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लघुकथा : दानपर्व - आर एस माथुर ,इंदौर


 लघुकथा : दानपर्व

दादी का अचानक देहावसान हो गया।आयु थी किंतु व्याधि नहीं।

सब आयोजन पूजन के बाद दानपर्व का समय आया। पंडित जी के लिये शायद सर्वाधिक महत्व और रुचि की वेला।

पिता को गौ दान और शैय्या दान के नाम पर कुल जमा एक हज़ार रुपया  देते देख बेटे ने पूछ ही लिया,,"पिता जी वैतरणी पार करने हेतु इतने रूपयो में कौन सी और कैसी गाय आएगी जिसकी पूंछ पकड़ दादी,,,"वाक्य अधूरा था मगर शंका पूरी।

"अरे बेटा ! ये तो मात्र औपचारिकता है,,न इतने में गाय और शैय्या आएगी न पंडित जी इन पैसों को दादी के निमित्त लगाएंगे।  वो साल भर में जाने कितने ही बिस्तर और गाय खरीदते होंगे क्या? सब उदरस्थ हो जाता है।"

"फिर या तो नहीं ही दें या एक अच्छी दुधारू गाय दिला दें।आप ही तो मां से कहते थे,,"मां को नियम से दूध दिया करो,,रात सोते समय,,उनको लाभ भी करेगा और उन्हें इसकी आदत भी है।"

पिता निरुत्तर थे।

- आर एस माथुर ,इंदौर

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

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