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काव्य : ये कैसा सवेरा मेरे देश का है -पद्मा मिश्रा जमशेदपुर:


 

काव्य : ये कैसा सवेरा मेरे देश का है

 ये कैसा सवेरा मेरे देश का है।

न खुशियां न वादे न संकल्प जागे 

 क्यों विकृत हुआ रूप विश्वास का है 

ये कैसा सवेरा मेरे देश का.है।

जो  कल तक हमारे अहसास में था ,

वो फूलों का आंगन कहीं खो गया है ,

चमन में जो भंवरे निडर घुमते थे ,

कहीं आज उनका अमन सो गया है ,

न जाने कहाँ से ये उमड़ी 'घटायें ',

दिलों में अँधेरा ये किस रात का है

 ,ये कैसा सबेरा मेरे देश का है ,।

चुनौती समय ने तुम्हे आज दी है ,

नियति की लकीरों ने आवाज दी है ,

नभयभीत होकर पराजित बनो तुम ,

ये दहशत की रातों में एक त्रासदी है ,

 मिटा दो अँधेरा जो आतंक का है ,

ये कैसा सबेरा मेरे देश का है ,।

जब आतंक बढ़ता हो अपने चमन में ,

हवाओं को दोषी बताओगे कैसे ?

जब अपने ही घर में विभीषण पले हों ,

तो सोने की लंका जले फिर न कैसे ?

 चलो ,एकता की रंगोली सजाएँ -

जो तूफां से डर जाये परवाज क्या है ?

ये कैसा सबेरा मेरे देश का है ,।

पद्मा मिश्रा जमशेदपुर: 

देवेन्द्र सोनी नर्मदांचल के वरिष्ठ पत्रकार तथा युवा प्रवर्तक के प्रधान सम्पादक है। साथ ही साहित्यिक पत्रिका मानसरोवर एवं स्वर्ण विहार के प्रधान संपादक के रूप में भी उनकी अपनी अलग पहचान है। Click to More Detail About Editor Devendra soni

1 Comments

  1. बहुत सुंदर रचना , समसामयिक परिवेश का चित्रण

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