़्त से टूटकर लम्हे यूँ आहिस्ता बिखरने लगे
उम्र की दहलीज़ पर अनमना सा दस्तक देता रहा आसमान।
न गुल खुले, न शाख हिलीं, न निगाहें-अंदलीब मुस्कुराई
रात के भीगें दामन से शबनम के मोती बिनता रहा आसमान।
सुबह की रेशमी धूप दरीचों से छनकर उतर आई आँगन में
सुरमयी शाम की चादर पर इबारतें लिखता रहा आसमान।
ख़्वाबों का परिंदा छोड़कर अपना नशेमन, लगा उड़ान भरने
इंद्रधनुषीरंगों की तूलिका से तस्वीर उकेरता रहा आसमान।
बहुत क़रीब से ये कौन दिल को छू कर गुज़रा है यहाँ से
बहुत देर तक दिल की सरज़मीं पर ठहरा रहा आसमान।
वो पहली फुहार सावन की और वो सेंधी मिट्टी की महक
बाँधें पायल बूँदों की …..बेख़ुदी में ठुमकता रहा आसमान।
सबकी ख़्वाहिश है पा जाएँ सब अपने हिस्से का आसमान
कभी टूटकर जुड़ता रहा कभी जुड़कर टूटता रहा आसमान।
- भार्गवी रविन्द्र….बेंगलुरु
ता-शब : तमाम रात , दरख़्त : पेड़ , साहिल : किनारा
निगाहें-अंदलीब : बुलबुल की आँखें , दरीचा: खिड़की
इबारत : लेख, कहानी ; नशेमन -आशियाना, बसेरा
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